शब्द समर

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14.1.19

एक नया गीत

एक नया गीत गाएँगे हम आज मिलकर
क़दम अब मिलाएँगे हम आज मिलकर
नया गीत गाएँगे हम आज मिलकर

न छल न कपट न मुसीबत की चालें
न तलवार तमंचे न लाठी न भाले
मोहब्बत बहाएँगे हम आज मिलकर

जो छूटे हुए हैं उन्हें हम पुकारें
जो रूठे हुए हैं उन्हें हम दुलारें
कि बाहें फैलाएँगे हम आज मिलकर

नहीं भीख माँगें अब हम किसी से
नहीं रोते भागें अब हम किसी से
हकें छीन लाएँगे हम आज मिलकर

नहीं अब गुलामी करेंगे किसी की
नहीं रोटियों में पलेंगे किसी की
कि पंख सँवारेंगे हम आज मिलकर

न पीड़ा न आँसू नहीं दुश्मनी हो
न बाहें किसी की लहू से सनी हों
ख़ुशी में नहाएँगे हम आज मिलकर।

29.9.14

लोकगीत-रसीले नैना

चित्र साभार-गूगल 
इस गीत की प्रथम पंक्ति मैंने अपने बाल्यकाल में अपनी दीदी से सुना था| आज अचानक याद आ गया तो बाकी की पंक्तियाँ स्वतः ही लिख डाली| हो सकता है प्रमुख गीत के शब्दों से थोड़ा-बहुत इसका संबंध हो रहा हो तो इसके प्रमुख रचनाकार से क्षमाप्रार्थी हूँ|

सखी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना
गुइयाँ पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना
रसीले दोऊ नैना, नशीले दोऊ नैना
रानियाँ पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना

मोरे नैनों का रस छलके, जब चालूँ मैं हलके-हलके
मैं कमरिया से बलखाऊँ, सम्हाले भी सम्हले ना
प्यारी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना


पनघट पर बइठे छैला, हाथों लेके ढेला
मोरि गगरी कैसे बचाऊँ, उका काम है फोरते रहना 
बीबी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना

कहने को मोरे जेठा, दुअरा में आके बैइठा
ओके लालच से डर जाऊँ, छुपा के मोहे रखना
बिट्टी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना

मोर बालम बड़े छबीले, मोर बाँह कभी न ढीले
उनके बोसे में घुल जाऊँ, पनिया की सुद्ध रहे ना
लाला पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना


दिन चार बची जिंदगानी, मैं रोकूँ कइसे पानी
किस-किस से नजर बचाऊँ, बैरी ही मोरे नैना
रजनी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना

15.4.14

कोपल देखा

खुलि गइ स्कुलिया देखा हो झमाझम भैया कोपल देखा
आई बंदरिया नाचे है छमाछम भैया कोपल देखा

कद्दू भैया चले बराती, लिए नचनिया संग
धनिया की हाल न पूछो महके गमागम भैया कोपल देखा

आलू-टमाटर छोटे भैया, पियाज को बहलावे 
गोभी की आँखें चमके हैं चमाचम भैया  कोपल देखा

भिन्डी चाची, परवर चाचा, बिना बात मुस्कुराए
लहसुन के तेवर लागे हैं तनातन भैया कोपल देखा

खीरा-ककड़ी लिए मंजीरा, छत पे आके गाएं
कटहल की ढोलक बाजे है ढमाढम भैया कोपल देखा

अदरक-हल्दी लिए किताबें घर से स्कूल को जाएँ
मिर्चा की पेन्सिल लिखती है दनादन भैया कोपल देखा

जीवन में कुछ करना है तो पहले स्कूल में आयें
सुन लो 'विद्यार्थी' की बात में है दम भैया कोपल देखा

24.2.14

मंज़िल के पुजारी

जितना गहरा हो सागर को झेलेंगे हम
जितनी ऊँची हो चोटी को पा लेंगे हम
हम जवाँ हैं जवानी की ये उम्र है
ज़िंदगानी को मस्ती से खेलेंगे हम

कौन कहता है कोई बड़ा काम है
अपनी मुट्ठी से किसका बड़ा दाम
एक क़ीमत जो हमने लगा दी कहीं
सारी दुनिया को उतने में ले लेंगे हम

एक वादा जो हमने किया जब कभी
वो इरादा न मुड़ता है पीछे कभी
लाख आएँ  त्रिलोकी के योद्धा मगर
पाँव अंगद का ज़मीं पर टिका देंगे हम

हम थिरकते है घुँघरू की झंकारों पर
होते मदहोश होठों के इशारों पर
पर अगर राह में कोई अंगार हो
पाने मंज़िल उसको भी बुझा देंगे हम|

26.1.14

ये हवा जो चली है, महक लेने दो



ये हवा जो चली है महक लेने दो,
इसकी ख़ुशबू में धीमा ज़हर ना भरो.
लाखों जीते इसकी छुअन से यहाँ,
इसमें बिजली के कंपन का डर ना भरो.

