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31.12.13

लाचार कुत्ते की जिंदगी


लाचार कुत्ते की ज़िन्दगी
आज सुबह घने कोहरे के बीच मैं अपने स्कूटी से चला आ रहा था। कोहरे के बारे में क्या बयान करूँ बस ये समझ लीजिये कि पाँच मीटर की दूरी पर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। अचानक मेरी गाड़ी के नीचे कोई दब जाने की उम्मीद से कूद पड़ा। मेरी गाड़ी उससे ये टकराई, टकराई, टकराई, इस स्थिति में ही थी कि मैंने ब्रेक लगा दिया। सामने देखा तो एक कुत्ता था। ठण्ड से कुड़कुड़ाता हुआ एक दम मरियल सा दीख रहा था। देखने से लग रहा था शायद इसका कोई मालिक नहीं है, बस यूँ ही आवारा है। होटलों और बड़े भोजों के दोने-पत्ते चाटने वाला। गरीब, बेबस, लाचार। हड्डियाँ तो आसानी से गिनी जा सकती थीं।
मेरे ब्रेक लगाने के बाद मैंने हॉर्न बजाया, यह कहने के लिए कि “हट जाओ मुझे जाने दो” किन्तु वह नहीं हटा। मैं खड़ा हो गया। आदतन मैंने उसे प्रणाम किया और पूछा, "क्यों जानबूझ कर मेरी गाड़ी के नीचे आते हो?
उसके चेहरे और आँखों ने मुझे बताया कि मैं अपनी निर्धनता से तंग आ गया हूँ। जिस किसी के दरवाज़े पर जाता हूँ वही दुत्कार देता है। अब कहीं भी सुकून से रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं मिलता। होटलों पर चाय की पत्तियाँ खा-खा कर मेरी यह दशा हो गई है। रोटी की बजाय मुझे लोगों की गालियाँ, उनकी मार और दुत्कार मिल रही हैं। मैं रात में किसी के घर के सामने बैठ कर भौंकता हूँ कि शायद इस घर के मालिक को मुझ पर तरस आ जाए कि मैंने रात भर उसके घर की रखवाली के लिए अपनी नींद गवाई है, रात भर भौंका है, तो एक टुकड़ा रोटी नसीब ही हो जाय, लेकिन ठीक उसके उल्टा होता है। उस घर का मालिक मुझे जूते से मार कर यह कहकर भगा देता है कि हरामी ने मुझे रात भर भौंक कर सोने नहीं दिया। हर जगह मेरा हवन करते हाथ जल जाता है। बाकी मौसम तो किसी तरह बीत गये लेकिन यह हड्डियों को कँपा देने वाली ठण्ड बर्दाश्त नहीं हो रही है। किसी के घर आश्रय माँगने जाऊँगा तो मार खाऊँगा। ठण्ड में थोड़ी भी चोट लगती है तो बहुत दर्द होता है। मेरा अपना भी स्वाभिमान है। कब तक किसी और की दुत्कार सहन करूँ?
