शब्द समर

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8.7.26

प्रेम-सीकर

याद है तुम्हें, प्रिय?
तुमसे विदा लेते समय,
तुम्हारे प्रेम की कुछ बूँदें
अनायास ही टपक पड़ी थीं
मेरी हथेलियों पर।

मेरी गदेलियों के मध्य
वे ऐसी झिलमिला उठी थीं,
मानो शरद-प्रभात ने
अपने निर्मल ओस-कण
चुपके से धर दिए हों वहाँ।

मेरे करतलों में सुशोभित
वे प्रेम-सीकर
ऐसे आलोकित कर गए थे
मेरे अन्तःआलिन्द को,
जैसे घोर तमिस्रा के हृदय में
अकस्मात् कोई माणिक्य
अपनी ज्योति बिखेर दे।

उन्हीं अमूल्य बूँदों को
तब से मेरा हृदय
अक्षय निधि-सा सहेजे हुए है—
इस अटल विश्वास के साथ
कि एक दिन
पुनः पर्जन्य-ऋतु आएगी;
और तुम भी लौटोगे
उसी सहज आत्मीयता से,
जैसे मेघ
अपनी चिर-प्रतीक्षारत वसुधा का
आलिंगन करते हैं।

बस,
इसी एक आशा के दीप को
प्राणों में जलाए हुए,
तुम्हारे प्रेम-पथ की बाट जोहती,
समय की निस्पन्द घड़ियों को निहारती,
मैं आज भी
वहीं बैठी हूँ—
जहाँ तुम्हारी वे कुछ बूँदें
अब भी
मेरे सम्पूर्ण जीवन का
एकमात्र सावन बनी हुई हैं।

 

शब्दार्थ-

सीकर- बूँदें, गदेलियों-हथेलियों, करतल-हथेली, अन्तः-आलिन्द-हृदय, तमिस्रा-घोर अन्धकार, माणिक्य-हीरा

पर्जन्य-ऋतु-वर्षाकाल, आलिंगन-गले लगाना, बाट-राह, निस्पन्द-स्थिर