शब्द समर

विशेषाधिकार

भारतीय दंड संहिता के कॉपी राईट एक्ट (1957) के अंतर्गत सर्वाधिकार रचनाकार के पास सुरक्षित है|
चोरी पाए जाने पर दंडात्मक कारवाई की जाएगी|
अतः पाठक जन अनुरोध है कि बिना रचनाकार के अनुमति के रचना का उपयोग न करें, या करें, तो उसमें रचनाकार का नाम अवश्य दें|

26.9.26

सरहदें

सरहदें कभी शान्त नहीं होतीं,
बस, उनकी शक्ल बदल जाती है।

जब देशों की सरहदों पर
छा जाता है सन्नाटा,
तभी कहीं-कहीं,
कभी-कभी,
दो भाइयों के बीच
खिंच जाती है
एक नई सरहद।

देशों के बीच छिड़ी जंग
अक्सर सियासत की बिसात पर
कुछ लोग खेलते हैं,
फैसले कुछ लोग करते हैं,
मगर उनकी कीमत
दूसरे लोग
और उनकी आने वाली पीढ़ियाँ
चुकाती हैं।

घर उजड़ते हैं,
शहर खामोश हो जाते हैं,
बच्चों के हाथों से
खिलौने छूट जाते हैं,
माओं की आँखों में
इंतज़ार ठहर जाता है।

और किसी सैनिक की वर्दी में
कभी लौटती है
एक तस्वीर,
कभी सिर्फ़
एक खबर।

दो भाइयों के बीच की जंग
किसी सरहद पर नहीं लड़ी जाती—
वह तो उसी घर में शुरू होती है,
जहाँ कभी एक ही थाली में
दोनों ने खाना खाया था,
एक ही आँगन में खेले थे,
और माँ की गोद में
साथ-साथ सोए थे।

वही घर,
जहाँ कभी हँसी की आवाज़ें थीं,
वहीं एक दिन
हिस्सों की रेखाएँ खिंच जाती हैं।

कभी ज़मीन के एक टुकड़े के लिए,
कभी विरासत के लिए,
कभी थोड़ा ज़्यादा हासिल कर लेने की चाह में,
और कभी उस अहंकार में,
जहाँ अपना ही भाई
अपना दुश्मन दिखाई देने लगता है।

देशों की जंग में
शहर जलते हैं,
भाइयों की जंग में
घर जलते हैं।

देशों की लड़ाई
सीमाएँ बदल सकती है,
भाइयों की लड़ाई
रिश्तों की नींव हिला देती है।

देश की सरहद पर चली गोली
शायद एक सैनिक को गिराती है,
मगर भाइयों के बीच निकला
एक कड़वा शब्द भी
पूरे घर की शान्ति में ताण्डव मचा देता है।

यह लड़ाई
हथियारों से लड़ी जाए
या शब्दों से—
खून बहता है दोनों में;
कहीं ज़मीन पर,
कहीं रिश्तों के भीतर।

और सबसे ज़्यादा
छलनी होता है
उस माँ-बाप का सीना,
जिन्होंने दोनों को
एक ही खून से सींचा था,
एक ही दुआ में पाला था,
एक ही सपने में
बड़ा होते देखा था।

सरहदें देशों के बीच हों,
तो भी दर्द होता ही है;
परन्तु सरहदें
जब दो भाइयों के बीच खिंचती हैं,
तो सिर्फ़ दो लोग नहीं बिछड़ते—
एक पूरा घर
धीरे-धीरे उजड़ जाता है।

इसलिए सरहदें चाहे
नक्शे पर खिंचें
या दिलों के बीच,
हर रेखा के उस पार
किसी का कोई अपना ही होता है।

क्या मर रही है मानवता मेरी...?

