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28.7.26

सास

सास अपनी बहू के लिए
कभी माँ नहीं बन पातीं;
वे सदैव माँ ही रह जाती हैं—
मात्र अपने बेटे की।

कई बार तो वे
नहीं बन पातीं दादी  
अपनी पोती की भी,
और रह जाती हैं
केवल अपने पोते की दादी।

सदियों की परम्पराओं
की रस्सियों से बँधी,
ससुराल-रूपी कारागार में बन्द,
समाज के आदेशों का
यन्त्रवत् पालन करती हुई,
वे अपनी स्वतन्त्रता को
भूल चुकी होती हैं।

अपने साथ हुए
व्यवहारों को ही
विधि का विधान मानकर,
घूँघट तले घुटती हुई,
वे घोंट डालती हैं
गला अपनी बहुओं की
स्वतन्त्रता का भी।

और फिर—
बहू एक दिन सास बन जाती है।

वह भी अपनी
नवीन बहू को
स्वतन्त्रता नहीं दे पाती;
क्योंकि वह त्याग नहीं पाती
सास होने का मोह
और ससुराल में
वर्षों संघर्षों के पश्चात् प्राप्त
अपनी सत्ता का आकर्षण।

यह क्रम
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
निरन्तर चलता ही आ रहा है। 

न जाने—
कोई बहू,
स्वयं सास बनने के उपरान्त,
रोकना भी चाहेगी क्या,
इस परम्परा को?

21.7.26

महानता से गुमनामी भली

एक सहेली ने दूसरी से पूछा—
"बहन! होने वाला है तेरा विवाह।
कैसे सम्भालेगी सब कुछ?"

वह मुस्कराकर बोली—
“मैं आदर्श बहू बनकर रहूँगी।
दुनिया को दिखाऊँगी
कि एक सभ्य, सुशील, संस्कारी और गुणी बहू
कितनी अच्छी होती है,
और कितनी महान।
मैं महानता के उस चरम को प्राप्त करूँगी,
जिसे आज तक
कोई बहू प्राप्त न कर सकी होगी।"

निःश्वास के साथ बोली पहली सहेली—
"गुइयाँ!
तुझे देती हूँ एक सलाह मैं।
अच्छी बहू बनना,
पर महान मत बनना।
क्योंकि इस समाज ने
'महान बहू' की जो परिभाषा गढ़ी है,
वह किसी योगी की तपस्या से भी
अत्यन्त दुष्कर है।

उसमें स्त्री
देह से तो जीती है,
पर आत्मा से
तिल-तिल,
जीते-जी
घुट-घुटकर मरती है।

महान बहू वही कहलाती है—
जो सुन्दर चेहरा होते हुए भी
घूँघट में बन्द रहे।
जिसके पास वाणी हो,
फिर भी गूँगी बनी रहे।
जो भूखी हो,
फिर भी सबसे अन्त में खाए।
जो थकी हुई हो,
फिर भी बर्तन माँजे,
झाड़ू लगाए,
घर के सभी काम-काज पूरे करे,
और सास-ससुर व पति की सेवा के बाद ही
शयन करे।

जिसे श्रृंगार का शौक हो,
फिर भी न सजे,
न धजे।
सुहागिन होते हुए भी
वैधव्य-सा जीवन जिए।
वह कलायामी हो,
फिर भी न नाचे,
न गाए।
यहाँ तक कि
बाजे-गाजे के स्वर सुनकर भी
घर के किसी कोने में
गुमसुम पड़ी रहे।
वह शक्तिशाली हो,
किन्तु ताने सुने,
मार सहे,
और हर अत्याचार को
अपना भाग्य मानकर
भुगतती रहे।