मैं उसके सामने निःशब्द था। क्या बोलता? क्या उसे दिलाशा देता? क्या समझाता? मेरी दार्शनिक-सैद्धान्तिक  बातों से न उसका दर्द मिटता, न उसकी ठण्ड जाती; या हो सकता है एक-दो दिन उसमें जोश भर जाता, लेकिन दो-चार दिनों बाद तो उसकी वही हालत होने वाली है। फिर वह इसी तरह किसी वाहन के नीचे कूदेगा, या ट्रेन के नीचे सो जाएगा। मैंने उसे एक सुझाव दिया। मेरे सुझाव में निर्दयता थी। मैंने उसे कहा देखो जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है। उसे न मेरा भाषण बदल सकता है न डॉक्टर की दवा। मैं भी एक दिन मर जाऊँगा, तुम भी मरने ही आये हो। अभी मरे नहीं तो मर ही जाओगे, लेकिन मुझे ऐसा लगता है, “मुझे और तुम्हें अभी और जीना है, इसलिए तो मेरी गाड़ी तुमसे नहीं टकराई।“ अन्यथा तुमसे टकराकर दोनों मर जाते। तो जब बच ही गये हैं, तो क्यों न कुछ और सार्थक कार्य कर लिया जाय।
वैसे मैं तुम्हें मरने से नहीं रोकूँगा, क्योंकि मैं स्वयं इतना सक्षम नहीं कि तुम्हारा पालन-पोषण कर सकूँ, और किसी के पास ज़िल्लतें सहने के लिए भेज नहीं सकता।
तुम्हारे पास दो रस्ते हैं। या तो मिले हुए इस जीवनदान का फ़ायदा उठाकर तुम सशक्त बनो, या हारकर मर ही जाओ। अगर फ़ायदा उठाओगे, तो हो सकता है तुम भी बड़े मालिकों के कुत्तों की तरह ब्रेड-बटर खाने को पाओगे। ठण्ड से बचने के लिए विशेष इन्तज़ामात होंगे। अपना खाना-पीना छोड़ मालिक तुम्हें हगाने-मुताने भी ले जाएगा। अपने बच्चे और तुममे एक पैसे का फ़र्क नहीं आने देगा। अपने बच्चे के लिए तो आया रख लेते हैं, लेकिन अपना शौक पूरा करने के लिए तुम्हारी टट्टी-पेशाब भी ख़ुद ही साफ़ करगा। यहाँ तक कि ठण्ड से बचाने के लिए तुम्हें दो-चार घूँट ब्रैंडी भी पिलाएगा। यहाँ तक कैसे पहुँचना है, यह मुझे भी नहीं पता क्योंकि मेरी भी स्थिति तुमसे थोड़ी-सी अच्छी है, बाकी मैं भी तुम्हारे ही जैसा हूँ। इसीलिए तो तुम्हें प्रणाम किया था। तो इसका मार्ग तुम्हें ही तलाश करना होगा।
यदि दूसरा वाला रास्ता अपनाना चाहते हो, अर्थात् मरना चाहते हो, तो भाई एक सुझाव दूँगा कि किसी दो पहिया वाहन से मत टकराना। इन कमबख्तों में इतनी जान नहीं होती कि वो किसी और की जान ले सकें। ये दो पहिया वाहन बस ख़ुद की ज़िन्दगी जीती हैं। उनकी इतनी औक़ात ही नहीं कि वो किसी को मार सकें। मुझे ही देखो तुम्हें सामने देखते ही मैंने ब्रेक लगा दिया।
अगर तुम्हें मरना है, तो कार के नीचे कूदो, बस के नीचे कूदो, ट्रक के नीचे कूदो। ये पैसे वाले लोग होते हैं, या पैसे वालों की गाड़ियाँ होती हैं। दूसरों की जान ले लेना, तो इनका बाँयें हाथ का खेल है। मुम्बई के एक बड़े अभिनेता की ख़बर तो पढ़ी ही होगी, अपनी अमीरी और शराब के नशे में चूर, उसने फूटपाथ पर सोये लोगों को ही कुचलकर मार डाला। इनके नीचे दबोगे न, तो एक बार में ही प्राण निकल जायेंगे। तड़पना भी नहीं पड़ेगा। दो पहिया के नीचे कूदोगे, तो तुम तो नहीं मरोगे, हाँ मैं मर सकता हूँ। अगर मैं नहीं मरा तो लोग तुम्हारी भावनाओं को तो समझेंगे नहीं कि तुम ही मरना चाहते थे, इसलिए कूद गये, बल्कि वे हमें इसलिए पीटना शुरू कर देंगे कि हम