शब्द समर

विशेषाधिकार

भारतीय दंड संहिता के कॉपी राईट एक्ट (1957) के अंतर्गत सर्वाधिकार रचनाकार के पास सुरक्षित है|
चोरी पाए जाने पर दंडात्मक कारवाई की जाएगी|
अतः पाठक जन अनुरोध है कि बिना रचनाकार के अनुमति के रचना का उपयोग न करें, या करें, तो उसमें रचनाकार का नाम अवश्य दें|

13.2.26

अपरिचित मौन

चलो, उनसे हाथ मिलाओ,
जिन्हें तुम नहीं जानते
और न ही परिचित हैं तुमसे वे ही।

मिलो गले उनसे,
जो नहीं हैं तुम्हारे अपने
न ही तुम लगते हो कुछ भी उनके नाते में।

मिलाओ उनसे हाथ
और महसूस करो उनकी हथेलियों की खुरदुराहट को,
जिनकी भाग्य रेखाओं को घिस दिया है समय ने
फावड़े, कुल्हाड़ी की धार से,
बुहार दिया है झाड़ू की सींकों और तिनकों से।
मजनी ने पोत दिया है कालिमा
जिन गदोरियों पर।
देखो उन्हें
और करो अनुभूति उन सपनों को,
जिनमें सम्पीड़क (रोड रोलर) की भाँति चला है बेलन,
जिन्होंने माँज कर चमकाया बर्तनों को,
परन्तु रगड़कर धो डाला अपने भविष्य को
और परोस दिया दूसरों की थाली में।

मिलो गले उनसे,
सुनो उन धड़कनों के स्वरों को,
जो बोलना तो चाहते हैं
परन्तु शब्दहीनता की लाचारी से
दम तोड़ देते हैं
तुम्हारे कानों तक आने से पूर्व ही।
जो अशिक्षा की भेंट चढ़ गई
और मन से रह गई बौना,
आयु में बड़ी होकर भी,
जो झुक जाती हैं सामने तुम्हारे।
नापो उस गर्दन की ऊँचाई को।

अपने हाथ बढ़ाओ
और थामो उन्हें,
कि उन्हें नहीं आता हाथ पकड़ना।
अपना दिल दिखाओ
और सम्भालो उन्हें,
कि उन्हें तुम्हारी बराबरी का नहीं है कोई ज्ञान।

हाथ मिलाना,
गले मिलना—
केवल व्यवहार नहीं,
प्रेम की निशानी है;
वह प्रेम,
जो अमिट होता है,

अद्वितीय होता है।

9.2.26

प्रियतमा — एक अव्यय प्रेम

'प्रियतमा'
होता है कितना हृदप्रिय संज्ञा यह,
और उससे भी अधिक,
कर्णप्रिय सम्बोधन।

यह बन जाती है क्रिया,
जब होती है प्रेम में,
अपने प्रियतम के,
जिसमें हो जाती है विलीन यह,
यह सोचे बिना,
कि किस प्रकार होगा,
प्रयोग या उपयोग इसका।

प्रेम में सम्पूर्ण समर्पण का गुण ही
बना देता है विशेषण इसे।
विलेयक के रूप में,
विलेय संग घोलकर, अस्तित्व अपना,
बनाती है सन्तुलित विलयन
अभिसार का।
समर्पण की असीमित सम्पूर्णता ही,
इसके क्रिया विशेषण बन जाने की
पहचान है।

यह बन जाती है अव्यय,
जब हो जाती है अडिग और तटस्थ
प्रेम-मार्ग पर,
जहाँ
दो व्यक्तियों के मिलन का समुच्चय बन,
अथाह आनन्द में हो जाती है विभोर,
और प्रफुल्लित।

प्रियतमा,
दुःख, विषाद, वेदना के समय तब
हाय रूपी विस्मयबोधक हो जाती है,
जब उसे कोई प्रिय,
सर्वनाम बना देता है।

प्रियतमा
को संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होना
आहत भी करता है, व्यथित भी।
सर्वनाम हो जाना,
नहीं होता स्वीकार इसे,
किसी भी स्थिति में।
अपनी इस उपेक्षा से
हो जाती है क्रुद्ध,
भर जाती है अनल भाव से,
और बन जाती है विद्रोही भी,
कि यह बनी रहना चाहती है
संज्ञा मात्र, अनन्त काल के लिए।

26.12.25

समय की समाधि

किसी ने पूछा—
"आप कब तक रुकेंगे यहाँ?"

​मैंने कहा—
"एक वर्ष से अधिक
तो 'वर्ष' भी नहीं ठहर पाता कभी;
न ही रुक पाता है 'माह',
अपनी निश्चित अवधि के पार।
​'दिन' तो चौबीस घण्टों में ही
बदल जाता है;
और 'घण्टा'—
एक घण्टा से अधिक भी
पार नहीं कर पाता,
स्थिर रहने के लिए।

​'कला' (मिनट) का जीवन भी
साठ क्षणों से ऊपर नहीं हो पाता;
और 'क्षण'—
क्षण तो क्षण में ही नष्ट हो जाता है।

बचा बेचारा 'निमेष',
तो वह पलक झपकते ही,
विलीन हो जाता है—
अपनी 'समय-समाधि' में।

​तो, मुझसे यह प्रश्न ही अनुचित है,
कि मैं किसी ठौर पर,
कब तक ठहर पाऊँगा!"

