शब्द समर

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21.11.17

जो आग तेरे दिल में सुलगी

जो आग तेरे दिल में सुलगी,
उस आग को अब जल जाने दे
अरमानों की इस भट्ठी में,
एक चिंगारी पल जाने दे

तेरी हर चाहत की लकड़ी में,
ख्वाबों की लाशें सोई हैं
कर बन्द हवा को मुट्ठी में,
इसे बुझने का बल जाने दे
एक चिंगारी पल जाने दे

बे-मौत तेरे हर सपने को,
मरना ही लिखा है कुदरत ने
ले छीन खुदाया से अपनी,
तकदीर को अब खुल जाने दे
एक चिंगारी पल जाने दे

तमन्नाओं का हर एक धुआँ,
ढूँढेगा आसमाँ में ख़ुद को
तू खोल दिशाओं की राहें,
इसे अपने मन चल जाने दे
एक चिंगारी पल जाने दे

हर आँसू अपनी आँखों का,
जलता है बनकर तेल यहाँ
फानूस बन महफूज़ कर,
बन रूई उसे जल जाने दे.
एक चिंगारी पल जाने दे

22.11.13

ख़ामोश सुबह


सुबह बड़ी ख़ामोश है और रूहों में सरगोशी है
या क़यामत आने वाली है, या होना है फ़ना मुझको

शबनमी चमक शमशीरी लगती हैं,
परिंदों की टोली में कोई लगता है सरगना मुझको

तेरे क़दमों की आहट से अब दिल को बेचैनी है
चुभी सुई के दर्द सा लगता है कई गुना मुझको

धड़कने घुट रही हैं, अपनी ही चीख़ो में बार-बार
शायद तेरे ख़यालों ने कर दिया ज़िना मुझको

साजिशें तेरे जज़्बातों के दीदार हो रहे हैं अब
मुकम्मल प्यार के शायद तूने नहीं चुना मुझको

19.11.13

दुनिया की दीवारें

तेरे सामने मैं, मेरे सामने तू,
बातों के बीच दीवारें हैं.
तू मुझसे जीती, मैं तुझसे जीता
दोनों दुनिया से हारे हैं.


मैं इश्क़ के आँगन में हूँ खड़ा,
तू उल्फ़त के दरवाज़े पर,
तू देखे मुझे, मैं देखूँ तुझे,
नज़रों के बीच कटारें हैं.


तू बँधी है रस्मों-रिवाज़ों से,
बेड़ी मुझमें जज़्बातों की.
तू मुझमें बसी, मैं तुझमें बसा,
लोगों पड़ी दरारे हैं.


तू लड़ बैठी तुफ़ानों से,
मैं जूझ रहा हैवानों से,
तू मेरी मंज़िल, मैं तेरा मंज़िल,
रस्ते में पड़े अंगारे हैं

15.3.10

ज़िन्दगी के अंतिम मुकाम पर



मैं तेरा नाम छोड़ जाऊँगा
तेरी नज़रें बस मुझको देखेंगी
मैं ऐसी शाम छोड़ जाऊँगा

तुझपे अक्सर सुरूर मेरा हो
मैं ऐसा जाम छोड़ जाऊँगा

इसके पहले कि दाग तुझको लगे
खुद को बदनाम छोड़ जाऊँगा

दुनिया तुझमे ही मुझको देखेगी
खुद को गुमनाम छोड़ जाऊँगा

ज़िन्दगी होगी जब अन्तिम मुकाम पर
खुद पे इलज़ाम छोड़ जाऊँगा