शब्द समर

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1.9.20

अर्थियाँ

ऐसा नहीं कि पहले कभी नहीं उठी,
या आगे कभी उठेंगी नहीं,
पर जो इस समय उठ रही हैं ये अर्थियाँ|
हृदय को चीरती जा रही हैं,
जैसे खेत को जोतता जा रहा हो हल कोई|
कि जैसे काटी जा रही हो
खड़ी-हरी फसल किसी हसुए से लगातार|
 
ये अर्थियाँ
जो उठ रही हैं अपनों की,
अपनों के कन्धों पर,
निहानी पर पटकते हुए हथौड़े की तरह
तोड़ती जा रही हैं पुट्ठे को|
 
ये अर्थियाँ,
जो सम्बन्धों को
सम्बन्धों से
सूखे पत्ते की तरह तोड़ती जा रही हैं डाल से,
छुड़ा रही हैं मुँह बच्चों का
उनकी माँ के स्तन से,
झटक दे रही हैं हाथ
बूढ़े माँ-बाप के हाथ से,
लगता है जैसे पतझड़ आ चुका है
द्वादश माह के लिए|
 
हे काल!
क्या तेरे हृदय के कोने में,
कहीं भी
एक छोटा-सा भी ऐसा हृदय नहीं है?
जो उठ रही इन अर्थियों की
चीत्कार को समझ सके?
इन अर्थियों के रक्त-संगियों के
क्रन्दन को सुन सके?
लगा सके स्नेह-लेप
अर्थियों से लगे अमिट घाव में?
जो पी सके
अर्थियों से उपजे अवसाद को?
यह है विदित
अर्थियों को उठने का क्रम
न टूटा है,
न टूटेगा
किन्तु
क्या तू अर्थियों के देह की आयु भी नहीं देख सकता?

26.2.16

मेरा आर्तनाद

हे भविष्य! 
मेरा आर्तनाद, नहीं सुन सकते तुम,
क्योंकि तुम हो मस्त,
मात्र अपने ही संसार में।

तुम हिंसक ध्वनियों में ढूँढते
हो सपने,
और मैं नीर-सुर में रहता हूँ लीन|
तुम तो जीना चाहते हो, 
मात्र अपनी प्रसन्नता,
और मैं दे रहा हूँ भार,
जीने को पूरा-का-पूरा समाज|

तुम देखना चाहते हो मात्र,
पैरों के नीचे की भूमि,
और मैं दिखा रहा हूँ,
सूर्य से भी आगे का संसार,
बनाना चाहता हूँ त्रिकालदर्शी तुम्हें|

तुम चाहते हो भरते रहना कुलाचें,
भाँति किसी शावक के,
और मैं बना रहा हूँ
गम्भीर, किसी सिंह समान|

इसीलिए,
तुम समझकर भी,
नहीं समझना चाहते,
किसी के हृदय का घाव,
नहीं ले पाते टोह,
धमनियों से बाहर रिस रहे, 
रक्त प्रवाह का|

तुम करते जाते हो निरन्तर चोट,
जैसे करता है लुहार, 
लोहे पर;
यह जानकार भी
कि होती है, 
कितनी असहनीय पीड़ा,
जब करता है प्रहार
कोई अपना, 
किसी अपने पर|

25.6.15

मृत्युशैय्या से शिशु के बोल

सुनों!
मैं दिखूँगा तब तक ऐसे ही
जब तक उठ न जाऊँ मृत्युशैय्या से|

तुम नष्ट न करना अपना समय
मेरी प्रतीक्षा में,
उठ पड़ना लेकर अपनी रक्तरंगी
मस्तक की रेखाएँ,
करना प्रहार उस चक्र पर जिसे घुमा रहा है
काल सत्ताधीशों के वश में होकर|
धधकना तुम अग्निशिखाओं की भाँति
मेरे शव पर
और दे देना संकेत मेरे पुनरागमन का,
उन्हें जो रंजित हैं मेरे रक्त से|

कर देना विवश उन्हें यह सोचने पर
कि सत्य ही
वही हैं मेरे हत्यारे
जिन्होंने नहीं निकाली मेरी अन्तड़ियाँ
घोप कर कोई बर्छी
बल्कि तड़पा डाला एक-एक अन्न के लिए|
चिपका दिया मेरी पसलियों को मेरी पीठ से
बिना किसी शस्त्र प्रहार के|