सम्पूर्ण भवन की मालकिन होते हुए भी
नौकरानी बनकर जिए।
सामर्थ्यवान होते हुए भी
अबला बनकर रहे।
यूँ तो गृहलक्ष्मी कहलाए,
किन्तु अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए भी
भिखारी बनी रहे।
ज्ञान होते हुए भी
चर्चा में सम्मिलित होने का साहस न दिखाए।
बल्कि मूर्खों की तरह
दूसरों की अनुचित बातों पर भी
हाँ में हाँ मिलाए।
समय बीत जाने पर भी
इन्तज़ार में
अपने दिन काटती रहे।
अपनी स्वतन्त्रता का त्याग कर,
आजीवन
एक कैदी की भाँति
घर की चहारदीवारी में बन्द रहे।
अपना सम्पूर्ण जीवन
पराश्रय में बिता दे,
चाहे आत्मनिर्भर बनने में
पूर्णतः सक्षम ही क्यों न हो।

याद रखना—
इस समाज की बनाई हुई
'महानता' की नींव में,
आदर्शों की पृष्ठभूमि में,
अक्सर केवल
खुशियों की कब्र,
सुखों की समाधि,
पीड़ा का पहाड़
और दुःखों का अम्बार
छिपा होता है।

सखी!
यहाँ ऐसे भी लोग हैं,
जो मात्र लाठी से मारकर 
जान से नहीं मारते;
बल्कि तुम्हारे अधिकार लूटकर,
तुम्हारा चरित्र छीनकर,
तुम्हें विवश बनाकर,
फिर ताने मार-मारकर,
बिना मारे ही
मार डालते हैं।
फिर तुम्हारी अकाल मृत्यु को
महानता का रूप देकर,
उसे महिमामण्डित कर,
स्वयं को मुक्त कर लेते हैं
तुम्हारे ऊपर किए गए
अपने जघन्य अपराधों
और कुकृत्यों से।

इसलिए
अपने काम करते जाना,
जो उचित हो, 
वह सत्कार करते जाना।

तुम
गुमनाम भले ही रह जाना
,
किन्तु महान मत बनना।
इसी में
तेरी भलाई है।"

8.7.26

प्रेम-सीकर

याद है तुम्हें, प्रिय?
तुमसे विदा लेते समय,
तुम्हारे प्रेम की कुछ बूँदें
अनायास ही टपक पड़ी थीं
मेरी हथेलियों पर।

मेरी गदेलियों के मध्य
वे ऐसी झिलमिला उठी थीं,
मानो शरद-प्रभात ने
अपने निर्मल ओस-कण
चुपके से धर दिए हों वहाँ।

मेरे करतलों में सुशोभित
वे प्रेम-सीकर
ऐसे आलोकित कर गए थे
मेरे अन्तःआलिन्द को,
जैसे घोर तमिस्रा के हृदय में
अकस्मात् कोई माणिक्य
अपनी ज्योति बिखेर दे।

उन्हीं अमूल्य बूँदों को
तब से मेरा हृदय
अक्षय निधि-सा सहेजे हुए है—
इस अटल विश्वास के साथ
कि एक दिन
पुनः पर्जन्य-ऋतु आएगी;
और तुम भी लौटोगे
उसी सहज आत्मीयता से,
जैसे मेघ
अपनी चिर-प्रतीक्षारत वसुधा का
आलिंगन करते हैं।

बस,
इसी एक आशा के दीप को
प्राणों में जलाए हुए,
तुम्हारे प्रेम-पथ की बाट जोहती,
समय की निस्पन्द घड़ियों को निहारती,
मैं आज भी
वहीं बैठी हूँ—
जहाँ तुम्हारी वे कुछ बूँदें
अब भी
मेरे सम्पूर्ण जीवन का
एकमात्र सावन बनी हुई हैं।

 

शब्दार्थ-

सीकर- बूँदें, गदेलियों-हथेलियों, करतल-हथेली, अन्तः-आलिन्द-हृदय, तमिस्रा-घोर अन्धकार, माणिक्य-हीरा

पर्जन्य-ऋतु-वर्षाकाल, आलिंगन-गले लगाना, बाट-राह, निस्पन्द-स्थिर

17.6.26

आँगन में उगा अरण्य

समाज का विराट स्वरूप
परिवारों के सूत्रों से गुँथा हुआ होता है,
और परिवार का आधार
कुछ व्यक्तियों के जीवन-सम्बन्धों पर टिका रहता है।

व्यक्तियों से बनते हैं लोग,
लोगों से बनते हैं परिवार,
और परिवारों से निर्मित होता है समाज का विस्तृत संसार।

