शब्द समर

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2.8.20

धँसोगे उस देह में

धँसोगे उस देह में,
तब जानोगे-
माह-प्रति-माह
कटते हुए पेट से,
थक्का बनकर
अनायास प्रवाहित रक्तिम-व्यथा को|
यूँ तो होते हैं मात्र दिन चार ही,
किन्तु
धँसोगे उस देह में
जब समझोगे चीर देने वाली
अनिच्छित मासिक-यन्त्रणा को।
 
धँसोगे उस देह में
तब समझोगे-
कितना कठिन होता है,
महीनों किसी शरीर को,
अपने शरीर में ढोना।
ढोते हुए-
क्षण-क्षण रहना प्रतीक्षित
सकुशल नवजातालिंगन के|
धँसोगे उस देह में,
तब जानोगे
कंटक-मार्ग एक गर्भिणी का|
 
धँसोगे उस देह में
तब जानोगे-
मिलती है कितनी घोर यातना,
जब देह में से,
देह होती है विलग।
जब धौंकनी हो जाती है छाती,
ज्वालामुखी फट पड़ता है ब्रह्माण्ड से,
पेट में आती है प्रलय की धार,  
और आपादमस्तक
थर्राता है भूकम्पमय व्यथा से,
तब छोटी-सी नलिका से
बहकर आता दूसरा शरीर।
धँसोगे उस देह में
जब समझोगे प्राणान्तक प्रसव-सन्ताप को|
 
स्त्री को देवि बनाने वालों,
स्वार्थहित फुसलाने वालों,
अभद्र हास्य बरसाने वालों,
नित्यादेश सुनाने वालों,
कमतर उसे बताने वालों,
भोग-वस्तु समझाने वालों,
गृह-दासी उसे बनाने वालों,
धँसोगे उस देह में
तब जानोगे
कितना कठिन होता है

इस संसार में स्त्री बनकर जीना।

4.5.20

दायित्व


माता-पिता जब पीटते हैं, तो दुलराते भी हैं। सिसकते-सुबकते हुए शिशु को, उसे स्थिर होने तक थपकाते हैं। जब शिशु को यह लग जाता है कि उसकी त्रुटि अब क्षमा की जा चुकी है, तब वह धीरे से माता-पिता के आलिंगन से निकल अपनी उन्हीं चर्याओं में लग जाता है। दोनों पीढ़ियों के मध्य का यही मूल स्वभाव है।

'वात्सल्य और श्रद्धा'-दोनों के मध्य के सम्बन्धों की यही डोर होती है। एक छोर में चञ्चलता, निश्चलता, पवित्रता, अज्ञानता, किलकारी, खिलखिलाहटें होती हैं, तो दूसरे छोर में प्रेम, वात्सल्य, मुस्कुराहट, मिठास, दपट होती है। परन्तु इस पूरे डोर में आदि से अन्त तक कहीं भी छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष की एक महीन-सी भी सुतली नहीं होती।

अब इसी सम्बन्ध के रूप को बढ़ती आयु के आधार पर देखें, जब माता-पिता वृद्ध, और वही शिशु युवा या प्रौढ़ हो चुका है। माता-पिता का स्वभाव शिशुवत होने लगा है, तब उपरोक्त समस्त मनोभावों में अधिकतर गहरा परिवर्तन दिखाई देता है।

माता-पिता रोते कराहते रहते हैं, सन्तान उनकी ओर ध्यान नहीं देते, बहुत पीड़ा में जब बिलखने लगते हैं, तो सन्तान उन्हें डाँट देती है, उनके उलाहने पर, झुँझलाहट या तमाचे होते हैं। इन सबके पश्चात भी सन्तान की ओर से दो मीठे बोल नहीं निकलते, जो माता-पिता को लगा आत्मिक पीड़ा को थोड़ा-सा भी कम कर सकें।

'भय और लालच'- इस सम्बन्ध की डोर का मूल स्वभाव बन चुका है। अब माता-पिता और बच्चे के मध्य जो डोर है, उसमें एक ओर निर्बलता, हताशा, निराशा, निस्सहायता, परतंत्रता, आँसू होते हैं, तो दूसरी ओर धन, विरासत, पूँजी, लालच, खसोट। इसका मध्य विलासता, षड्यंत्र, छल-छद्म, कड़वाहट, खटास के कारण घिस कर इतना कमज़ोर जाता है कि जब कभी माता-पिता को इस डोर से जल खींचने की आवश्यकता होती है, यह टूट जाती है, और माता-पिता वृद्धावस्था में प्यासे रह जाते हैं।