मैं तो अभी शिशु ही था|
रंगीन से पूर्व ही पहना दिया गया
मुझे यह श्वेत वस्त्र
मात्र इसलिए कि मेरी उदराग्नि को शांत करने के लिए
जल नहीं अन्न की थी आवश्यकता
और तुम थे असहाय
ऋणमुक्त होने के मार्ग पर|

उन्हें कराना आभास
कि
मेरी एक-एक छटपटाहट ने
उत्पन्न कर दिया है और भी असंख्य क्षुधेक्षु
जो पीटेंगे मात्र उनके ही द्वार
और तब तक न होंगे विचलित
जब तक न पा जाएँ अपनी रोटी
या सो न जाएँ मेरी ही भाँति इस श्वेत शैय्या पर|

सुनों! मेरा अकालगमन
मत करना सरल उनके लिए
अन्यथा उनका उदर सुरसा हो जायेगा
और हम बनते रहेंगे लघु जीवों की भाँति उनका ग्रास
अनायास ही
बल्कि करना संगठित स्वसमाज को,
बनाना हिमालय सा विशाल
और अडिग रहना अपने पथ पर|  

हे जन्मदात्रि!
मैं भविष्य तो भूत हो गया
तुम इस धूसर वर्तमान के भविष्य को
स्वर्णिम बनाने में कोई कसर न छोड़ना  
चाहे कुछ और भविष्यों को भूत की गोद में क्यों न समाना पड़े|

 

6.1.15

गड्ढा

चित्र-साभार, गूगल  
होते ही बारिश
भर जाता हूँ मैं लबालब
अपनी क्षमता के अनुसार
या उससे भी अधिक कभी-कभी
किन्तु गड़ाए हुए
अपनी पैनी नज़र
चारों ओर से कई सूर्य
देखते ही जल समूह मेरे भीतर
फेक देते हैं तपती किरणें
मेरे ऊपर अपनी-अपनी आवश्यकताओं की
और
सोख लेते हैं मुझे पूरी ताक़त से|
नहीं बचाते एक बूँद भी मुझमें
कि
अपनी या किसी भी ज़रूरतमंद की
मैं बुझा सकूँ प्यास|
बस पूरे साल पड़ा रहता हूँ
अपने ही भीतर दरारें लिए
जिसमें कीड़े भी नहीं पनपते|


5.9.13

मैं सम्पूर्ण तुम्हारा हूँ

देखो मैं लौट आया हूँ
ख़ुद-ब-ख़ुद,
पर तुम कहाँ हो?
 
तुम चाहते हो न
कि मैं तुम्हारे साये की तरह रहूँ?
तो लो अपने नस-नस का
क़तरा-क़तरा तुम में समाहित कर रहा हूँ.
सुनो मेरे क़रीब होकर भी
इतने दूर क्यों हो?
तुम्हारे होंठों के कमल पर
ये गोधूली का धुंधलका क्यों है?
तुम्हारे ये मृगनयन में
सागर क्यों छलक रहा है?

देखो मैं सम्पूर्ण आया हूँ
तुम्हारे ही पास
केवल तुम्हारे पास,
अब मेरे क़रीब किसी और की
परछाईं भी न पाओगे कभी.
बस एक बार अपने चेहरे पर
दीवाली का दिया जलाकर
इसे होली की भांति इंद्रधनुषी कर दो|

6.8.13

एक सफ़र में रेखा शेखावत के लिए..........

अभी एक सप्ताह पूर्व मैं एक यात्रा पर था. मैं जिस ट्रेन में बैठा था उसी में मेरे सामने एक लड़की भी बैठी थी. उसे मैंने जितनी बार भी उसके अधरों पर एक मुस्कुराहट तैरती हुई मिली अतः मेरा कवि मन चंचल हो उठा और उसने उसकी मुस्कुराहट को कुछ यूँ व्यक्त किया...