किन्तु व्यक्ति केवल शरीर नहीं होता;
वह अपने भावों, विचारों, संस्कारों, स्वप्नों,
आकांक्षाओं और व्यक्तित्व की समग्र अभिव्यक्ति होता है।
जैसा उसका अन्तर्मन होता है,
वैसा ही उसका बाह्य जीवन आकार ग्रहण करता है।

जहाँ अनेक व्यक्ति
एक छत के नीचे साथ रहने लगते हैं,
वहाँ एक परिवार जन्म लेता है।
परिवार किसी मकान में निवास करता है,
और मकान ईंट, पत्थर, दीवारों तथा छत की सीमाओं से निर्मित होता है।

परन्तु केवल दीवारें और छत
किसी भवन को घर नहीं बनातीं।
व्यक्तियों के मध्य प्रवाहित प्रेम,
स्नेह की सरिता,
सौहार्द्र की शीतल छाया,
देखभाल की कोमल अनुभूति,
त्याग, विश्वास और आत्मीयता की ऊष्मा—
इन्हीं से निर्जीव मकान में प्राणों का संचार होता है,
और तभी वह भवन
एक घर कहलाने योग्य बनता है।

कहा जाता है कि
मनुष्य और अन्य प्राणियों में यही विशेष भेद है कि
मनुष्य प्रेम, मर्यादा और सह-अस्तित्व के आधार पर
स्वेच्छा से एक घर में रह सकता है;
जबकि पशु यदि केवल अपनी प्रवृत्तियों के अधीन हों,
तो संघर्ष और स्पर्धा में उलझ जाते हैं।

किन्तु दूसरी ओर एक कठोर दृष्टि भी है।
प्राचीन दार्शनिक अरस्तू का कथन स्मरण आता है कि
मनुष्य भी मूलतः एक पशु ही है;
अन्तर केवल इतना है कि
उसकी बुद्धि अधिक विकसित है।

वही बुद्धि जब विवेक का दीपक बनती है,
तो मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर होता है;
परन्तु जब वही बुद्धि छल, कपट और स्वार्थ की दासी बन जाती है,
तो वह अपने ही अहंकार का बंदी बन जाता है।

तब वह स्वयं को श्रेष्ठ समझता है,
किन्तु भीतर कहीं
अपनी ही दुर्बलताओं से पराजित होता रहता है।

एक ही घर में रहने वाले लोग भी
अन्ततः मनुष्य ही होते हैं—
गुणों और अवगुणों का मिश्रण।

यद्यपि वे एक ही माता-पिता की सन्तान होते हैं,
एक ही आँगन की धूल में खेलकर बड़े होते हैं,
एक ही छाया में जीवन का प्रथम पाठ पढ़ते हैं,
फिर भी लोभ, मोह, स्वार्थ और अहंकार की बेल
धीरे-धीरे उनके हृदयों को जकड़ लेती है।

वे बाँस के पोरों की भाँति
ऊपर से दृढ़, चिकने और आकर्षक दिखाई देते हैं,
किन्तु भीतर का रिक्तपन
उनकी वास्तविकता प्रकट कर देता है।

चेहरे पर मुस्कान होती है,
पर मन में दूरी का मरुस्थल;
वाणी में मधुरता होती है,
पर हृदय में स्वार्थ का विष घुला रहता है।

वास्तव में जब व्यक्ति के भीतर
स्वार्थपूर्ण विचारों का अंधकार बढ़ने लगता है,
तब वह घर में नहीं,
केवल एक मकान में रहने लगता है।

जिन दीवारों ने उसके शैशव की किलकारियाँ सुनी थीं,
जिन आँगनों ने उसके बाल्यकाल के स्वप्न सँजोए थे,
जिन कक्षों ने उसकी किशोरावस्था की स्मृतियों को सहेजा था,
वही उसे एक दिन बन्धन प्रतीत होने लगते हैं।

