सूर्योदय
क्षितिज का पुत्र,
जो प्रति-प्रभात
पूर्व दिशा में
उसके गर्भ से जन्म लेता है,
और साँझ होते ही
पश्चिम की गोद में समा जाता है।
सूर्य प्रति-साँझ डूबता है,
ताकि वह दे सके सुखद विश्राम—
थके हुए तन को,
उलझे हुए मन को,
दौड़ते-भागते जन को।
कभी-कभी
किसी का अस्त होना भी,
दूसरों के लिए
सुख की अनुभूति दे जाता है।
कर्त्तव्य-परायणता की भाषा में,
इसे ही ‘बलिदान’ कहते हैं।
शब्द समर
विशेषाधिकार
10.5.26
अस्त में उदय
3.4.26
जब राष्ट्र भीतर से हारता है
जब कोई राष्ट्र,
किसी अन्य राष्ट्र से पराजित होता है,
तो वह पराजय नहीं होती;
केवल उसकी सीमाओं की
या उसके शासक की
वह होती है उससे भी व्यापक
और कहीं अधिक गहरी।
उस क्षण—
सबसे पहले आहत होता है
उस राष्ट्र का सम्विधान,
उसकी आत्मा में रची-बसी संस्कृतियाँ,
उसकी जीवित परम्पराएँ,
उसकी सम्वेदनशील रीतियाँ,
और उसकी मधुर भाषाएँ।
पराजित होता है—
वह प्रत्येक नागरिक,
जो अपने राष्ट्र से,
प्राणों से भी अधिक प्रेम करता है;
जिसकी धड़कनों में
अपने देश का स्पन्दन बसता है।
यह पराजय मात्र एक घटना नहीं,
बल्कि एक ऐसे युग का आरम्भ है,
जिसमें परिवर्तन हो जाते हैं अनिवार्य—
ऐसे परिवर्तन,
जिन्हें कोई भी अपनाना नहीं चाहता स्वेच्छा से।
विजेता राष्ट्र का शासन,
अपने नवीन सम्विधान
और कठोर प्रावधानों के बल पर,
थोप देता है
अपने नियमों और व्यवस्थाओं को।
परिणामस्वरूप—
पराजित राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति
विवश हो जाता है,
उन परिवर्तनों को स्वीकारने के लिए;
भले ही उसके हृदय में
पीड़ा, अस्वीकार
और असहायता की
गहरी लहरें उठती रहें।
इस प्रकार—
एक राष्ट्र की हार
केवल युद्धभूमि पर नहीं होती;
वह उसकी आत्मा,
उसकी पहचान,
और उसके अस्तित्व की गहराइयों तक
उतरकर—
20.3.26
वह एक स्त्री है
वह हो सकती है बीवी,
या बहू किसी के लिए।
लेकिन वह एक स्त्री है,
माँ है
उस नवजात की,
जिसने अभी तक नहीं खोली हैं आखें।
इसलिए हर वह उपाय सोचो, और करो,
जिससे बचायी जा सके हर वह स्त्री,
जिसका स्वयं का अस्तित्व है मूल्यवान,
और जो है—कोई बेटी, बहन, पत्नी, बहू,
और इस संसार की सबसे बड़ी शक्ति,
माँ किसी अबोध की।
"कोई स्त्री इसलिए नहीं मर रही कि वह बीमार है,
बल्कि वह इसलिए मर जाती है,
क्योंकि समाज ने यह निर्धारित नहीं किया है
कि उसकी जान बचानी है।"
10.3.26
तुम देवि नहीं, स्त्री हो
तुम देवि नहीं,
स्त्री हो।
‘स्त्री’ शब्द ही अपने-आप में पूर्ण विराम है;
किन्तु हर पूर्णता से पूर्व
तुम भी अर्ध-अल्प, प्रश्न, आश्चर्य-रूपी
विराम-चिह्नों से सजा हुआ
एक वाक्य हो।
वाक्य अपने-आप में पूर्ण विचार-स्थल होता है;
किन्तु हर विचार से पूर्व
