बस, उनकी शक्ल बदल जाती है।
जब देशों की सरहदों पर
छा जाता है सन्नाटा,
तभी कहीं-कहीं,
कभी-कभी,
दो भाइयों के बीच
खिंच जाती है
एक नई सरहद।
देशों के बीच छिड़ी जंग
अक्सर सियासत की बिसात पर
कुछ लोग खेलते हैं,
फैसले कुछ लोग करते हैं,
मगर उनकी कीमत
दूसरे लोग
और उनकी आने वाली पीढ़ियाँ
चुकाती हैं।
घर उजड़ते हैं,
शहर खामोश हो जाते हैं,
बच्चों के हाथों से
खिलौने छूट जाते हैं,
माओं की आँखों में
इंतज़ार ठहर जाता है।
और किसी सैनिक की वर्दी
में
कभी लौटती है
एक तस्वीर,
कभी सिर्फ़
एक खबर।
दो भाइयों के बीच की जंग
किसी सरहद पर नहीं लड़ी
जाती—
वह तो उसी घर में शुरू
होती है,
जहाँ कभी एक ही थाली में
दोनों ने खाना खाया था,
एक ही आँगन में खेले थे,
और माँ की गोद में
साथ-साथ सोए थे।
वही घर,
जहाँ कभी हँसी की आवाज़ें
थीं,
वहीं एक दिन
हिस्सों की रेखाएँ खिंच
जाती हैं।
कभी ज़मीन के एक टुकड़े के
लिए,
कभी विरासत के लिए,
कभी थोड़ा ज़्यादा हासिल
कर लेने की चाह में,
और कभी उस अहंकार में,
जहाँ अपना ही भाई
अपना दुश्मन दिखाई देने
लगता है।
देशों की जंग में
शहर जलते हैं,
भाइयों की जंग में
घर जलते हैं।
देशों की लड़ाई
सीमाएँ बदल सकती है,
भाइयों की लड़ाई
रिश्तों की नींव हिला देती
है।
देश की सरहद पर चली गोली
शायद एक सैनिक को गिराती
है,
मगर भाइयों के बीच निकला
एक कड़वा शब्द भी
पूरे घर की शान्ति में ताण्डव
मचा देता है।
यह लड़ाई
हथियारों से लड़ी जाए
या शब्दों से—
खून बहता है दोनों में;
कहीं ज़मीन पर,
कहीं रिश्तों के भीतर।
और सबसे ज़्यादा
छलनी होता है
उस माँ-बाप का सीना,
जिन्होंने दोनों को
एक ही खून से सींचा था,
एक ही दुआ में पाला था,
एक ही सपने में
बड़ा होते देखा था।
सरहदें देशों के बीच हों,
तो भी दर्द होता ही है;
परन्तु सरहदें
जब दो भाइयों के बीच
खिंचती हैं,
तो सिर्फ़ दो लोग नहीं
बिछड़ते—
एक पूरा घर
धीरे-धीरे उजड़ जाता है।
नक्शे पर खिंचें
या दिलों के बीच,
हर रेखा के उस पार
किसी का कोई अपना ही होता है।