15.12.25

भीतरघाती

व्यक्ति को
नहीं मारती जितनी ऊपरी मार;
उससे कहीं अधिक मार डालते हैं
भीतर लगे भीतरघात के कीड़े,
जो खोद-खोद कर
कर डालते हैं खोखला
उसके अन्तर्मन को,
और ध्वस्त कर देते हैं
उसके विश्वास एवं आत्मविश्वास की
सशक्त परतों को भी।

भीतरघाती व्यक्ति
नहीं करता प्रहार सामने से;
बल्कि
स्वार्थसिद्धि की कामना लिए
वह चुपचाप रचता है घात,
और करता है प्रतीक्षा—
अपने लिए उपयुक्त समय की।
बनता है मीत,
करते हुए मनुहार,
जीतता है हृदय—
आहति का।

अन्तर्द्रोही नहीं मारता
एक ही वार में;
चोटिल को,
अपितु
अन्तःघाती बन
मौन भाव से
रचता है षड्यंत्र,
करता है प्रयोग—
साम, दाम, दण्ड, भेद जैसी
दुष्चक्रवर्ती नीतियों का;
और अजगर की भाँति
लपेट कर, मरोड़ कर,
तोड़ डालता है
अरिदण्ड को।

ऊपरी मार से
मर जाता है व्यक्ति
एक ही बार में;
त्याग देता है
भौतिक देह भी।
परन्तु भीतरघात से
जलता है वह तिल-तिल,
घुटता है भीतर-ही-भीतर;
और मरने से पूर्व
बार-बार मरता है—
यह सोचकर
कि जिससे मैंने प्यार किया,
उसने ही मुझ पर
वार किया।

भीतरघात से
व्यक्ति मरता तो नहीं,
किन्तु मर जाता है—
मन-ही-मन।

कमाल करते हो

ख़ून से सने अख़बार से हाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

घुँघरू हो चुके टीवी से ख़याल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

बिक चुकी कलम का मलाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

लुटी हुई इज़्ज़त का जमाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

ख़बरची का दर्द-ए-हवाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

चाल से हुए बेचाल की चाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

मीडिया कितना हुआ ज़वाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो। 

ताल पर नाचा कितने ताल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

क्या सबका लहू होता है लाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

आबरू का कौन है दलाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

अच्छे दिनों का मेरे जलाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

किस हक़ से तुम मेरा अहवाल पूछते हो—
कमाल करते हो, तुम सवाल पूछते हो।

शब्दार्थ-
मलाल — पछतावा
जमाल — खूबसूरती
हवाल — दुर्दशा
जवाल — गिरा हुआ
खबरची 
 पत्रकार
जलाल — महिमा
अहवाल — समाचार

3.12.25

इंसान का गिरगिटापन

वो कहते हैं
"तुम रंग बदलो। 
तुम लाल हो तो लाल को बदलो
तुम हरे हो तो हरे को बदलो
तुम नीले हो तो नीले को बदलो
तुम काले हो तो काले को बदलो।" 

यह बात सुन रहा था गिरगिट कहीं। 
उसे लगा यह बड़ा अजीब। 
बोला बड़ी ज़ोर से — 
"ओ रंग से जाति पहचानने वालों
जब सारा रंग मनुष्य ही बदल देगा
तो क्या मैं तुम इंसानों की तरह
इस दुनिया में 
तिलक-टोपी लगाकर
तीर-तलवार, बन्दूकें लेकर
नफ़रत और दंगे फैलाने आया हूँ

भाई
जो काम मेरा है
वो मुझे करने दो। 
तुम्हारा काम है  
दुनिया रूपी बग़ीचे में
दया-करुणा के पानी से सींचकर,
इंसान रूपी फूल खिलाना
कड़वाहट के काँटे निकालकर
प्यार-मोहब्बत की खुशबू बिखेरना। 

रंग तो कुदरत की देन है
और कुदरत 

हमेशा बहुत ही खूबसूरत होती है।
 

तुम उसमें भेद न डालो।"

24.11.25

गायें अब नहीं लौटतीं...