जिन सम्बन्धों पर वह कभी
अपने प्राण अर्पित करने को तत्पर रहता था,
वे ही सम्बन्ध उसे बोझ लगने लगते हैं।
जिन सहोदरों के साथ उसने
रोटी, हँसी और आँसू बाँटे थे,
उनके साथ भी प्रेम का निष्कलुष स्रोत सूखने लगता है।

निःस्वार्थ स्नेह का स्थान
लेन-देन की गणनाएँ ले लेती हैं;
ममता का स्थान अपेक्षाएँ,
और आत्मीयता का स्थान स्वार्थपूर्ण व्यवहार ग्रहण कर लेता है।

यहीं से घर का हृदय टूटता है।
दीवारें तो वैसी ही रहती हैं,
छत भी नहीं बदलती,
किन्तु घर धीरे-धीरे मकान में परिवर्तित हो जाता है।

परिवार निस्सन्देह एक महान संस्था है;
मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन और पवित्र व्यवस्था।
उसकी शक्ति प्रेम में है,
उसकी प्रतिष्ठा विश्वास में है,
और उसका सौन्दर्य परस्पर समर्पण में है।

किन्तु जब प्रेम का स्थान स्वार्थ ले लेता है,
जब अपनापन लाभ-हानि की तुला पर तौला जाने लगता है,
जब सम्बन्धों
की पवित्रता

अहंकार के धुएँ में धूमिल हो जाती है,
तब परिवार का शरीर जीवित रहते हुए भी
उसकी आत्मा क्षीण होने लगती है।

कितना ही अच्छा होता, 
हम केवल मकानों में न रहते,
घरों को जीवित रखते;
केवल रक्त-सम्बन्धों को न निभाते हुए
,
हृदय-सम्बन्धों को भी सींचते रहते।

क्योंकि जहाँ प्रेम है, वहीं परिवार है;
जहाँ विश्वास है, वहीं घर है;
और जहाँ निःस्वार्थ आत्मीयता जीवित है,
वहीं मानवता का वास्तविक निवास है।

10.5.26

अस्त में उदय

सूर्योदय 
क्षितिज का पुत्र,
जो प्रति-प्रभात
पूर्व दिशा में
उसके गर्भ से जन्म लेता है,
और साँझ होते ही
पश्चिम की गोद में समा जाता है।

सूर्य प्रति-साँझ डूबता है,
ताकि वह दे सके सुखद विश्राम—
थके हुए तन को,
उलझे हुए मन को,
दौड़ते-भागते जन को।

कभी-कभी
किसी का अस्त होना भी,
दूसरों के लिए सुख की अनुभूति दे जाता है।

कर्त्तव्य-परायणता की भाषा में,
इसे ही ‘बलिदान’ कहते हैं।

3.4.26

जब राष्ट्र भीतर से हारता है

जब कोई राष्ट्र,
किसी अन्य राष्ट्र से पराजित होता है,
तो वह पराजय नहीं होती;
केवल उसकी सीमाओं की
या उसके शासक की
वह होती है उससे भी व्यापक
और कहीं अधिक गहरी।

उस क्षण—
सबसे पहले आहत होता है
उस राष्ट्र का सम्विधान,
उसकी आत्मा में रची-बसी संस्कृतियाँ,
उसकी जीवित परम्पराएँ,
उसकी सम्वेदनशील रीतियाँ,
और उसकी मधुर भाषाएँ।

पराजित होता है—
वह प्रत्येक नागरिक,
जो अपने राष्ट्र से,
प्राणों से भी अधिक प्रेम करता है;
जिसकी धड़कनों में
अपने देश का स्पन्दन बसता है।

यह पराजय मात्र एक घटना नहीं,
बल्कि एक ऐसे युग का आरम्भ है,
जिसमें परिवर्तन हो जाते हैं अनिवार्य—
ऐसे परिवर्तन,
जिन्हें कोई भी अपनाना नहीं चाहता स्वेच्छा से।

विजेता राष्ट्र का शासन,
अपने नवीन सम्विधान
और कठोर प्रावधानों के बल पर,
थोप देता है
अपने नियमों और व्यवस्थाओं को। 