किसी लड़की का बलात्कार हुआ,
किसी के साथ छेड़छाड़ हुई;
किसी की हुई नृशंस हत्या,
कहीं चोरी हुई, कहीं लूट,
कहीं डकैती हुई।

कहीं पति ने
पत्नी का हर लिया जीवन ही,
तो कहीं पत्नी ने ही
पति को उतार दिया मृत्यु के घाट।

कहीं सन्तानों ने निकाल दिया
अपने ही माता-पिता को घर से,
तो कहीं माता-पिता ने ही
घोंट दिया गला
अपने ही नवजात शिशु का।

ये सारे वृत्तान्त
घूमते रहते हैं,
गूँजते रहते हैं
दिन-प्रतिदिन
आँखों और कानों में-
पत्र-पत्रिकाओं,
दूरदर्शन, आकाशवाणी
और सामाजिक संजालों के माध्यम से।

परन्तु न तो मेरे मस्तिष्क में
होती है हलचल कोई,
न ही हृदय में उठती है
कोई ज्वाला,
देख-सुनकर
इन दुर्दान्त घटनाओं को।
और कई बार तो
अनसुना या अनदेखा कर दिया मैंने
इन भीषण वृत्तान्तों को-
मानो घटा ही न हो कुछ,
और न हो मेरी अपनी पीड़ा ये।
 
बीते कितने ही दिन,
कितने मास,
कितने वर्ष हो गए;
पर मेरे हृदय में
एक कम्पन तक न हुई,
न ही उठी तनिक सिहरन भी
इन हृदयविदारक आघातों से।

बैठा हूँ सोचता-
आखिर क्यों हुआ होगा ऐसा?
क्या मैं ही हो चुका हूँ
हृदयहीन?
या मर चुके हैं
करुणा के वे भाव
जो कभी मेरे हृदय में जीवित थे?
क्या बैठ गया है
कोई भय मेरे भीतर भी?
या फिर पड़ता ही नहीं
मुझ पर कोई अन्तर?

क्या प्राप्त कर चुका हूँ मैं
उस स्थिति को,
जिसे कहते हैं-
स्थितप्रज्ञता,
जहाँ मनुष्य
सुख-दुःख से परे हो जाता है? 

या फिर निरन्तर मिलते रहे
इन आघातों से
इतना भर चुका है हृदय,
कि अब किसी पीड़ा के लिए
उसमें स्थान ही शेष नहीं?

या बन चुकी है
मेरी प्रवृत्ति ही ऐसी-
इन घटनाओं को सुनना,
कुछ क्षण ठहरना,
और फिर
उन्हें उपेक्षित कर देना?

भाव जो भी हों,
कारण जो भी हो-
पर ये भाव
मानवता के तो नहीं हैं;
और न ही
देशहित में हैं।

यदि इन निर्दयी,
इन भयावह वृत्तान्तों से
नहीं पिघलता हृदय मेरा,
यदि किसी पीड़ा का
नहीं होता तनिक भी आभास,
यदि किसी करुण क्रन्दन से
नहीं काँपती आत्मा मेरी-
तो निश्चय ही
मर रहा हूँ मैं,
और मेरे साथ-साथ
मर रही है मानवता मेरी।

मेरा न सुनना,
न बोलना,
न लिखना,
न किसी को बताना,
इन घटनाओं को
अपने भीतर ही दबा जाना-
चलती हुई साँसों के साथ
एक मृत देह को
ढोने के अतिरिक्त
और कुछ नहीं है।

क्योंकि मनुष्य होना
मात्र साँस लेना नहीं,
पीड़ा को अनुभव करना भी है;
अन्याय को देखकर
अन्तरात्मा का काँप उठना भी है;
और जहाँ आवश्यक हो,
वहाँ बोल उठना भी है। 
जिस हृदय में
करुणा नहीं,
जिस वाणी में
प्रतिरोध नहीं,
जिस चेतना में
मानवता नहीं-
वह हृदय,
वह वाणी,
वह चेतना
जीवित होकर भी
मृत ही है।

और तब प्रश्न यह नहीं होगा
कि संसार में
इतनी निर्दयता क्यों है-
प्रश्न यह होगा कि
उस निर्दयता को देखकर
मैं स्वयं
इतना सम्वेदनहीन क्यों हो गया हूँ?
कहीं ऐसा तो नहीं
कि दूसरों की मृत्यु की
बार-बार आती इन वार्ताओं के बीच
चुपचाप,
बिना किसी आहट के,
शनैः-शनैः
मर रही है मानवता मेरी।

14.9.26

हे स्त्री! कब तक?

 हे स्त्री!

तुम हो स्त्री—

अर्थात्, जन्मजात मूर्ख,
अपढ़, जड़,

चेतना और विचार से रहित;

पुरुष-वर्ग की तुलना में

तुम हो

निपट बुद्धिहीन!

