शब्द समर

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15.2.26

साथ, जो शब्दों से परे है...

साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ में खो जाने को।

साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ में खड़े रह जाने को।

साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ में जी लेने को।

साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ मिट जाने को।

साथ होना कोई सामान्य बात नहीं;
साथ होना नहीं है सह-अस्तित्व मात्र,
न ही केवल शब्दों का उच्चारण है,
और 
“मैं हूँ तुम्हारे साथ”— कह देना मात्र,
नहीं है साथ होने का प्रमाण कोई।

साथ होना माँगता है
न्यौछावर हो जाने का निष्कपट भाव;
साथ होना,
आत्म-समर्पण की निष्कलुष साधना है।

साथ होना,
मौन व्रत है अहं-त्याग का;
साथ होना,
परार्थ हेतु विलीन हो जाना है
सम्पूर्ण व्यक्तित्व का।

साथ होना आत्मीयता का अद्वैत-संयोग है—
जिसमें ‘मैं’ और ‘तुम’ का समस्त भेद
का रूपान्तरित हो जाना है
शाश्वत एकत्व में।

साथ होना तभी साथ होना है,
जब उसे ईश्वर समझ लिया जाए;
जो साथ होने को ईश्वर समझ लेता है,
वही सत्य में साथ होना जानता है।


13.2.26

अपरिचित मौन

चलो, उनसे हाथ मिलाओ,
जिन्हें तुम नहीं जानते
और न ही परिचित हैं तुमसे वे ही।

मिलो गले उनसे,
जो नहीं हैं तुम्हारे अपने
न ही तुम लगते हो कुछ भी उनके नाते में।

मिलाओ उनसे हाथ
और महसूस करो उनकी हथेलियों की खुरदुराहट को,
जिनकी भाग्य रेखाओं को घिस दिया है समय ने
फावड़े, कुल्हाड़ी की धार से,
बुहार दिया है झाड़ू की सींकों और तिनकों से।
मजनी ने पोत दिया है कालिमा
जिन गदोरियों पर।
देखो उन्हें
और करो अनुभूति उन सपनों को,
जिनमें सम्पीड़क (रोड रोलर) की भाँति चला है बेलन,
जिन्होंने माँज कर चमकाया बर्तनों को,
परन्तु रगड़कर धो डाला अपने भविष्य को
और परोस दिया दूसरों की थाली में।

मिलो गले उनसे,
सुनो उन धड़कनों के स्वरों को,
जो बोलना तो चाहते हैं
परन्तु शब्दहीनता की लाचारी से
दम तोड़ देते हैं
तुम्हारे कानों तक आने से पूर्व ही।
जो अशिक्षा की भेंट चढ़ गई
और मन से रह गई बौना,
आयु में बड़ी होकर भी,
जो झुक जाती हैं सामने तुम्हारे।
नापो उस गर्दन की ऊँचाई को।

अपने हाथ बढ़ाओ
और थामो उन्हें,
कि उन्हें नहीं आता हाथ पकड़ना।
अपना दिल दिखाओ
और सम्भालो उन्हें,
कि उन्हें तुम्हारी बराबरी का नहीं है कोई ज्ञान।

हाथ मिलाना,
गले मिलना—
केवल व्यवहार नहीं,
प्रेम की निशानी है;
वह प्रेम,
जो अमिट होता है,

अद्वितीय होता है।

9.2.26

प्रियतमा — एक अव्यय प्रेम

'प्रियतमा'
होता है कितना हृदप्रिय संज्ञा यह,
और उससे भी अधिक,
कर्णप्रिय सम्बोधन।

यह बन जाती है क्रिया,
जब होती है प्रेम में,
अपने प्रियतम के,
जिसमें हो जाती है विलीन यह,
यह सोचे बिना,
कि किस प्रकार होगा,
प्रयोग या उपयोग इसका।

प्रेम में सम्पूर्ण समर्पण का गुण ही
बना देता है विशेषण इसे।
विलेयक के रूप में,
विलेय संग घोलकर, अस्तित्व अपना,
बनाती है सन्तुलित विलयन
अभिसार का।
समर्पण की असीमित सम्पूर्णता ही,
इसके क्रिया विशेषण बन जाने की
पहचान है।

यह बन जाती है अव्यय,
जब हो जाती है अडिग और तटस्थ
प्रेम-मार्ग पर,
जहाँ
दो व्यक्तियों के मिलन का समुच्चय बन,
अथाह आनन्द में हो जाती है विभोर,
और प्रफुल्लित।

प्रियतमा,
दुःख, विषाद, वेदना के समय तब
हाय रूपी विस्मयबोधक हो जाती है,
जब उसे कोई प्रिय,
सर्वनाम बना देता है।

प्रियतमा
को संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होना
आहत भी करता है, व्यथित भी।
सर्वनाम हो जाना,
नहीं होता स्वीकार इसे,
किसी भी स्थिति में।
अपनी इस उपेक्षा से
हो जाती है क्रुद्ध,
भर जाती है अनल भाव से,
और बन जाती है विद्रोही भी,
कि यह बनी रहना चाहती है
संज्ञा मात्र, अनन्त काल के लिए।

26.12.25

समय की समाधि

किसी ने पूछा—
"आप कब तक रुकेंगे यहाँ?"