परिणामस्वरूप—
पराजित राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति
विवश हो जाता है,
उन परिवर्तनों को स्वीकारने के लिए;
भले ही उसके हृदय में
पीड़ा, अस्वीकार
और असहायता की
गहरी लहरें उठती रहें।

इस प्रकार—
एक राष्ट्र की हार
केवल युद्धभूमि पर नहीं होती;
वह उसकी आत्मा,
उसकी पहचान,
और उसके अस्तित्व की गहराइयों तक
उतरकर—

उसे भीतर तक झकझोर देती है।

20.3.26

वह एक स्त्री है

वह हो सकती है बीवी,
या बहू किसी के लिए।
लेकिन वह एक स्त्री है,
माँ है
उस नवजात की,
जिसने अभी तक नहीं खोली हैं आखें।

इसलिए हर वह उपाय सोचो, और करो,
जिससे बचायी जा सके हर वह स्त्री,
जिसका स्वयं का अस्तित्व है मूल्यवान,
और जो है—कोई बेटी, बहन, पत्नी, बहू,
और इस संसार की सबसे बड़ी शक्ति,
माँ किसी अबोध की।

"कोई स्त्री इसलिए नहीं मर रही कि वह बीमार है,
बल्कि वह इसलिए मर जाती है,
क्योंकि समाज ने यह निर्धारित नहीं किया है
कि उसकी जान बचानी है।"

10.3.26

तुम देवि नहीं, स्त्री हो

तुम देवि नहीं,
स्त्री हो।

‘स्त्री’ शब्द ही अपने-आप में पूर्ण विराम है;
किन्तु हर पूर्णता से पूर्व
तुम भी अर्ध-अल्प, प्रश्न, आश्चर्य-रूपी
विराम-चिह्नों से सजा हुआ
एक वाक्य हो।

वाक्य अपने-आप में पूर्ण विचार-स्थल होता है;
किन्तु हर विचार से पूर्व
तुम नव-स्थायी भावों, विधान-निषेध, आज्ञीच्छिक,
सन्देह और प्रश्न-रूपी वाक्य-वाक्यांशों से सुसज्जित
एक अनुच्छेद हो।

कहने के लिए तो अनुच्छेद स्वयं ही
एक पूर्ण कथा-स्थल है;
किन्तु तुम अपने भीतर
किंवदंतियों, कविताओं, गीतों, रहस्यों
और कथानकों में निहित चरित्रों की
छोटी-बड़ी भूमिकाओं को
जीवन-मृत्यु देने वाली
एक गूढ़ उपन्यास हो।

वास्तव में तुम गूढ़ हो उनके लिए
जो तुम्हारी भाषा से अनभिज्ञ हैं;
अन्यथा कहते हैं—
“एक पुस्तक सहस्र मित्र के समान होती है।”

तुम हर चरित्र को उजागर करती हुई
वही एक खुली किताब हो,
जो हर व्यक्ति के छाती से चिपक
उसके जीवन को
एक सुखद रूप प्रदान करती हो।

तुम असंख्य किताबों को जन्म देने की प्रेरणा हो;
तुम सर्वस्व हो उसके लिए
जो चाहता है
कुछ भी सृजित करना इस संसार में।

तुम हर सर्जक की जननी हो।
एकमात्र तुम्हीं हो कथाकार।
वास्तव में तुम्हीं हो
इस सृष्टि की रचनाकार;
क्योंकि तुम देवि नहीं, स्त्री हो।
और स्त्री अपने-आप में पूर्ण होती है,
अपने भीतर लघु-दीर्घ गुण-दोषों को
समेटे हुए।

तुम नहीं हो देवि
किसी भी अवस्था में—
यह बात उतार लो
अपने मन की भाषा में
पूरी स्पष्टता से।

और यदि कोई करता है चेष्टा
तुम्हें स्त्री से देवि घोषित करने की,
तो उसे अशुद्ध और अमान्य
प्रमाणित कर दो
अपने जीवन के व्याकरण से;
कि कोई तुम्हारी
सहजता, सरलता, कोमलता,
धैर्य, संवेदना और साहस
रूपी विशेषणों को
पौराणिक कथानक का रूप
न दे पाए।

