एक सहेली ने दूसरी से पूछा—
"बहन! होने वाला है तेरा
विवाह।
कैसे सम्भालेगी सब कुछ?"
वह मुस्कराकर बोली—
“मैं आदर्श बहू बनकर रहूँगी।
दुनिया को दिखाऊँगी
कि एक सभ्य, सुशील, संस्कारी और गुणी बहू
कितनी अच्छी होती है,
और कितनी महान।
मैं महानता के उस चरम को प्राप्त
करूँगी,
जिसे आज तक
कोई बहू प्राप्त न कर सकी
होगी।"
निःश्वास के साथ बोली पहली सहेली—
"गुइयाँ!
तुझे देती हूँ एक सलाह मैं।
अच्छी बहू बनना,
पर महान मत बनना।
क्योंकि इस समाज ने
'महान बहू' की जो परिभाषा गढ़ी है,
वह किसी योगी की तपस्या से भी
अत्यन्त दुष्कर है।
उसमें स्त्री
देह से तो जीती है,
पर आत्मा से
तिल-तिल,
जीते-जी
घुट-घुटकर मरती है।
महान बहू वही कहलाती है—
जो सुन्दर चेहरा होते हुए भी
घूँघट में बन्द रहे।
जिसके पास वाणी हो,
फिर भी गूँगी बनी रहे।
जो भूखी हो,
फिर भी सबसे अन्त में खाए।
जो थकी हुई हो,
फिर भी बर्तन माँजे,
झाड़ू लगाए,
घर के सभी काम-काज पूरे करे,
और सास-ससुर व पति की सेवा के बाद
ही
शयन करे।
जिसे श्रृंगार का शौक हो,
फिर भी न सजे,
न धजे।
सुहागिन होते हुए भी
वैधव्य-सा जीवन जिए।
वह कलायामी हो,
फिर भी न नाचे,
न गाए।
यहाँ तक कि
बाजे-गाजे के स्वर सुनकर भी
घर के किसी कोने में
गुमसुम पड़ी रहे।
वह शक्तिशाली हो,
किन्तु ताने सुने,
मार सहे,
और हर अत्याचार को
अपना भाग्य मानकर
भुगतती रहे।
सम्पूर्ण भवन की मालकिन होते हुए
भी
नौकरानी बनकर जिए।
सामर्थ्यवान होते हुए भी
अबला बनकर रहे।
यूँ तो गृहलक्ष्मी कहलाए,
किन्तु अपनी दैनिक आवश्यकताओं के
लिए भी
भिखारी बनी रहे।
ज्ञान होते हुए भी
चर्चा में सम्मिलित होने का साहस न
दिखाए।
बल्कि मूर्खों की तरह
दूसरों की अनुचित बातों पर भी
हाँ में हाँ मिलाए।
समय बीत जाने पर भी
इन्तज़ार में
अपने दिन काटती रहे।
अपनी स्वतन्त्रता का त्याग कर,
आजीवन
एक कैदी की भाँति
घर की चहारदीवारी में बन्द रहे।
अपना सम्पूर्ण जीवन
पराश्रय में बिता दे,
चाहे आत्मनिर्भर बनने में
पूर्णतः सक्षम ही क्यों न हो।
याद रखना—
इस समाज की बनाई हुई
'महानता' की नींव में,
आदर्शों की पृष्ठभूमि में,
अक्सर केवल
खुशियों की कब्र,
सुखों की समाधि,
पीड़ा का पहाड़
और दुःखों का अम्बार
छिपा होता है।
सखी!
यहाँ ऐसे भी लोग हैं,
जो मात्र लाठी से मारकर
जान से नहीं मारते;
बल्कि तुम्हारे अधिकार लूटकर,
तुम्हारा चरित्र छीनकर,
तुम्हें विवश बनाकर,
फिर ताने मार-मारकर,
बिना मारे ही
मार डालते हैं।
फिर तुम्हारी अकाल मृत्यु को
महानता का रूप देकर,
उसे महिमामण्डित कर,
स्वयं को मुक्त कर लेते हैं
तुम्हारे ऊपर किए गए
अपने जघन्य अपराधों
और कुकृत्यों से।
इसलिए
अपने काम करते जाना,
जो उचित हो,
वह सत्कार करते जाना।
तुम
गुमनाम भले ही रह जाना,
किन्तु महान मत बनना।
इसी में
तेरी भलाई है।"