 

हे स्त्री!

तुमसे डरता है

समस्त पुरुष-समाज;

घर में रहती हो तुम

बाघिन-सी—

और तुम्हारे पुरुष

तथा तुम्हारे बच्चे

मेमनों-से सहमे रहते हैं।

 

हे स्त्री!

तुम लाख कर लो

तीज, करवा-चौथ,

वट-सावित्री,

सोमवती अमावस्या के व्रत;

या पिला दो चाहे

अमृत से भरा

समस्त कलश

अपने पति को;

या त्याग दो

अपने प्राण ही

उसके हित में—

 

फिर भी,

हे स्त्री!

वह कभी नहीं होगा

कृतज्ञ तुम्हारा।

 

क्योंकि पुरुषवादी-प्राणी

होता ही है

कृतघ्न अतीव;

जो आभारी होने के स्थान पर

करता रहता है

उपहास तुम्हारा—

हर मंच पर,

हर समाज में,

हर व्यक्ति के सम्मुख।

 

हे स्त्री!

तुम व्रत करो

या न करो—

यह निर्णय तुम्हारा

और तुम्हारी निजी आस्था

और विश्वास का है।

 

तुम चलती हो,

सहती हो,

सृजती हो;

और जीवन के प्रत्येक अंधकार में

स्वयं दीप बनकर

दूसरों का पथ

आलोकित करती हो।

 

पश्चात् इसके भी—

होती हो

अपमानित ही!

 

तुम्हारा त्याग

उसके लिए कर्तव्य है;

तुम्हारा समर्पण

उसके लिए अधिकार;

तुम्हारा मौन

उसकी विजय,

और तुम्हारी वेदना—

उसके उपहास का विषय।

 

तुम्हारे लिए

प्रत्येक सभा

कुरु-राजसभा ही होती है,

जहाँ दूसरों सहित

तुम्हारे अपने ही पुरुष के भीतर

ही वास करते हैं

दुर्योधन और दुःशासन—

जैसे कलुषित विचार,

जो तुम्हारा अपमान करना

समझते हैं

निजी अधिकार अपना।

 

परन्तु सोचो—

कब तक कराओगी चीरहरण तुम

अपने ही सम्मान का?

कब तक मौन रहेगा

स्वर तुम्हारा

अनुचित उपहास के विरुद्ध भी?

 

उठो!

तनकर खड़ी हो जाओ;

स्वर दो

अपने मौन को,

अपने अपमान को

प्रतिरोध दो—

 

और जो तुम्हें

दुर्बल समझकर

तुम पर हँसते हैं,

बता दो उन्हें—

 

कि

स्त्री सहनशील हो सकती है,

पर असहाय नहीं;

स्त्री करुण हो सकती है,

पर कायर नहीं;

स्त्री त्याग कर सकती है,

पर अपना सम्मान

कभी त्याग नहीं सकती!

28.7.26

सास

सास अपनी बहू के लिए
कभी माँ नहीं बन पातीं;
वे सदैव माँ ही रह जाती हैं—
मात्र अपने बेटे की।

कई बार तो वे
नहीं बन पातीं दादी  
अपनी पोती की भी,
और रह जाती हैं
केवल अपने पोते की दादी।

सदियों की परम्पराओं
की रस्सियों से बँधी,
ससुराल-रूपी कारागार में बन्द,
समाज के आदेशों का
यन्त्रवत् पालन करती हुई,
वे अपनी स्वतन्त्रता को
भूल चुकी होती हैं।

अपने साथ हुए
व्यवहारों को ही
विधि का विधान मानकर,
घूँघट तले घुटती हुई,
वे घोंट डालती हैं
गला अपनी बहुओं की
स्वतन्त्रता का भी।

और फिर—
बहू एक दिन सास बन जाती है।

वह भी अपनी
नवीन बहू को
स्वतन्त्रता नहीं दे पाती;
क्योंकि वह त्याग नहीं पाती
सास होने का मोह
और ससुराल में
वर्षों संघर्षों के पश्चात् प्राप्त
अपनी सत्ता का आकर्षण।

यह क्रम
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
निरन्तर चलता ही आ रहा है। 

न जाने—
कोई बहू,
स्वयं सास बनने के उपरान्त,
रोकना भी चाहेगी क्या,
इस परम्परा को?