तुम देवि नहीं—
जीवित चेतना हो,
स्वतन्त्र विचार हो,
और अपने सम्पूर्ण मानवीय स्वरूप में
एक पूर्ण स्त्री हो।

तुम स्त्री हो—
यही तुम्हारी विशेषता है,
यही तुम्हारी गूढ़ता है,
यही तुम्हारा रूप है,
यही तुम्हारा चरित्र है;

और यही तो तुम्हारी सुन्दरता है—
कि तुम स्त्री हो:
न किसी से अधिक,
न किसी से कम।

पिया नहीं आए

कवने सवतिया से नेहा लड़ाए?
मोरे पिया नहीं आए।
रात अँहरिया बीते ना बिताए,
मोरे पिया नहीं आए।

बाली रे उमर में तो आई ससुररिया,
सेजिया प एकले ना बीते रे उमरिया।
जोबन चिरइया मोर कुहू-कुहू गाए—
मोरे पिया नहीं आए।

घरवा के भार ढोवले गए रे बिदेसवा,
चिठिया न भेजे, नाहीं भेजले सनेसवा।
रोटिया ऊ जिमले कि सूतल बिना खाए—
मोरे पिया नहीं आए।

टक-टक ताकेउँ तोहर डहरिया,
छिन-छिन खोलेउँ दौड़ि किवरिया।
अँखियन काटि-काटि रतिया बिताए—
मोरे पिया नहीं आए।

बिन पिया जिनगी त लागे रे पहरिया,
सून-सून लागे मोरे दाहिने सेजरिया।
अँखिया के लोर मोर तकिया भिगाए—
मोरे पिया नहीं आए।

सूना-सूना लागे मोहे तीज-तिहरवा,
सासुर सुहाए न ही भाए पिहरवा।
फागुन के रंग हिय में बरछी गड़ाए—
मोरे पिया नहीं आए।

कइसे बिताऊँ इहाँ दिन अउ रतिया?
पियवा त रखले उहाँ मोर सवतिया।
मोर सैयाँ मोर सुरतिया भुलाए—
मोरे पिया नहीं आए।

सुनु रे सखी, मोर संघी पनिहरिया,
तोर पिया जइहैं जब उनके सहरिया।
मोर सनेस तू त दिहे रे भिजाए—
मोरे पिया नहीं आए।

कहिहे— “सुनहु मोर बलम पुरबिया,
भेजले सनेस तोहर बउरी गुलबिया।”
पति मोर पतिया के लेहू बँचाए—
मोरे पिया नहीं आए।

कइसे रे मैं अपना जोबन बचाऊँ?
निकरूँ जो घर से, तो मरि-मरि जाऊँ।
गउँआँ लोग मो पे नजर गड़ाए—
मोरे पिया नहीं आए।

पिया जो न अइहैं, हमका न पइहैं;
हमका जो पइहैं, बेसुध ही पइहैं।
बिरही बइठि के बिरह गीत गाए—
मोरे पिया नहीं आए।

15.2.26

साथ, जो शब्दों से परे है...

साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ में खो जाने को।

साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ में खड़े रह जाने को।

साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ में जी लेने को।

साथ होने को साथ नहीं कहते,
साथ कहते हैं—
साथ मिट जाने को।

साथ होना कोई सामान्य बात नहीं;
साथ होना नहीं है सह-अस्तित्व मात्र,
न ही केवल शब्दों का उच्चारण है,
और 
“मैं हूँ तुम्हारे साथ”— कह देना मात्र,
नहीं है साथ होने का प्रमाण कोई।

साथ होना माँगता है
न्यौछावर हो जाने का निष्कपट भाव;
साथ होना,
आत्म-समर्पण की निष्कलुष साधना है।

साथ होना,
मौन व्रत है अहं-त्याग का;
साथ होना,
परार्थ हेतु विलीन हो जाना है
सम्पूर्ण व्यक्तित्व का।

साथ होना आत्मीयता का अद्वैत-संयोग है—
जिसमें ‘मैं’ और ‘तुम’ का समस्त भेद
का रूपान्तरित हो जाना है
शाश्वत एकत्व में।