वह बहुत मुस्कुरा रही है
एक असमंजस मुझमें आ रही है
या तो हसींन कोई ख़्वाब बना रही है
या टूटा कोई ख़्वाब भुला रही है
वह बहुत मुस्कुरा रही है

हिलते हुए होठों और झपकती हुई पलकों से 
दो रहस्य जता रही हैं
या तो प्रियतम को पा रही है
या उस पल को पछता रही है
वह बहुत मुस्कुरा रही है

कभी क़ुदरत को अपलक निहारती
कभी मृगनयन मुझ पर डालती
दो बातें मुझको बता रही है
या वादियों संग गा रही है
या अश्क़ों को तड़पा रही है
वह बहुत मुस्कुरा रही है

बादलों सी सूरत वाली
राजपूताना की एक राजकुमारी
या बिना बोले ही कुछ बता रही है
या होठों के भीतर कोई गहरा राज़ छुपा रही है
वह बहुत मुस्कुरा रही है...

इसके बाद उसे पढ़ाया भी. वह प्रसन्न हो गई और अगले दिन की सुबह जब तक वह उतर नहीं गई तब तक मुस्कुराती रही. शायद अभी भी मुस्कुरा ही रही हो...


मौन प्रेम


प्रेम बीज उसके भी मन में
भाव वही मेरे अंतर में

मेरे लिए स्वप्न हैं उसके
वह भी बसी मेरे उर घर में

नयनों से तो बोल चुकी वह
मैंने भी कह दिया नज़र में

उसके बोल न फूटे अब तक
अधर सिले मेरे भीतर में

लज्जा-भय की लुका-छुपी है
दोनों लटके अभी अधर में

दोनों प्रेम पिपासे हृद के
लड्डू फूट रहे अंतर में.

14.6.13

अलसाया सूरज

आज सूरज भी अलसाया है.
और आँखे खोयी हुई हैं एक हसीन दुनिया में.
मदहोश चांदनी लिपटी हुई है बदन से.
और पूरे समय जगाये 
रखा अपने घर में .

पोर-पोर में जकड़न है,
और अंगड़ाई है युगल भुजंगिनी सी .
एक सितारी छुअन है
और झंकृत है आपादमस्तक देह.
परिंदों को आज दानें की फ़िक्र नहीं है.
उनकी दुनिया आज इसी घोसले में ही सिमटी है.
वक़्त थम गया है
क्योंकि आज सूरज अलसाया है

7.6.13

अतिरिक्त आदमी

दादा थे तब लाठी, दीदी हैं तब भी लाठी.
खादी थी तब भी लाठी, खाकी है तब भी लाठी.
पीठ थी तब भी लाठी, पेट है तब भी लाठी.
राज था तब भी लाठी, लोक है तब भी लाठी.
गोरे थे तब भी लाठी, काले हैं तब भी लाठी.
दाढ़ी थी तब भी लाठी, मूंछे हैं तब भी लाठी.
छोटे थे तब भी लाठी, बड़े हैं तब भी लाठी.
बाँझ थी तब भी लाठी, गर्भ है तब भी लाठी.
अंगूठा था तब भी लाठी, कलम मिली है तब भी लाठी.
गूंगा था तब भी लाठी, बोल फूटे तब भी लाठी.
अँधा था तब भी लाठी, दीख रहा है तब भी लाठी.
भूखा था तब भी लाठी, खाने लगा तब भी लाठी.
निःशक्त था तब भी लाठी, सशक्त हुआ तब भी लाठी.
निर्वस्त्र था तब भी लाठी, सवस्त्र हूँ तब भी लाठी.
आस्तिक था तब भी लाठी, नास्तिक हूँ तब भी लाठी.
घूंघट में थी तब भी लाठी, बाहर निकली तब भी लाठी.
पवित्र थी तब भी लाठी, लूट ली गई तब भी लाठी.
घर में सोया तब भी लाठी, पगडण्डी पर हूँ तब भी लाठी.
लाठी, लाठी, लाठी, लाठी,
सर से लेकर पाँव तक मुझको अब मिलती है लाठी.
दिन में लाठी, रात में लाठी, सुबह में लाठी, सांझ को लाठी,
बूढ़े-बच्चे, त्रिया-जवान सबको बस मिलती है लाठी.
जन्म में लाठी, जीवन में लाठी,
अब मेरा शव निकलेगा लगता है केवल खाकर लाठी.
लाठी, लाठी, लाठी, लाठी,
लाठी, लाठी, लाठी, लाठी.
मैं अन्य पुरुष हूँ, अतिरिक्त आदमी
जो नहीं है गिनती में
न मारने वाले की न खाने वाले की
कि कितनी मैंने खाई लाठी.
बस यही जाना मैंने कि बरस रही हैं
मुझ पर
लाठी दर लाठी,
लाठी दर लाठी.