अब गायें साँझ को नहीं लौटतीं,
न ही उड़ाती हैं धूल
गोधूलि बेला में।

अब सड़कों पर
नहीं दिखते गिल्ली- डण्डे
या गड्ढा-गेंद,
खेलते बच्चे
गायों के वन-वापसी की प्रतीक्षा में।

बच्चे पूर्व दिशा में उग आई
स्वयं से भी बड़ी परछाईं
को दिखाने की अब नहीं लगाते होड़,
और सूरज उदास हो
छुप जाता है
क्षितिज की गोद में,
अपनी सिन्दूरी में
सफेदी का बिना मिश्रण लिए।

अब चरवाहे
नहीं माँगते परितोषिक
गाभिन गाय की सुरक्षा का,
न ही मनुहार करते हैं
वन में ब्यायी कबरी की
बछिया को,
सौंपते हुए गो-स्वामी के हाथ,
जिसे पाँच कोस से
अपनी गोद में लेकर आ रहा था वह।

अब चरवाहों के हाथ में भी
नहीं है छाता, कुल्हाड़ी और लाठी;
अब वे चाकरी की खोज में
भटक रहे हैं
नगर-नगर,
गाँव-गाँव,
मालिकों के द्वार।

वनों में घण्टियों के स्वर
अब विलुप्त हो चुके हैं,
जो होती थीं मार्गदर्शक
किसी भटके पथिक की।

वृक्ष,
जो देते थे
फूल-पत्ती और छाँव;
चट्टानें,
जिनमें मिलती थी
एक सूखी ठाँव;
नहरें,
जो बुझाती थीं प्यास,
देती थीं हरी-हरी घास—
और
मानव द्वारा
नृशंस हत्या किये जा रहे वनों की आँखें
तरस रही हैं
अन्तिम गो-दर्शन को।

घरों से
खोते जा रहे हैं नाद और चरी;
बाड़े तो जैसे अब लुप्त ही हो चुके हैं,
जहाँ रात भर
छाँव में गो-समाज करता था विश्राम
जुगाली के साथ।

खेतों में
ट्रैक्टरों का हो चुका है आधिपत्य,
और बैलों को कर दिया गया है मुक्त
उनके दायित्वों से।
कंक्रीट के घरों को
अब नहीं पड़ती आवश्यकता
गोबर से लीपने की;
और उपलों–कण्डों
का विकल्प बन चुकी है
मीथेन।
दूध मिल जाता है
दुग्धशाला में,
या थैलियों में बन्द
दुकानों में।

इसीलिए
देसी गायों की उपयोगिता

पर खड़े हो चुके हैं
प्रश्नचिह्न कई—
क्योंकि वे होती हैं
कम दुधारू,
और संकरित गायों में
दुधैलता अधिक।
और मनुष्य को
सबकुछ अधिक ही चाहिए;
वह घाटे का सौदा नहीं करता,
क्योंकि जाति–धर्म से
चाहे वह कुछ भी हो,
पर विचार से
व्यापारी ही होता है।

अब तो
लाचार हैं गायें
अपनी उघड़ी–कँपकँपाती देह पर ही
सहन करने को
भीषण मुसलाधार बारिश,
हाड़ सिकोड़ देने वाली ठण्ड,
और
अग्निशिखाओं-युक्त ताप-लहर भी।

असल में, गायें
कहीं जातीं ही नहीं।
लौटने के लिए जाना आवश्यक होता है,
और उससे भी अधिक आवश्यक होता है
एक ठौर का होना।

गाय कामधेनु है,
गाय माता है
,
परन्तु माता
अब निकेतन–हीन है।
मनुष्य की माँ के लिए हैं—
कम-से-कम वृद्धाश्रम बहुत;
परन्तु गो-माता
सड़कों पर
कुत्ते की मौत मर रही है।

गायें,
माता होकर भी
खोज रही हैं
अस्तित्व अपना
घर-घर, द्वार–द्वार;
परन्तु मिल रही है
पुचकार के स्थान पर,
मात्र दुत्कार।

और गो-भक्त
गाय के पूत
मात्र वाहनों में
ले जायी जाती गायों को ही मानते हैं माता,
और उसे छुड़ाने के लिए
रक्त–रंजित कर सकते हैं किसी को भी।
बाकी गायें
उनके लिए
पशु हैं, जानवर हैं—
जो कि ढोल, गँवार, शूद्र
और नारी की भाँति
ताड़ना की अधिकारी हैं।

ऊसर–बंजर खेतों ने
छोड़ दिया है घास उगाना भी;
किसानों की खेती में
लग गये हैं
विद्युत्-युक्त बाड़े।
तालाबों से
निचोड़ लिया जाता है
जल सारा;

अतः
माएँ हैं लाचार—
खाने को कूड़ा–करकट,
और पीने को
गड्ढे का दूषित जल।

एक दिन गायों को भी
घोषित कर दिया जाएगा
‘आवारा’;
भेज दिया जाएगा
आश्रय-केन्द्रों में।
बैलों की कर दी जाएगी
नसबन्दी,
और रोक दिया जाएगा
उत्पत्ति
इस अनोखे जीव की।

गायें,
जो कि माता हैं,
जो कि हो चुकी हैं
उपेक्षित और आवासहीन—
अब कहीं नहीं जाएँगी,
न तो कहीं से आएँगी;
वे बस अपना आहार
चरने के दण्ड–स्वरूप
मार खाएँगी।

सम्भवतः
यह युग माओं को
अपमानित, आश्रयहीन और निराश्रित, निर्वासित
करने वाला ही है।