यही वह समय होता है,जब बच्चे को अपने माता-पिता का अभिभावक बनने की आवश्यकता होती है। उस डोर में माता-पिता की चिन्ता, देखभाल, औषधियों, सेवा, सत्कार, इच्छापालन की सुतलियों से डोरी को मोटा रस्सा बनाएँ, ताकि जब कभी माता-पिता को आवश्यकता हो, वे इस रस्सी से जितना चाहें, प्रसन्नता, आनन्द, सुख, निश्चिन्तता के जल का मधुर पान कर सकें, और वह रस्सा कभी भी न घिसे, न टूटे।

शिशु के शैशव में माता-पिता अपनी सन्तान के प्रति जितने उत्तरदायी होते हैं, उससे कहीं अधिक माता-पिता के वृद्धावस्था को प्राप्त होने के पश्चात सन्तानों का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है। बस इसे समझने की आवश्यकता होती है।

3.5.20

एक लड़की













एक लड़की,
एक लड़की होती है-
रसोईं का धुआँ,
चूल्हे की राख,
लकड़ियों के दुःख की भागीदार।

एक लड़की,
एक लड़की होती है-
बेलन-चकले की सहेली,
भगौने-परात-कढ़ाई की मुँह सखिया,
आटे-चावल-दाल की ताप।

एक लड़की,
एक लड़की होती है-
हल्दी का रंग,
नमक का स्वाद
धनिया की महक,
और होती है,
मसालों की भीनी सुगंध।

एक लड़की,
एक लड़की होती है-
ओखली-मूसल की ताल,
रस्सी-बाल्टी-घिरनी की लय
और चक्की के दोनों पाटों का सुर।

एक लड़की,
गोबर से सना हाथ होती है-
वन की लकड़ी
और होती है,
मटके-पर-मटका रखा सर।

एक लड़की,
एक लड़की-
माँ का ध्यान,
पिता की दवाई,
दादी-दादा के हाथ की लकड़ी
और होती है,
भाई-बहन-भौजाई की राज़दार।

एक लड़की,
एक लड़की होती है-
किताबों की दुनिया,
अपने सपने का संसार,
और सपने पर-
घर की ज़िम्मेदारी,
और
विवाह और अनचाहे गर्भ
की मार होती है।

एक लड़की,
एक लड़की-
भाई की चाहत
में उपजा अपमान होती है,
भाई की इच्छाओं का सन्तोष
अभावों के कोने की
घुटती हुई आवाज़
और आँसुओं का अम्बार होती है।

एक लड़की,
एक लड़की-
टूटा हुआ ख़्वाब होती है।

25.3.20

राष्ट्रबन्दी-2

देश आपात स्थिति में है
पूर्ण राष्ट्रबन्दी की,
की गई है घोषणा।
वैश्विक महामारी के काल में
कोई न निकले
अपने निवास से बाहर,
नहीं तो,
किए जाएँगे दण्डित,
बन्द कर दिए जाएँगे बन्दी गृह में।
करते यही घोषणा,
गली-गली घूम रहे हैं सैनिक जन।

तू क्यों घूम रहा है बाहर झुरुआ?
और तेरे बच्चे भी?
क्या तुझे नहीं पता
कि बाहर घूमना है अपराध?
अभी उठा लिया जाएगा,
और दे दिया जाएगा कारावास?