30.5.13

आइडिया पैदा करो

पैदा करो, पैदा करो, पैदा करो,


आइडिया पैदा करो

तुम पैदा हुए हो इसलिए पैदा करो
तुम पैदा किये गये हो इसलिए पैदा करो
तुम जीना चाहते हो इसलिए पैदा करो
दूसरों का मुंह सीना चाहते हो इसलिए पैदा करो
अपने पैदाइश पर कुछ खटपटिया पैदा करो
आइडिया पैदा करो

पैदा कुत्ता भी हुआ है
पैदा कुकुरमुत्ता भी हुआ है
पैदा बन्दर भी हुआ है
पैदा सिकंदर भी हुआ है
तुम दो पैरों वाले जानवर
ग़ैरों में अपनी अलग दुनिया पैदा करो
आइडिया पैदा करो

खेत से पैदा हुआ अन्न खाते हो
ट्यूबवेल का पानी डकारते हो
पत्थर से पैदा हुआ सोना पहनते हो
शांत वातावरण में टहलते हो
कुछ नहीं कर सकते नाकारों
तो सोने के लिए एक खटिया पैदा करो
आइडिया पैदा करो

तुम्हारे पूर्वजों ने पैदा किया है आग
तभी तुम पैदा कर पाते हो रोटी
किसी ने पैदा किया हथियार
तभी काट पाते हो किसी को बोटी-बोटी
अपना ही पेट भरने के लिए
चाहे भजिया पैदा करो
पर आइडिया पैदा करो

ओर्विल ने जहाज पैदा करके
तुम्हें आसमान तक पहुँचाया
ग्राहमवेल ने पैदा करके टेलीफोन
धरती का दोनों छोर मिलाया
आर्यभट्ट ने पैदा किया है शून्य
तुम विचारशून्य एक संख्या ही पैदा करो
पर आइडिया पैदा करो

तुम लेटते थे ज़मीन पर
किसी ने गद्दा पैदा किया
किसी ने समाजोपयोगी
तो किसी ने भद्दा पैदा किया
तुम कुछ नहीं कर सकते तो
कुछ घटिया पैदा करो
पर आइडिया पैदा करो

पैदा हुआ है वह भी
जो फुटपाथ पर सोता है
पैदा हुआ है वह भी
वातानुकूलित भवनों में भी रोता है
आज तुम अपने दिमाग से
एक लखपतिया पैदा करो
एक आइडिया पैदा करो.



7.4.13

सांसों की पतंग



मैं
दर्द के सहारे
सांसों की डोर से बंधी हुई
पतंग की तरह
उड़ रहा हूँ.
यह डोर
कब?
कहाँ
और कैसे कट जाएगी?
कौन इसको काट देगा
यह पता नहीं
लेकिन तब तक
मैं
चूम लूँगा
आसमान को
इस दर्द के सहारे.

4.4.13

मेरी जीवन-शैली

तुम चाहो तो मुझसे नफरत कर लो
मगर ये मत चाहो कि मैं
बदल लूं अपनी जीवन शैली
तुम्हारे अनुसार...
फिर मैं कहाँ
रह जाऊंगा
तुम्हीं जियोगे मुझमें भी
अपनी देह बदलकर ...

31.1.13

मृगनयनी



तेरे हुस्न की तारीफ करूं,
ये मेरी की औकात नहीं.
लिखने को जो दे साथ जिंदगी भर,
कोई ऐसा कलम-दावत नहीं.
कहना चाहूँ मिलकर तुमसे,
तो इतनी बड़ी मुलाक़ात नहीं.
बखान करूँ अगर कसकर तुमको बांहों में,
तो इतनी भी लम्बी रात नहीं.
अब तुम्हें क्या लिखूं ऐ मृगनयनी’,
विद्यार्थी के पास कोई बात नहीं.

18.1.13

उन्मत्त मेघ



आज मेघराज,
टकरा रहे हैं रजत चषक,
अपनी
तड़ित, चपला, चंचला अप्सराओं संग
और
कर रहे हैं घोर नाद
अखिल नभ मंडल में.
होकर उन्मत्त
कर रहे हैं नर्तन
समीर सितारी धुनों पर.
टपकाते जा रहे हैं
मधुरस
धरणीसुत के
स्वर्णकलश में