शब्द समर

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14.9.26

हे स्त्री! कब तक?

 हे स्त्री!

तुम हो स्त्री—

अर्थात्, जन्मजात मूर्ख,
अपढ़, जड़,

चेतना और विचार से रहित;

पुरुष-वर्ग की तुलना में

तुम हो

निपट बुद्धिहीन!

 

हे स्त्री!

तुमसे डरता है

समस्त पुरुष-समाज;

घर में रहती हो तुम

बाघिन-सी—

और तुम्हारे पुरुष

तथा तुम्हारे बच्चे

मेमनों-से सहमे रहते हैं।

 

हे स्त्री!

तुम लाख कर लो

तीज, करवा-चौथ,

वट-सावित्री,

सोमवती अमावस्या के व्रत;

या पिला दो चाहे

अमृत से भरा

समस्त कलश

अपने पति को;

या त्याग दो

अपने प्राण ही

उसके हित में—

 

फिर भी,

हे स्त्री!

वह कभी नहीं होगा

कृतज्ञ तुम्हारा।

 

क्योंकि पुरुषवादी-प्राणी

होता ही है

कृतघ्न अतीव;

जो आभारी होने के स्थान पर

करता रहता है

उपहास तुम्हारा—

हर मंच पर,

हर समाज में,

हर व्यक्ति के सम्मुख।

 

हे स्त्री!

तुम व्रत करो

या न करो—

यह निर्णय तुम्हारा

और तुम्हारी निजी आस्था

और विश्वास का है।

 

तुम चलती हो,

सहती हो,

सृजती हो;

और जीवन के प्रत्येक अंधकार में

स्वयं दीप बनकर

दूसरों का पथ

आलोकित करती हो।

 

पश्चात् इसके भी—

होती हो

अपमानित ही!

 

तुम्हारा त्याग

उसके लिए कर्तव्य है;

तुम्हारा समर्पण

उसके लिए अधिकार;

तुम्हारा मौन

उसकी विजय,

और तुम्हारी वेदना—

उसके उपहास का विषय।

 

तुम्हारे लिए

प्रत्येक सभा

कुरु-राजसभा ही होती है,

जहाँ दूसरों सहित

तुम्हारे अपने ही पुरुष के भीतर

ही वास करते हैं

दुर्योधन और दुःशासन—

जैसे कलुषित विचार,

जो तुम्हारा अपमान करना

समझते हैं

निजी अधिकार अपना।

 

परन्तु सोचो—

कब तक कराओगी चीरहरण तुम

अपने ही सम्मान का?

कब तक मौन रहेगा

स्वर तुम्हारा

अनुचित उपहास के विरुद्ध भी?

 

उठो!

तनकर खड़ी हो जाओ;

स्वर दो

अपने मौन को,

अपने अपमान को

प्रतिरोध दो—

 

और जो तुम्हें

दुर्बल समझकर

तुम पर हँसते हैं,

बता दो उन्हें—

 

कि

स्त्री सहनशील हो सकती है,

पर असहाय नहीं;

स्त्री करुण हो सकती है,

पर कायर नहीं;

स्त्री त्याग कर सकती है,

पर अपना सम्मान

कभी त्याग नहीं सकती!