साहब!
यह कारावास,
हम सबको मिलेगा न?
तो ले चलो न मुझे
और मेरे बच्चों को वहीं।
हम दिहाड़ी लोग इक्कीस दिन
बिना खाए कैसे रहेंगे?
बाहर गए,
तो महामारी मारेगी,
घर में रहे तो भूख।
अच्छा होगा,
आप हम सबको अन्दर ही डाल दीजिए
कम-से-कम
दोनों समय का भोजन तो मिला करेगा
जेल में ही सही,
हम कुछ और दिन जी तो लेंगे।

राष्ट्रबन्दी-1

सुना तुमने?
क्या?
बन्द।
बन्द पूरा देश,
बन्द हर प्रदेश
चप्पा-चप्पा बन्द,
कोना-कोना बन्द।
बन्द विश्व, बन्द यह संसार।

जो नहीं डरा कभी गजराज से,
न भयाक्रान्त हुआ वनराज से
उस मानव को
एक सूक्ष्म, अदृश्य जीव ने
स्वेच्छिक काल-कोठरी में
जीने के लिए कर दिया है पूर्ण लाचार।

राजा ने कर दिया है आदेश,
पूर्ण राष्ट्रबन्दी की।
रहोगे एकान्त में
तो ही है जीवन का प्रत्याभूत।
ऐसा कहकर
राजा ने
पल्ला झाड़ लिया है।
अब अपने जीवन के उत्तरदायी
तुम्हीं होंगे।
चाहते हो यदि लम्बा जीवन,
तो चले जाओ एकविंश दिवसीय
पूर्ण गृहवास में।
जीते रहोगे
तो यह समाज पुनः मिल जाएगा।

31.1.20

हम उबले लोग

हम उबल चुके हैं,
हम पूरी तरह उबल चुके हैं।
हमारी साँसें उबल चुकी हैं,
हमारी ज़िन्दगी उबल चुकी है।
केवल उबले ही नहीं,
फूल भी गए हैं हम,
हमारी नसों के पोर-पोर में,
पानी भी भर चुका है।

अब बस छीलना बाकी है,
हम बिने नाख़ून के,
बिना कुरेदे ही,
उकेले जा सकते हैं,
परत-दर-परत।

वो देखो,
वो फ़क़ीर आ रहा है।
उसके झोले में कुछ है शायद?
शायद मसाला है।
हाँ वही मसाला,
जिसे लेने कभी,
पुर्तगाल, डच, अँग्रेज़ आये थे,
और उठा ले गए,
पूरा-का-पूरा,
हम सिंक चुके लोगों को पका कर|

इस दाढ़ी वाले फ़क़ीर के पास भी,
शायद वही मसाला है,
लेकिन यह हमसे मसाला लेने नहीं,
हममें मिलाने आया है।

इसके झोले में,
जाति का नमक,
कारोबार की धनिया
रोज़गार का ज़ीरा
और सबसे ख़ास
जो मसाला है,
वह है,
धर्म नाम की लाल मिर्च।

इसके तीखे स्वाद को
हममें डालकर,
अपना भोजन स्वादिष्ट बनाएगा।

भरपेट खाएगा,
डकार लगाएगा,
और जैसा कि कहता है,
फ़क़ीर आदमी है,
झोला उठाएगा,
चला जायेगा|

वह चला जाएगा.
किसी और को उबालने-तलने
और लाल मिर्च से
अपना भर्ता स्वादिष्ट बनाने।

हम उसिने जा चुके लोग,
उसके कुचलने पर,
सिर्फ चीत्कार मार सकते हैं।

1.12.19

निरर्थक


वह जो होना चाहता था,
उसे किसी ने होने नहीं दिया|

उसे जो होना चाहिए था,
उसे भी किसी ने होने नहीं दिया|

उसे जो नहीं होना था,
वह तो कभी वह हो ही नहीं सकता था|

वह जो हो चुका है,
उसे वह भी नहीं जानता 
कि वह क्या हुआ है|

फिर भी उस होने को,
वह जीता है 
अपने शरीर, 
और दूसरों के मन में
यही उसका आदि और यही अन्त है|

बीच में जो भी है,
वह तड़पने की कविता है,
जो न भी होता, 
तो भी वह होता..