​मैंने कहा—
"एक वर्ष से अधिक
तो 'वर्ष' भी नहीं ठहर पाता कभी;
न ही रुक पाता है 'माह',
अपनी निश्चित अवधि के पार।
​'दिन' तो चौबीस घण्टों में ही
बदल जाता है;
और 'घण्टा'—
एक घण्टा से अधिक भी
पार नहीं कर पाता,
स्थिर रहने के लिए।

​'कला' (मिनट) का जीवन भी
साठ क्षणों से ऊपर नहीं हो पाता;
और 'क्षण'—
क्षण तो क्षण में ही नष्ट हो जाता है।

बचा बेचारा 'निमेष',
तो वह पलक झपकते ही,
विलीन हो जाता है—
अपनी 'समय-समाधि' में।

​तो, मुझसे यह प्रश्न ही अनुचित है,
कि मैं किसी ठौर पर,
कब तक ठहर पाऊँगा!"

15.12.25

भीतरघाती

व्यक्ति को
नहीं मारती जितनी ऊपरी मार;
उससे कहीं अधिक मार डालते हैं
भीतर लगे भीतरघात के कीड़े,
जो खोद-खोद कर
कर डालते हैं खोखला
उसके अन्तर्मन को,
और ध्वस्त कर देते हैं
उसके विश्वास एवं आत्मविश्वास की
सशक्त परतों को भी।

भीतरघाती व्यक्ति
नहीं करता प्रहार सामने से;
बल्कि
स्वार्थसिद्धि की कामना लिए
वह चुपचाप रचता है घात,
और करता है प्रतीक्षा—
अपने लिए उपयुक्त समय की।
बनता है मीत,
करते हुए मनुहार,
जीतता है हृदय—
आहति का।

अन्तर्द्रोही नहीं मारता
एक ही वार में;
चोटिल को,
अपितु
अन्तःघाती बन
मौन भाव से
रचता है षड्यंत्र,
करता है प्रयोग—
साम, दाम, दण्ड, भेद जैसी
दुष्चक्रवर्ती नीतियों का;
और अजगर की भाँति
लपेट कर, मरोड़ कर,
तोड़ डालता है
अरिदण्ड को।

ऊपरी मार से
मर जाता है व्यक्ति
एक ही बार में;
त्याग देता है
भौतिक देह भी।
परन्तु भीतरघात से
जलता है वह तिल-तिल,
घुटता है भीतर-ही-भीतर;
और मरने से पूर्व
बार-बार मरता है—
यह सोचकर
कि जिससे मैंने प्यार किया,
उसने ही मुझ पर
वार किया।

भीतरघात से
व्यक्ति मरता तो नहीं,
किन्तु मर जाता है—
मन-ही-मन।

कमाल करते हो

ख़ून से सने अख़बार से हाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

घुँघरू हो चुके टीवी से ख़याल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

बिक चुकी कलम का मलाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

लुटी हुई इज़्ज़त का जमाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

ख़बरची का दर्द-ए-हवाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

चाल से हुए बेचाल की चाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

मीडिया कितना हुआ ज़वाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो। 

ताल पर नाचा कितने ताल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

क्या सबका लहू होता है लाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

आबरू का कौन है दलाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

अच्छे दिनों का मेरे जलाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

किस हक़ से तुम मेरा अहवाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

शब्दार्थ-
मलाल — पछतावा
जमाल — खूबसूरती
हवाल — दुर्दशा
जवाल — गिरा हुआ
खबरची 
 पत्रकार
जलाल — महिमा
अहवाल — समाचार

3.12.25

इंसान का गिरगिटापन

वो कहते हैं
"तुम रंग बदलो। 
तुम लाल हो तो लाल को बदलो
तुम हरे हो तो हरे को बदलो
तुम नीले हो तो नीले को बदलो
तुम काले हो तो काले को बदलो।" 

यह बात सुन रहा था गिरगिट कहीं। 
उसे लगा यह बड़ा अजीब। 
बोला बड़ी ज़ोर से — 
"ओ रंग से जाति पहचानने वालों
जब सारा रंग मनुष्य ही बदल देगा
तो क्या मैं तुम इंसानों की तरह
इस दुनिया में 
तिलक-टोपी लगाकर
तीर-तलवार, बन्दूकें लेकर
नफ़रत और दंगे फैलाने आया हूँ

भाई
जो काम मेरा है
वो मुझे करने दो। 
तुम्हारा काम है  
दुनिया रूपी बग़ीचे में
दया-करुणा के पानी से सींचकर,
इंसान रूपी फूल खिलाना
कड़वाहट के काँटे निकालकर
प्यार-मोहब्बत की खुशबू बिखेरना। 

रंग तो कुदरत की देन है
और कुदरत 

हमेशा बहुत ही खूबसूरत होती है।
 

तुम उसमें भेद न डालो।"