अंधों की तरह गाड़ी चलाते हैं। दूसरे पुलिस केस होगा। तुम आत्महत्या करना कहते हो यदि यह पुलिस को पता चला तो तुम्हारे ऊपर भी केस होगा। चोट लगेगी डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा। इसका मतलब समझते हो। पुलिस और डॉक्टर के पास पहुँचने के बाद जितना तुमने और मैंने ज़िन्दगी भर कमाया नहीं होगा न वो इनके केस के निपटारे और मरहम पट्टी में ख़त्म हो जाएगा। दोनों की ज़िन्दगी मौत से बदतर हो जायेगी। तो भाई मरने की इच्छा तुम्हारी और ज़िन्दगी नर्क बनेगी हमारी। ऐसा ज़ुल्म हम न करो।
तुम्हारा मरना या जीना तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूँ, मुझे जाने दो। कितनी भी ठण्ड है, पर नौकरी पर जाना है। और उस कुत्ते को उसी हालत में छोड़ मैं गाड़ी का सेल्फ स्टार्ट दबाया और कोहरे का आनन्द लेते हुए गन्तव्य की ओर रवाना हो गया। कुत्ते ने क्या किया यह तो शायद यह तो पता न चले, क्योंकि अखबार और न्यूज़ चैनल तो आज़म खान के भैंस और प्रधानमंत्री की भतीजी की चीज़ें खोने की ख़बरें प्रकाशित करते हैं, आवारा कुत्तों की नहीं। वरना इस ठण्ड में कितने लोग ठिठुर कर मर रहे हैं...

12.1.13

मैं मलेरिया प्रूफ़ हूँ


मेरे एक मित्र को मलेरिया हो गया है। बड़े ही दुःख की बात हुई। कारण कि हम सब मस्ती करेंगे और वो आह भरेंगे और मन ही मन हम लोगों को प्यार भरी भारतीय गाली भी देंगे। हालांकि वो गाली देने वाले तो नहीं हैं पर ससुर मन का क्या भरोसा कभी भी कुछ भी करवा सकता है।
अच्छा मैंने चिकित्सक महोदय से पूछा कि ये मलेरिया नामक बीमारी होती कैसे है? और किसे हो सकती है? तो उन्होंने साफ शब्दों में बड़े प्रेम से बताया कि मलेरिया मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से होता है और यह किसी को भी हो सकता है।
मुझे असमंजस हुआ और यह मजाक भी लगा कि एक मच्छर वह भी महिला मच्छर के काटने से ऐसी बीमारी हो सकती है? मैं जोर से हंसने लगा तो चिकित्सक महोदय बड़े ही आश्चर्य से मुझे देखने लगे और एक पल के लिए उन्हें लगा कि उन्हें एक हजार रुपए और एक कंबल तो पक्का मिलने वाला है क्योंकि कहा जाता है कि रांची पागलखाने में जो पागल को भर्ती कराता है उसे उपरोक्त एक हजार रुपए और एक कंबल बतौर पारितोषिक दिया जाता है।
अब यह क्यों दिया जाता है यह बताने वाले को भी नहीं पता लेकिन मैं बड़ा ही अलग टाइप का बुद्धिजीवी हूं और हर बात का मतलब अपने तरीके से निकाल लेता हूं और इस काबीलियत की दाद-खाज-खुजली भी स्वयं ही दे लेता हूं क्योंकि किसी और को मुझे दाद देने की फुर्सत भी नहीं होती।
तो मैंने उस रुपये और कंबल के पीछे की जो अवधारणा निकाली वह यह थी कि इससे यह फायदा होगा कि जितने भी कड़वा सच बोलने वाले लोग हैं और यदि पैसे से अपना मुंह बंद नहीं करते तो उन्हें पागल करार कर इसी पागलखाने में मुबारक कर दिया जायेगा जिससे सारे काले कामों को बेधड़क अंजाम दिया जा सके।
मैं फिर हंसते हुए बोला डाक्टर साहब एक मच्छर आदमी को....... बना सकता है क्योंकि हो सकता कहने वाले के अनुसार वह पुरुष मच्छर है किन्तु एक मच्छरनी में इतनी ताकत की वह किसी को बीमार कर दे?