24.9.19

अगर आप प्रेम में हैं


अगर आप प्रेम में हैं,
तो उसे खुलेआम ज़ाहिर करिए।
प्रेम को प्रकट करना, दिखावा नहीं होता
न ही होता है उसका प्रचारीकरण,
प्रेम प्राकट्य
प्रेम-प्रगाढ़ता के ताबूत की एक कील होता है।
अगर आप प्रेम में हैं
और आपका प्रेम नहीं है असहज,
तो अश्लीलता को छोड़कर,
सबकुछ दुनिया को दिखाइए।

हो सकता है,
दुनिया आपके प्रेम को न करे स्वीकार,
न करे तारीफ़,
तो क्या फ़र्क़ पड़ता है,
क्योंकि दुनिया अपने मतलब के अलावा
किसी की सगी नहीं होती।
इसलिए यदि आप प्रेम में हैं,
तो उग आइए हरी-हरी घास की तरह।

थकी और मरी हुई आवाजें

थकी और मरी हुई आवाज़ें
,
न जग सकती हैं,
न जगा सकती हैं।
न उठ सकती हैं,
न उठा सकती है।
न चल सकती हैं,
न चला सकती हैं।
न दौड़ सकती हैं,
न दौड़ा सकती हैं।

आवाज़ों में चाहिए ग़र इंक़लाब-
तो मुट्ठियों को भींच लो,
आँखों को खींच लो
उछाल दो जहान में
लहरा दो आसमान में,
कि एक साथ में बोल दो
हवा में स्वर को घोल दो।
कि घुलने दो स्वरों को तुम
उड़ने दो परों को तुम
अब ये पर रुके नहीं
अब ये सर झुके नहीं।

कि उड़ चलो वहाँ पे तुम
जहाँ हैं राजा-रानियाँ
बन रही हर रोज़ जहाँ
लूट की कहानियाँ।
लुट रहें हैं रोज़ जहाँ
सलमा और सुरेन्दर
लूटते ही जा रहे हैं
डेविड और विश्वम्भर।

इनकी ईंट पर तुम आज
पत्थरों को भौंक दो
इनकी भीत पर तुम आज
लाल रंग छौंक दो।
कि पोत दो कालिमा
इनके षड्यंत्र पर
और गोबरों का लेप दो
समस्त काले मन्त्र पर।

गला इनका रेत दो
बिना हथियार के
ज़ुबान इनकी चेप दो
बिना किसी वार के।
ख़त्म इनका खेल हो,
इनको सबको जेल हो
इनकी चाल चले नहीं
इनकी दाल गले नहीं

आदमी को आदमी का हक़ तुम्हें दिलाना है
इसीलिए ज़ुबां पे अपने इंक़लाब लाना है।
जाग आओ आज तुम
उठाओ आवाज़ भी
हो नहीं थके-मरे
कर दो आग़ाज़ भी।

क्योंकि
थकी और मरी हुई आवाज़ें,
न जग सकती हैं,
न जगा सकती हैं।
न उठ सकती हैं,
न उठा सकती है।
न चल सकती हैं,
न चला सकती हैं।
न दौड़ सकती हैं,
न दौड़ा सकती हैं।

23.9.19

दमदम ज़िन्दगी


दमदम भागती रहती है तू
ऐ ज़िन्दगी!

दम भर तो ठहर जा,
ज़रा तो दम लेने दे|

मेरा तो दम घुटता जा रहा है
तेरे हरदम भागते रहने से|

तू दम रही है मुझे,
और बेदम होता जा रहा हूँ मैं|

लगता है दम निकाल कर ही
दम लेगी तू|

24.8.19

तारीख़ों की दस्तक


मैं देता रहूँगा दस्तक तुम्हारी यादों के दरवाज़ों पर,
जब कभी तुम मशगुल हो जाओगे
ज़िन्दगी के कमरे अपनी मशरूफ़ियत के साथ|

तुम झट से उठ बैठोगे ,
बनाओगे मन कि "खोल दूँ दरवाज़ा,
भर लूँ आगोश में तारीख़ों को,"
लेकिन हक़ीक़त की बेड़ियाँ तुम्हें जकड़ लेंगी|
तुम फिर
घुल जाओगे
कमरे की सीलन में|

और मैं,
थोड़ी और देर थपथपा के किवाड़,
लौट जाऊँगा कुछ पलों के लिए|
तुम आँखों में बेबसी का पानी रोके,
फिर मशरूफ़ हो जाओगे,
मेरे वापस आने तक|

14.1.19

एक नया गीत

एक नया गीत गाएँगे हम आज मिलकर
क़दम अब मिलाएँगे हम आज मिलकर
नया गीत गाएँगे हम आज मिलकर

न छल न कपट न मुसीबत की चालें
न तलवार तमंचे न लाठी न भाले
मोहब्बत बहाएँगे हम आज मिलकर

