शब्द समर

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17.6.26

आँगन में उगा अरण्य

समाज का विराट स्वरूप
परिवारों के सूत्रों से गुँथा हुआ होता है,
और परिवार का आधार
कुछ व्यक्तियों के जीवन-सम्बन्धों पर टिका रहता है।

व्यक्तियों से बनते हैं लोग,
लोगों से बनते हैं परिवार,
और परिवारों से निर्मित होता है समाज का विस्तृत संसार।

किन्तु व्यक्ति केवल शरीर नहीं होता;
वह अपने भावों, विचारों, संस्कारों, स्वप्नों,
आकांक्षाओं और व्यक्तित्व की समग्र अभिव्यक्ति होता है।
जैसा उसका अन्तर्मन होता है,
वैसा ही उसका बाह्य जीवन आकार ग्रहण करता है।

जहाँ अनेक व्यक्ति
एक छत के नीचे साथ रहने लगते हैं,
वहाँ एक परिवार जन्म लेता है।
परिवार किसी मकान में निवास करता है,
और मकान ईंट, पत्थर, दीवारों तथा छत की सीमाओं से निर्मित होता है।

परन्तु केवल दीवारें और छत
किसी भवन को घर नहीं बनातीं।
व्यक्तियों के मध्य प्रवाहित प्रेम,
स्नेह की सरिता,
सौहार्द्र की शीतल छाया,
देखभाल की कोमल अनुभूति,
त्याग, विश्वास और आत्मीयता की ऊष्मा—
इन्हीं से निर्जीव मकान में प्राणों का संचार होता है,
और तभी वह भवन
एक घर कहलाने योग्य बनता है।

कहा जाता है कि
मनुष्य और अन्य प्राणियों में यही विशेष भेद है कि
मनुष्य प्रेम, मर्यादा और सह-अस्तित्व के आधार पर
स्वेच्छा से एक घर में रह सकता है;
जबकि पशु यदि केवल अपनी प्रवृत्तियों के अधीन हों,
तो संघर्ष और स्पर्धा में उलझ जाते हैं।

किन्तु दूसरी ओर एक कठोर दृष्टि भी है।
प्राचीन दार्शनिक अरस्तू का कथन स्मरण आता है कि
मनुष्य भी मूलतः एक पशु ही है;
अन्तर केवल इतना है कि
उसकी बुद्धि अधिक विकसित है।

वही बुद्धि जब विवेक का दीपक बनती है,
तो मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर होता है;
परन्तु जब वही बुद्धि छल, कपट और स्वार्थ की दासी बन जाती है,
तो वह अपने ही अहंकार का बंदी बन जाता है।

तब वह स्वयं को श्रेष्ठ समझता है,
किन्तु भीतर कहीं
अपनी ही दुर्बलताओं से पराजित होता रहता है।

एक ही घर में रहने वाले लोग भी
अन्ततः मनुष्य ही होते हैं—
गुणों और अवगुणों का मिश्रण।

यद्यपि वे एक ही माता-पिता की सन्तान होते हैं,
एक ही आँगन की धूल में खेलकर बड़े होते हैं,
एक ही छाया में जीवन का प्रथम पाठ पढ़ते हैं,
फिर भी लोभ, मोह, स्वार्थ और अहंकार की बेल
धीरे-धीरे उनके हृदयों को जकड़ लेती है।

वे बाँस के पोरों की भाँति
ऊपर से दृढ़, चिकने और आकर्षक दिखाई देते हैं,
किन्तु भीतर का रिक्तपन
उनकी वास्तविकता प्रकट कर देता है।

चेहरे पर मुस्कान होती है,
पर मन में दूरी का मरुस्थल;
वाणी में मधुरता होती है,
पर हृदय में स्वार्थ का विष घुला रहता है।

वास्तव में जब व्यक्ति के भीतर
स्वार्थपूर्ण विचारों का अंधकार बढ़ने लगता है,
तब वह घर में नहीं,
केवल एक मकान में रहने लगता है।

जिन दीवारों ने उसके शैशव की किलकारियाँ सुनी थीं,
जिन आँगनों ने उसके बाल्यकाल के स्वप्न सँजोए थे,
जिन कक्षों ने उसकी किशोरावस्था की स्मृतियों को सहेजा था,
वही उसे एक दिन बन्धन प्रतीत होने लगते हैं।

जिन सम्बन्धों पर वह कभी
अपने प्राण अर्पित करने को तत्पर रहता था,
वे ही सम्बन्ध उसे बोझ लगने लगते हैं।
जिन सहोदरों के साथ उसने
रोटी, हँसी और आँसू बाँटे थे,
उनके साथ भी प्रेम का निष्कलुष स्रोत सूखने लगता है।

निःस्वार्थ स्नेह का स्थान
लेन-देन की गणनाएँ ले लेती हैं;
ममता का स्थान अपेक्षाएँ,
और आत्मीयता का स्थान स्वार्थपूर्ण व्यवहार ग्रहण कर लेता है।

यहीं से घर का हृदय टूटता है।
दीवारें तो वैसी ही रहती हैं,
छत भी नहीं बदलती,
किन्तु घर धीरे-धीरे मकान में परिवर्तित हो जाता है।

परिवार निस्सन्देह एक महान संस्था है;
मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन और पवित्र व्यवस्था।
उसकी शक्ति प्रेम में है,
उसकी प्रतिष्ठा विश्वास में है,
और उसका सौन्दर्य परस्पर समर्पण में है।

किन्तु जब प्रेम का स्थान स्वार्थ ले लेता है,
जब अपनापन लाभ-हानि की तुला पर तौला जाने लगता है,
जब सम्बन्धों
की पवित्रता

अहंकार के धुएँ में धूमिल हो जाती है,
तब परिवार का शरीर जीवित रहते हुए भी
उसकी आत्मा क्षीण होने लगती है।

कितना ही अच्छा होता, 
हम केवल मकानों में न रहते,
घरों को जीवित रखते;
केवल रक्त-सम्बन्धों को न निभाते हुए
,
हृदय-सम्बन्धों को भी सींचते रहते।

क्योंकि जहाँ प्रेम है, वहीं परिवार है;
जहाँ विश्वास है, वहीं घर है;
और जहाँ निःस्वार्थ आत्मीयता जीवित है,
वहीं मानवता का वास्तविक निवास है।