तुम नव-स्थायी भावों, विधान-निषेध, आज्ञीच्छिक,
सन्देह और प्रश्न-रूपी वाक्य-वाक्यांशों से सुसज्जित
एक अनुच्छेद हो।
कहने के लिए तो अनुच्छेद स्वयं ही
एक पूर्ण कथा-स्थल है;
किन्तु तुम अपने भीतर
किंवदंतियों, कविताओं, गीतों, रहस्यों
और कथानकों में निहित चरित्रों की
छोटी-बड़ी भूमिकाओं को
जीवन-मृत्यु देने वाली
एक गूढ़ उपन्यास हो।
वास्तव में तुम गूढ़ हो उनके लिए
जो तुम्हारी भाषा से अनभिज्ञ हैं;
अन्यथा कहते हैं—
“एक पुस्तक सहस्र मित्र के समान होती है।”
तुम हर चरित्र को उजागर करती हुई
वही एक खुली किताब हो,
जो हर व्यक्ति के छाती से चिपक
उसके जीवन को
एक सुखद रूप प्रदान करती हो।
तुम असंख्य किताबों को जन्म देने की प्रेरणा हो;
तुम सर्वस्व हो उसके लिए
जो चाहता है
कुछ भी सृजित करना इस संसार में।
तुम हर सर्जक की जननी हो।
एकमात्र तुम्हीं हो कथाकार।
वास्तव में तुम्हीं हो
इस सृष्टि की रचनाकार;
क्योंकि तुम देवि नहीं, स्त्री हो।
और स्त्री अपने-आप में पूर्ण होती है,
अपने भीतर लघु-दीर्घ गुण-दोषों को
समेटे हुए।
तुम नहीं हो देवि
किसी भी अवस्था में—
यह बात उतार लो
अपने मन की भाषा में
पूरी स्पष्टता से।
और यदि कोई करता है चेष्टा
तुम्हें स्त्री से देवि घोषित करने की,
तो उसे अशुद्ध और अमान्य
प्रमाणित कर दो
अपने जीवन के व्याकरण से;
कि कोई तुम्हारी
सहजता, सरलता, कोमलता,
धैर्य, संवेदना और साहस
रूपी विशेषणों को
पौराणिक कथानक का रूप
न दे पाए।
तुम देवि नहीं—
जीवित चेतना हो,
स्वतन्त्र विचार हो,
और अपने सम्पूर्ण मानवीय स्वरूप में
एक पूर्ण स्त्री हो।
तुम स्त्री हो—
यही तुम्हारी विशेषता है,
यही तुम्हारी गूढ़ता है,
यही तुम्हारा रूप है,
यही तुम्हारा चरित्र है;
और यही तो तुम्हारी सुन्दरता है—
कि तुम स्त्री हो:
न किसी से अधिक,
न किसी से कम।
पिया नहीं आए
कवने सवतिया से नेहा लड़ाए?
मोरे पिया नहीं आए।
रात अँहरिया बीते ना बिताए,
मोरे पिया नहीं आए।
बाली रे उमर में तो आई ससुररिया,
सेजिया प एकले ना बीते रे उमरिया।
जोबन चिरइया मोर कुहू-कुहू गाए—
मोरे पिया नहीं आए।
घरवा के भार ढोवले गए रे बिदेसवा,
चिठिया न भेजे, नाहीं भेजले सनेसवा।
रोटिया ऊ जिमले कि सूतल बिना खाए—
मोरे पिया नहीं आए।
टक-टक ताकेउँ तोहर डहरिया,
छिन-छिन खोलेउँ दौड़ि किवरिया।
अँखियन काटि-काटि रतिया बिताए—
मोरे पिया नहीं आए।
बिन पिया जिनगी त लागे रे पहरिया,
सून-सून लागे मोरे दाहिने सेजरिया।
अँखिया के लोर मोर तकिया भिगाए—
मोरे पिया नहीं आए।
सूना-सूना लागे मोहे तीज-तिहरवा,
सासुर सुहाए न ही भाए पिहरवा।
फागुन के रंग हिय में बरछी गड़ाए—
मोरे पिया नहीं आए।
कइसे बिताऊँ इहाँ दिन अउ रतिया?