जो छूटे हुए हैं उन्हें हम पुकारें
जो रूठे हुए हैं उन्हें हम दुलारें
कि बाहें फैलाएँगे हम आज मिलकर

नहीं भीख माँगें अब हम किसी से
नहीं रोते भागें अब हम किसी से
हकें छीन लाएँगे हम आज मिलकर

नहीं अब गुलामी करेंगे किसी की
नहीं रोटियों में पलेंगे किसी की
कि पंख सँवारेंगे हम आज मिलकर

न पीड़ा न आँसू नहीं दुश्मनी हो
न बाहें किसी की लहू से सनी हों
ख़ुशी में नहाएँगे हम आज मिलकर।

18.12.18

बगदरा-सिंगरौली का अन्तिम छोर


मैं अन्तिम छोर हूँ,
जहाँ पानी भी
अपनी आख़िरी बूँद के साथ ही पहुँच पाता है।
अन्तिम वह स्थान होता है,
जहाँ प्रारम्भ चाह कर भी नहीं पहुँच पाता,
और पहुँचता भी है, तो चुका हुआ।
अन्तिम तक पहुँचते-पहुँचते
मध्य भी थक ही जाता है,
और तक जब पहुँचता है
स्वयं ही अन्त हो जाता है।
मुझ तक पहुँचने वाली
सरकारें भी,
साहब-दर-साहब बिखरी हुई आती हैं,
और साहब तो अक्सर रीते हुए ही होते हैं।
हमें देने की बजाय,
उल्टा हमें ही देने पड़ जाते हैं।

मैं अन्तिम छोर हूँ,
मेरी आवाज़
मुझमें ही घुट रही है,
मुझमें ही मर रही है।
प्रारम्भ ने अपनी दीवारों पर
सफेदी पोत दी है,
मेरे अँधेरे को
दुनिया की नज़रों से छुपा दिया है,
और अब वह विश्वगुरु बन चुका है।
यह अलग बात है कि
उसके अन्तिम छोर ने आज तक
सूर्य नहीं देखा।

23.8.18

अंतिम इच्छा

उसका आगमन है अटल,
तो आएगी ही।
आलिंगित कर मुझे
भर लेगी मेरी श्वासों के भीतर अपने।
मेरे स्पन्दनों पर कर एकाधिकार,
रक्त-शिराओं में बना डालेगी बाँध भी।
नेत्रों को कर निमीलित,
हरेगी ज्योति,
और पूर्ण निःशक्त कर,
कर देगी भू-शायी मुझे।
वह है तो अतिथि,
परन्तु आती ही है,
है यह निश्चित ही,
क्योंकि वह मृत्यु है।

हे भविष्य मेरे!
मैं नहीं चाहता,
मेरे शव का जीवन हो अत्यल्प।
बने घातक वन्य-काष्ठ,
या जल-विद्युत के लिए,
और
सिन्दूरी-पीली,
आड़ी-टेढ़ी रेखाओं के मध्य बचे राख मात्र,
कुछ ही क्षण तमतमा कर।

मैं तनिक भी नहीं इच्छुक
कि मेरे जीवनोपरान्त
मनोरंजन हो अघाए-जनों के लघु-दीर्घाहार का,
और परिजनों पर आए बोझ बलात रीतिपालन का।

है मेरी प्रबल लालसा यह
कि
दिया जाऊँ फेंक किसी निर्जन-कानन में,
जहाँ न हो मानव-रेख भी,
और जिए मेरा पार्थिव,
मृत-जीवन भी कुछ दिवस।

मैं चाहूँगा,
करना आमंत्रित
श्वान-शृगालों, कीट-कागों, गृद्ध-ब्यालों को।
मिले उन्हें भी प्रेम मेरा,
जो चलती देह को छू भी नहीं पाते।
उनका उदराहार बन,
मैं करूँ तृप्त
क्षुधा उनकी।

कथित वीभत्स-ज्ञानी
एवं नरभक्षी मनु-सन्ततियों
के शोषण से कहीं श्रेष्ठ है,
अज्ञानी एवं मूक प्रकृति-जन्यो के मध्य,
मिट्टी का मिट्टी हो जाना।