कोई महलों में है, कोई फुटपाथ में,
जी रहें हैं सभी अपनी औक़ात में.
मत बनाओ झोपड़ियों पे ताजमहल,
अपने घर से किसी को बेघर ना करो.
ये हवा..................................

सबका दीन भी है, सबका ईमान है,
सबका अपना भी कोई एक भगवान् है.
इन कटारों में ज़ंग अब लग जाने दो,
अपने जंग में किसी की कबर ना भरो.
ये हवा...........................................

एक भटके हुए की, नज़र तुम बनो,
एक अँधेरे शहर की सहर तुम बनो.
ज़िंदगी है मिली सबको जी लेने दो,
किसी की जाँ को तुम उम्र-ए-बदर ना करो.
ये हवा................................................
 

28.9.13

रोटी की क़ीमत


चलो दुनिया में हम अब रोटी की क़ीमत ढूंढ लें।
आओ भूलाने ग़म को हम अपनी नसीहत ढूंढ लें।

वो जहां गोदमों में वर्षों से राषन सड़ रहा,
उसको पाने की चलों हम सबकी नीयत ढूंढ लें। 
चलो दुनिया में हम अब रोटी की क़ीमत ढूंढ लें।

चंद टुकड़ों के लिए अब तक ग़ुलामी कर रहे,
उनकी मुक्ति की चलो अपनी तबीयत ढूंढ लें।
चलो दुनिया में हम अब रोटी की क़ीमत ढूंढ लें।

ऊंचे महलों में जहां एक काली दुनिया मस्त है,
पर्दे के पीछे की आओ सब हक़ीक़त ढूंढ लें।
चलो दुनिया में हम अब रोटी की क़ीमत ढूंढ लें।

बन के हम सैलाब निकलें इस जहां की भीड़ में,
तांडव के भूचाल सी हम अपनी हिम्मत ढूंढ लें।
चलो दुनिया में हम अब रोटी की क़ीमत ढूंढ लें।

26.6.13

चलो चलो रे चलो रे



आएं उत्तर की हवाएं, दक्षिण को ले जाएं
छाएँ पूरब में घटाएं, जाके पश्चिम में बरसाएं
सभी दिशाओं से आकर, बस एक ही गीत हम गाएं
चलो चलो रे चलो रे, चलो चलो रे चलो रे

सूरज आया निकल क्षितिज से, फिर तुम क्यों हो सोए
महाबली हो तुम बलशाली, किस्मत पर क्यों रोए
देखो अपनी भुजाएं, चाहो जैसा कर जाएं
फ़ौलादों की शाखाएं, ये चाहें सागर लंघ जाएं.
सभी दिशाओं से मिलकर, बस एक ही गीत हम गाएं
चलो चलो रे चलो रे, चलो चलो रे चलो रे

एक धरा है, एक गगन है, एक हमारी मंज़िल
एक आदम की औलादें, हौव्वा के हैं हम दिल
छोडो जाति की प्रथाएं, ये तो हैं विपदाएं
दूरी अपनी सब मिटाएं मानवता को धर्म बनाएं
सभी दिशाओं से मिलकर, बस एक ही गीत हम गाएं
चलो चलो रे चलो रे, चलो चलो रे चलो रे

तुम चाहो तो खलिहानों में भागीरथी आ जाए
तुम चाहो तो बंजर धरती सोने से लद जाए
छोडो आलस की अदाएं, समझो अपनी तुम क्षमताएं
तुमसे देश को आशाएं, चलो सागर को मथ आएं
सभी दिशाओं से मिलकर, बस एक ही गीत हम गाएं
चलो चलो रे चलो रे, चलो चलो रे चलो रे

9.7.12

मैं ढूंढ रहा वो अपना प्यार


मैं ढूंढ रहा वो अपना प्यार -२
जिसमें छाई बहार, जिसमें ख़ुशी का खुमार, जिसमें सारा संसारऽऽऽऽऽऽऽ
मैं ढूंढ रहा वो अपना प्यार.....

स्नेहमयी माता स्तन और पिता का चुम्बन
शयनगीत अमृतमय सुनकर पुलकित होता तन-मन
वो पालना हिंडोला, वो बांहों का झूला, वो ख़ुशी की पुकारऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ
मैं ढूंढ रहा वो अपना प्यार.....

ममतामय कर तेल लगाते और काजल का टीका
मन में माँ के हुई वेदना जब भी लाला छींका
वो पेट का बिछौना, माँ का गीले में सोना, वो प्यारी पुचकारऽऽऽऽऽऽऽऽऽ
मैं ढूंढ रहा वो अपना प्यार......