पियवा त रखले उहाँ मोर सवतिया।
मोर सैयाँ मोर सुरतिया भुलाए—
मोरे पिया नहीं आए।
सुनु रे सखी, मोर संघी पनिहरिया,
तोर पिया जइहैं जब उनके सहरिया।
मोर सनेस तू त दिहे रे भिजाए—
मोरे पिया नहीं आए।
कहिहे— “सुनहु मोर बलम पुरबिया,
भेजले सनेस तोहर बउरी गुलबिया।”
पति मोर पतिया के लेहू बँचाए—
मोरे पिया नहीं आए।
कइसे रे मैं अपना जोबन बचाऊँ?
निकरूँ जो घर से, तो मरि-मरि जाऊँ।
गउँआँ लोग मो पे नजर गड़ाए—
मोरे पिया नहीं आए।
पिया जो न अइहैं, हमका न पइहैं;
हमका जो पइहैं, बेसुध ही पइहैं।
बिरही बइठि के बिरह
गीत गाए—
मोरे पिया नहीं आए।
15.2.26
साथ, जो शब्दों से परे है...
साथ कहते हैं—
साथ में खो जाने को।
साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ में खड़े रह जाने को।
साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ में जी लेने को।
साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ मिट जाने को।
साथ होना कोई सामान्य बात नहीं;
साथ होना नहीं है सह-अस्तित्व मात्र,
न ही केवल शब्दों का उच्चारण है,
और
“मैं हूँ तुम्हारे साथ”— कह देना मात्र,
नहीं है साथ होने का प्रमाण कोई।
साथ होना माँगता है
न्यौछावर हो जाने का निष्कपट भाव;
साथ होना,
आत्म-समर्पण की निष्कलुष साधना है।
साथ होना,
मौन व्रत है अहं-त्याग का;
साथ होना,
परार्थ हेतु विलीन हो जाना है
सम्पूर्ण व्यक्तित्व का।
साथ होना आत्मीयता का अद्वैत-संयोग है—
जिसमें ‘मैं’ और ‘तुम’ का समस्त भेद
का रूपान्तरित हो जाना है
शाश्वत एकत्व में।
साथ होना तभी साथ होना है,
जब उसे ईश्वर समझ लिया जाए;
जो साथ होने को ईश्वर समझ लेता है,
वही सत्य में साथ होना जानता है।
13.2.26
अपरिचित मौन
जिन्हें तुम नहीं जानते
और न ही परिचित हैं तुमसे वे ही।
मिलो
गले उनसे,
जो नहीं हैं तुम्हारे
अपने
न ही तुम लगते हो कुछ
भी उनके नाते में।
मिलाओ
उनसे हाथ
और महसूस करो उनकी
हथेलियों की खुरदुराहट को,
जिनकी भाग्य रेखाओं
को घिस दिया है समय ने
फावड़े, कुल्हाड़ी की धार से,
बुहार दिया है झाड़ू
की सींकों और तिनकों से।
मजनी ने पोत दिया है
कालिमा
जिन गदोरियों पर।
देखो उन्हें
और करो अनुभूति उन
सपनों को,
जिनमें सम्पीड़क (रोड
रोलर) की भाँति चला है बेलन,
जिन्होंने माँज कर
चमकाया बर्तनों को,
परन्तु रगड़कर धो
डाला अपने भविष्य को
और परोस दिया दूसरों
की थाली में।
मिलो
गले उनसे,
सुनो उन धड़कनों के
स्वरों को,
जो बोलना तो चाहते हैं
परन्तु शब्दहीनता की
लाचारी से
दम तोड़ देते हैं
तुम्हारे कानों तक
आने से पूर्व ही।
जो अशिक्षा की भेंट
चढ़ गई
और मन से रह गई बौना,
आयु में बड़ी होकर भी,
जो झुक जाती हैं
सामने तुम्हारे।
नापो उस गर्दन की
ऊँचाई को।
अपने
हाथ बढ़ाओ
और थामो उन्हें,
कि उन्हें नहीं आता
हाथ पकड़ना।
अपना दिल दिखाओ
और सम्भालो उन्हें,
कि उन्हें तुम्हारी
बराबरी का नहीं है कोई ज्ञान।
हाथ मिलाना,
गले मिलना—
केवल व्यवहार नहीं,
प्रेम की निशानी है;
वह प्रेम,
जो अमिट होता है,
अद्वितीय
होता है।




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