साथ होना तभी साथ होना है,
जब उसे ईश्वर समझ लिया जाए;
जो साथ होने को ईश्वर समझ लेता है,
वही सत्य में साथ होना जानता है।


13.2.26

अपरिचित मौन

चलो, उनसे हाथ मिलाओ,
जिन्हें तुम नहीं जानते
और न ही परिचित हैं तुमसे वे ही।

मिलो गले उनसे,
जो नहीं हैं तुम्हारे अपने
न ही तुम लगते हो कुछ भी उनके नाते में।

मिलाओ उनसे हाथ
और महसूस करो उनकी हथेलियों की खुरदुराहट को,
जिनकी भाग्य रेखाओं को घिस दिया है समय ने
फावड़े, कुल्हाड़ी की धार से,
बुहार दिया है झाड़ू की सींकों और तिनकों से।
मजनी ने पोत दिया है कालिमा
जिन गदोरियों पर।
देखो उन्हें
और करो अनुभूति उन सपनों को,
जिनमें सम्पीड़क (रोड रोलर) की भाँति चला है बेलन,
जिन्होंने माँज कर चमकाया बर्तनों को,
परन्तु रगड़कर धो डाला अपने भविष्य को
और परोस दिया दूसरों की थाली में।

मिलो गले उनसे,
सुनो उन धड़कनों के स्वरों को,
जो बोलना तो चाहते हैं
परन्तु शब्दहीनता की लाचारी से
दम तोड़ देते हैं
तुम्हारे कानों तक आने से पूर्व ही।
जो अशिक्षा की भेंट चढ़ गई
और मन से रह गई बौना,
आयु में बड़ी होकर भी,
जो झुक जाती हैं सामने तुम्हारे।
नापो उस गर्दन की ऊँचाई को।

अपने हाथ बढ़ाओ
और थामो उन्हें,
कि उन्हें नहीं आता हाथ पकड़ना।
अपना दिल दिखाओ
और सम्भालो उन्हें,
कि उन्हें तुम्हारी बराबरी का नहीं है कोई ज्ञान।

हाथ मिलाना,
गले मिलना—
केवल व्यवहार नहीं,
प्रेम की निशानी है;
वह प्रेम,
जो अमिट होता है,

अद्वितीय होता है।

9.2.26

प्रियतमा — एक अव्यय प्रेम

'प्रियतमा'
होता है कितना हृदप्रिय संज्ञा यह,
और उससे भी अधिक,
कर्णप्रिय सम्बोधन।

यह बन जाती है क्रिया,
जब होती है प्रेम में,
अपने प्रियतम के,
जिसमें हो जाती है विलीन यह,
यह सोचे बिना,
कि किस प्रकार होगा,
प्रयोग या उपयोग इसका।

प्रेम में सम्पूर्ण समर्पण का गुण ही
बना देता है विशेषण इसे।
विलेयक के रूप में,
विलेय संग घोलकर, अस्तित्व अपना,
बनाती है सन्तुलित विलयन
अभिसार का।
समर्पण की असीमित सम्पूर्णता ही,
इसके क्रिया विशेषण बन जाने की
पहचान है।

यह बन जाती है अव्यय,
जब हो जाती है अडिग और तटस्थ
प्रेम-मार्ग पर,
जहाँ
दो व्यक्तियों के मिलन का समुच्चय बन,
अथाह आनन्द में हो जाती है विभोर,
और प्रफुल्लित।

प्रियतमा,
दुःख, विषाद, वेदना के समय तब
हाय रूपी विस्मयबोधक हो जाती है,
जब उसे कोई प्रिय,
सर्वनाम बना देता है।

प्रियतमा
को संज्ञा के स्थान पर प्रयुक्त होना
आहत भी करता है, व्यथित भी।
सर्वनाम हो जाना,
नहीं होता स्वीकार इसे,
किसी भी स्थिति में।
अपनी इस उपेक्षा से
हो जाती है क्रुद्ध,
भर जाती है अनल भाव से,
और बन जाती है विद्रोही भी,
कि यह बनी रहना चाहती है
संज्ञा मात्र, अनन्त काल के लिए।