अचानक मेरा बचपन में सुना हुआ एक गाना लवेरिया हुआ याद आ गया। मैने चिकित्सक महोदय से पूछ लिया क्या मलेरिया और लवेरिया का कोई आपसी संबंध है? वे हंसने लगे और बोले विद्यार्थी जी आप बेवकूफ तो हैं ये आपकी बातों से पता चल रहा था पर इस हद तक हैं मैंने सोचा भी नहीं था। मैंने दांत निपोर दिये क्योंकि मुझे लगा यह मेरी बड़ाई की जा रही है। ऐसा मुझे इसलिए लगा क्योंकि बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि बड़ों की गाली भी आशिर्वाद होती है अतः बड़ी ही विनम्रता से मैंने इस गाली को अपना सम्मान मान लिया।
और फिर तड़ से उन्होंने मुझसे प्रश्न पूछ लिया, ये बताओ लव के बारे में जानते हो? अब मुझे फिर उन पर हंसी आई कि मुझ जैसे प्रकाण्ड विद्वान से ये लव-कुश के बारे में पूछ रहे हैं। अरे जिसने अभिमन्यु कि तरह सारे वेदों, सारे इतिहासों, सारे धार्मिक किस्सों को मातृ गर्भ में ही जान लिया है वह इस पिद्दों के बारे में क्यों नहीं जानेगा अतः मैंने उनसे कह दिया कि लव तो मर्यादा पुरुषोत्तम, रघुकुल शिरोमणि, दशरथनन्दन भगवान श्री राम के बड़े सपूत हैं।
 यहां मैंने सीता का नाम नहीं लिया जिन्होंने इतने तिरस्कार के बावजूद भी संघर्ष करके उसका पालन-पोषण किया नौ महीने पहले गर्भ में ढोई फिर अथाह प्रसव पीड़ा भी सहन की, छाती का खून भी दूध बना कर पिलाया और बाद में पुरुष सिद्धांत की रक्षा के लिए बलि का बकरा भी बनी उसी का नाम लेने पर मेरे पौरुष को मेरा मन धिक्कारता अन्यथा यह भी तो कहा जा सकता था कि लव त्रेता में दो पुरुषों रावण के स्त्री लोलुपता व राम के सिद्धांतो की बलि चढ़ी एक नारी सीता का पुत्र था।
   बहरहाल मैंने अपना पुरुषत्व दिखाते हुए उनसे रामपुत्र लव की बात की और डॉक्टर साहब का एक बार जोरदार अट्टहास सुनने को मिला। वास्तव में विद्यार्थी तुम बु्द्धू हो। उन्होंने कहा मैं उस लव की बात नहीं कर रहा भाई जो किसी का बेटा है,मैं बात कर रहा हूं जो लड़कों को लड़कियों से हो जाता है। वह कैसे? अब मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह प्रश्न स्वाभाविक ही था क्योंकि आज तलक कभी लड़कियों से समीपता ही नहीं हुई थी। विद्यालय या विश्वविद्यालय में भी महिला सामिप्य नहीं जाना।
किन्तु मेरा सवाल था मलेरिया और लवेरिया के संबन्ध में आपने तो पूरा घूमा डाला।
दोनों में संबंध है।
वह कैसे? मेरी आंखें आश्चर्य के कारण इतनी फट गईं कि चाहे तो कोई सराय समझकर एक रात विश्राम कर ले।  डॉक्टर साहब आप खुलासा करके बताइये मेरे पेट में इसे जानने के लिए बड़ी ही ज़ोरों की गुदगुदी हो रही है।
देखिये मलेरिया व्यक्ति को तभी होता है जब उसे मादा एनाफिलीज मच्छर काटती है। और लवेरिया होता है जब कोई लड़की किसी लड़के पर नयनों से बाण चला दे।
हा हा हा हा हा हा!!!!!! हा हा हा हा हा हा!!!!!!
हा हा हा हा हा हा!!!!!! हा हा हा हा हा हा!!!!!!