दिन के खटपट से फुर्सत हो जब भी घर में आते
शिशु की छोटी सी किलकारी पर कुर्बान हो जाते
भूल जाते थकान, उठाते कंदुक सामान, पिता देते दुलारऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ
मैं ढूंढ रहा वो अपना प्यार.........


4.2.11

माँ सुनो तुम्हारे आंसू नहीं ललकार चाहिए


माँ सुनो तुम्हारे आँसू नहीं ललकार चाहिए,
देश को बचाने की पुकार चाहिए,
मुझे तुम्हारे हाथों से तलवार चाहिए|

अक्षय-निर्भय पूतों की
मत भूलो तुम माता हो,
जिनके सीने से अक्सरतूफ़ान ही टकराता हो|
इन वीरों को माँ तेरी यलगार चाहिए|

कर तिलक हमारे माथे पर
,
हाथों में तुम शस्त्र दो,
कर दूँ शत्रु धराशायी एक क्षण में,
मुझको वह ब्रह्मास्त्र दो,
माँ तेरी एक बार मुझे फुफकार चाहिए|

शूरवीरों का मस्तक
,
झुका कोई क्या पता है,
तेरे चरणों के सिवा माँ,
अपना कौन विधाता है,
इन चरणों की माँ हमे रफ़्तार चाहिए|

तुम हो माता शूरवीर की
,
भावुकता का त्याग करो,
रग-रग में तुम मातु हमारे,
तेज़ लपट की आग भरो,
तुम्हारी आँखों से ज्वाला-अंगार चाहिए|

नहीं लजाऊँ दूध तुम्हारा
,
रिपु की छाँव जो पड़ जाये,
कर दूँ छिन्न-भिन्न मै उसको,
अगर पाँव भी दिख जाये,
मुझे तुम्हारी इच्छा का गुबार चाहिए|

एक हाथ तोड़ मैं उसके
,
दूजे में रख जाऊँगा,
मस्तक होगी पड़ी धरा पर,
धड़ स्वान तक पहुँचाऊँगा,
एक बार तुम्हारे हुक्म का उद्गार चाहिए|

ममता के आँचल से माता
,
अब हमको तुम मुक्त करो,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी,
शास्त्रों से संयुक्त करो,
पन्ना जैसे मोह का तिरस्कार चाहिए|

तुम शक्ति दुर्गा की
,
चामुण्डा भी तुम्हीं हो माँ,
राजपूताने की पद्मिनी हो,
लक्ष्मीबाई तुम्ही हो माँ,
तुम्हारे भीतर सुनामी-सा अब ज्वार चाहिए|

3.2.11

अबके बरस हम जइबे गवनवा

अबके बरस हम जइबै गवनवा रे
सुन ले रे सजनी
घोड़ी में चढ़ी के आइहैं सजनवा रे
सुन ले रे सजनी

१) करु मोर सबरे सजू सिंगार
हम चउके मा जइबै,
पियउ के संग परदेस निकरि फेर
कबहूँ न अइबै
भरि दे हाथ मोरी चूड़ी-कंगनवा रे
२) छूटी पिरितिया मायरि से अब
सासुर से लागी
अपने पराये लागें घर-परिवार मन
विरति सी जागी
पियउ के सुधि करि सिहरे रे मनवा रे
सुन ले रे सजनी
३)लाल-लाल चुनरी औ लाल सेनुरवा
लाल मोर अंगवा
लाल रंग डोली औ लाल फूल-माला संग
लाल बजनहवा
लाल रंग पिया संग निकारे परनवा रे
सुन ले रे सजनी
४) चारी जना के कन्धा की गाड़ी पे
सवारी हम करबै
छोड़ी पुरान हम नये घर जात मन
तनिकौ न डरबै
पाइ मोहे संग मुसुकाये सजनवा रे
सुन ले रे सजनी
५) राम-नाम के विदाई गीत होई जब
घर हम छोड़बै
परछन करिहैं गोती-परिवार जब
घर से निकरबै
केहू आँखी आँसू केहू गाई मंगल गनवा रे
सुन ले रे सजनी
६) माया त रोवें खिरकी में जाइ
बाबा रोवें दुअरवा
बहिनी त रोवे कोठरी लुकाइ
भैया रोवें ओसरवा
प्यारी-सुकुमारी किहिस सून अगनवा रे
सुन ले रे सजनी
७) दक्खिन दिसि एक नदी के किनार
जहाँ मोर ससुररिया
उजरि-उजरि लगे उहाँ के जहान
नहीं मानुस के डेरिया
रहबे अकेले लेई आपन परनवा रे
सुन ले रे सजनी
८) चौखुट घर में निमुठ ओसारी जहाँ
हम सोई जइबै
रीती-रिवाज जब से पियउ निभैहें
तब तक हम सुसतैबै
लाल लपट बनी अइहें सजनवा रे
सुन ले रे सजनी