मैंनें फिर अट्टहास प्रारंभ कर दिया और इतना तेज़ कि डॉक्टर साहब घबरा गये। शायद उन्होंने सोचा मुझे पागलपन का दौरा पड़ गया है।
उन्होंने पूछा, क्या हुआ?
मैने कहा तब तो मुझे मलेरिया हो ही नहीं सकता। क्यों? उनका एक स्वाभाविक सा प्रश्न आया।
उत्तर देने की बारी मेरी थी, बड़े ही गर्वीले स्वर में बोला, मलेरिया यदि मच्छर के काटने से होता है वह भी महिला मच्छर के और लवेरिया लड़की को लड़के से तब भाई मुझे दोनों ही नहीं हो सकते। क्योंकि मैं ऐसा व्यक्ति हूं जिसे काटना तो क्या छूने के भी उद्देश्य से महिलाएं देखती तक नहीं। ये मेरा आज तक का रिकार्ड है।
मैं मलेरिया प्रूफ़ हूं। मैं मलेरिया प्रूफ़ हूं...............
यही चिल्लाते हुए मैं वहां से दौड़ पड़ा।
अभी भी मैं मलेरिया प्रूफ़ हूं जब आपके लिए यह लेख लिख रहा हूं। मैं मलेरिया प्रूफ़ हूं क्योंकि मैं स्पष्ट सिद्धांतवादी हूं।

4.11.11

प्रेम का अकाल

एक दिन मेरे एक प्रगाढ़ प्रेमी-मित्र ने कहा, “साहब! कभी हमें भी समय दे दिया कीजिए; संसार में पढ़ने लिखने के अतिरिक्त भी काम होता है, किताबों के आलावा मित्र-सखा भी होते हैं| कभी उनसे भी मेल-मिलाप कर लिया करिए| आप तो बस अपने ही धुन में डूबे, किसी को कुछ समझते ही नहीं| श्रीमान्! ज़रा एक बार नज़र घुमा कर देखिये, आप जिन लोगों को छोड़ कर गये हैं वे आपसे मिलने के लिए कितने आतुर हैं| लोग आपको बहुत चाहते हैं, बहुत मोहब्बत करते हैं| आप एक बार आवाज़ देकर देखिये, लोगों का हुजूम आपके पीछे खड़ा होगा|” मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, “मैं कब से इतना वांटेड हो गया? आज तक कोई नेतागिरी टाइप का गुनाह भी तो नहीं किया. कभी बहुत बन-ठन कर, सज-सँवर कर भी नहीं निकला| हमेशा मैला-कुचैला रहा; भूतों-प्रेतों की तरह दाढ़ी बढ़ाए, किसी से प्यार भरी दो बातें भी नहीं की| सभ्य समाज में गवाँर की तरह रहा| इसीलिए प्रेमिका ने भी दुत्कार दिया| फिर भी लोग मुझसे ‘प्यार’ करते हैं? हे करुणामयीं! हे लीला बिहारी! ये क्या हो रहा है मेरे साथ? क्या लोग नीम-करेले को स्वार्थ सिद्धि के अलावा भी पसन्द करने लगे?” लोगों को विपत्ति में ईश्वर याद आते हैं, मैं इस सुख की घड़ी में ही याद कर बैठा|
    मेरा कन्हैया भी एक्सपेरिमेंटल निकला| उसने कहा,  “रे पगले! प्रेम करो तो जानों| वत्स! उद्धव मत बन| तुझे लगता है, तुझसे कोई प्रेम नहीं करता? तो एक बार ट्राय करने में क्या जाता है?” कन्हैया बोले जा रहा था, और मेरे पास उस समय सुनने के आलावा कोई चारा नहीं था| असल में जब आप भूल से किसी को ज्ञानी समझ पुकार कर, उससे मार्ग पूछने लगते हैं, तब वह अपने आपको महा ज्ञानी समझ लेता है; और यदि आपमें माद्दा है, तो वह आपको टीवी के किसी समाचार चैनल की तरह, एक ही बात को बार-बार दोहराकर ट्वेंटी फ़ोर इन्टू सेवन सुना सकता है| आपको आपका भविष्य सेट मैक्स के सूर्यवंशम की तरह दिखाता जायेगा| बहरहाल कृष्ण ने बोलना शुरू किया, “देख मैं तुझे अपना गूढ़ एक्सपीरियन्स बताता हूँ| जब मैं गोकुल से मथुरा चला आया था, तब यमुना में बाढ़ आ गई थी; और वह समय बारिश का भी नहीं था| इसका कारण पता है तुझे?” मैं विमूढ़-सा न में सर हिला दिया| लीला बिहारी उवाचा, “उसका कारण था, मेरे वियोग में वृन्दावन और गोकुल वासियों का महाविलाप|” उस भारी अश्रु प्रवाह के कारण, यमुना में नमकीन पानी भर गया था| उसके बाद पूरे द्वापरयुग में व्रज क्षेत्र का नमक यमुना किनारे ही बनता था| बाद में परीक्षित ने कलयुग को सब सौंप दिया, और कलयुग ने सारा नमक नष्ट कर दिया, नहीं तो आज उत्तर प्रदेश मन्दिर-मस्जिद के नाम पर लूटपाट, बलात्कार के आलावा, नमक के लिए भी प्रसिद्द होता, फिर वहाँ कथित स्वदेशी, किन्तु पूर्ण विदेशी डिज़ाइन की हाफ पैन्ट पहनने वाले केवल राम के लिए ही नहीं; नमक के लिए भी दंगा करते-कराते|” मैं आँखे फाड़े सुन रहा था|
मुरारी बोला, “तो तू भी एक बार देख ले बेटा| तुझे कितने प्रेम करने वाले हैं? तेरे पब्लिक रिलेशनशिप (पी आर) में कितना दम है?” फिर वह वह हँसते हुए बोला, “तुझे एक और गूढ़ और मज़ेदार रहस्य बताता हूँ| जब भी कोई औपचारिकता करे, “आप मेरे घर भी किसी दिन पधारें| मेरे साथ दो रूखी-सूखी रोटी पाएँ|” बस बेटा बिना समय गवाएँ पहुँच जा उनके निवास पर| प्रेम परखने का इससे सुन्दर अवसर कभी भी प्राप्त न होगा; क्योंकि एक तो वे महाशय मिलेंगे नहीं, और अगर मिल गये, तो भैया-भाभी जो भी हों, उन्हीं से बोल, “बहुत तेज भूख लगी है|” पुत्र! प्रेम की असलियत मटके में सर छुपाकर खुसफुसा-खुसफुसा कर बोलेगी, जिसे मात्र तेरी बेशर्मी ही सह पायेगी| मैंने बहुत किया है, तभी तो माखनचोर कहलाया|”
अब वह मुझे ज़ोर देकर कहने लगा, “वत्स! तू जा| अवश्य जा| देख! मैंने तो केवल दो गाँव छोड़े थे| तू तो अपना गाँव, जनपद, राजधानी, विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय इतने सारे जगहों को छोड़ कर आया है| बेटा! अगर इतने सारे लोगों ने कहीं एक साथ विलाप किया, तो इस महाक्रन्दन से तो महाप्रलय समय से पहले आ जायेगा| मेरा कलकी अवतार का सपना अधूरा रह जायेगा| और तू ये भली-भाँति जानता है कि लोग मुझे इसीलिए मानते हैं, क्योंकि मैं लीलाएँ करता हूँ, और ये वाला अवतार मेरे लिए बहुत इम्पोर्टेंट है| एक्चुअली पिछले जन्म में मैंने कई गोपियों को वचन दिया है, या यूँ समझ ले डेट दिया है| उनसे मिलना बहुत ज़रूरी है, तभी तो आदर्श प्रेमी बनूँगा|” मैंने पूछा, “तू तो भगवान् है, जब चाहे अवतरित हो जा, तू क्यों समय की प्रतीक्षा कर रहा है?” वह सहमते हुए बोला, “अबे पागल है क्या तू? उत्तर प्रदेश में अवतार लूँगा, वहाँ गोपियों के साथ डेट पर जाऊँगा? ओ भाई! एन्टी रोमियो स्क्वायड से पिटवाएगा क्या? अबे तू मेरा भक्त है, या दुश्मन? ऐसे कौन जानबूझकर अपने भगवान् को मौत के मुँह में धकेलता है यार? देख तू तो मेरा असली वाला भक्त है| भक्त ही नहीं तू तो अपने आपको मेरा 'विशुद्ध, एकलौता चेला' कहता है| मैं तेरा भगवान् होकर, तेरे आगे हाथ जोड़ता हूँ, मुझे एक बार फिर दुनिया में आने का मौका दे-दे| एक बार अपने सभी महाप्रेमियों से कांटेक्ट कर ले| उनसे मुलाक़ात कर ले| अगर भक्त ही भगवान् की नहीं सुनेगा तो कौन सुनेगा?”
 अच्छा मैं क्या है कि कन्हैया की बात टाल नहीं पाता, अतः टिकट कन्फर्म न होने के कारण, ट्रेन में ज़ुर्माना दे-देकर अपने प्रेम-पिपासों और पिपासियों से मिलने के लिए उन सभी स्थानों पर गया जिन-जिन स्थानों को मैं छोड़ कर आया था| पहुँचने से पहले तो मैंने आधुनिक संचार साधनों के माध्यम से सबको सूचित किया| फिर पहुँचकर प्रेमभरी आवाज़ में पुकारा, हे चातकों! मैं आ गया हूँ| तुम्हारे प्रतीक्षित बंजर जैसलमेरी ज़मीन को चेरापूँजी-मोसिनराम समझकर मुसलाधार प्रेम की बारिश करूँगा| आओ! मुझसे प्रेमालाप करो| एक दिन बीता, दो दिन बीता, तीन दिन बीता मैं एक ही स्थान पर बैठा प्रेमानुयायियों की बाट जोहता रहा, परन्तु मेरे लबार प्रेमियों के काम की व्यस्तता ने जो उनके कान पकड़े कि मैं उनके सुर्यमुखों और चन्द्रमुखियों के दर्शन नहीं पा सका| मुझे लगा कि शायद सदी की सबसे बड़ी घटना उन्ही चार-पाँच दिनों में घट गयी| जैसे सूर्य-चन्द्र ग्रहण एक साथ हो गये हों| मिले कौन? अनपेक्षित बेचारे तारे| अपने इतने बड़े जीवन में, प्रेमियों का इतना बड़ा अकाल मैंने कभी नहीं देखा था|
मैंने ऊपर कन्हैया की और देखा, वह स्वर्ण-मुकुट धारण किए, होठों से मुरली चिपकाये, दही टपकाते हुए मुस्कुरा रहा था| मेरे समझ में आ गया कि जब तक किसी को मुझसे कुछ प्राप्त होने के आसार नहीं होंगे, मुझसे मिलना क्या, अँगूठा तक नहीं दिखाएँगे| तुलसीदास ने लिखा है, "भय बिनु होय न प्रीत" पर मैं उन्हीं की दूसरी बात कहता हूँ, "स्वारथ लाग करहिं सब प्रीती|” लीला बिहारी तो माना-जाना देवता है| लोग उसे साक्षात् स्वर्ग के दर्शन कराने वाला मानते हैं, साथ ही नन्दराज का बेटा, यानि वह पैसे वाला भी है| मेरे मन ने कहा, “बेटा! तुम तो भुवनेश्वर की तरह गलियों में ज़िन्दगी बिता रहे हो, तुम्हें कोई क्यों घास डालेगा? सही बात तो है "बेल को लोग काटेंगे नहीं, तो क्या पानी डालेंगे?"