शब्द समर

विशेषाधिकार

भारतीय दंड संहिता के कॉपी राईट एक्ट (1957) के अंतर्गत सर्वाधिकार रचनाकार के पास सुरक्षित है|
चोरी पाए जाने पर दंडात्मक कारवाई की जाएगी|
अतः पाठक जन अनुरोध है कि बिना रचनाकार के अनुमति के रचना का उपयोग न करें, या करें, तो उसमें रचनाकार का नाम अवश्य दें|
जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी' लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी' लेख लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

18.12.18

मैं हूँ यहाँ


मैं हूँ यहाँ
कि देखना चाहता हूँ मुस्कुराहट,
उन चेहरों पर भी,
जिन्हें ख़ुद से मुस्कुराने के लिए
बचपन से ही उठाना पड़ता है,
मैला, बोतलें, बोरियाँ, बेलन, बच्चे और थालियाँ।
जो होते हैं अनाम,
और बन जाते हैं
छोटू, लड़के और छोकरी।

मैं हूँ यहाँ
कि दिला सकूँ उन्हें
किताबें, बल्ले-गेंद और खिलौने।

मैं हूँ यहाँ
कि बिखेर सकूँ हँसी कपोलों पर।
मैं चिन्दियों में बिखरी खुशी को
पूरा पैरहन देना चाहता हूँ।

10.5.17

बाल गतिविधियाँ-शैतानी या स्वभाव?

चित्र-साभार गूगल 
“बच्चे बहुत शैतानी करते हैं|” अक्सर यह बात कई समाज में घर में, विद्यालय में वयः जनों से, माता-पिता, अभिभावक शिक्षकों एवं अन्य जनों से सुनने मिलती ही रहती है| ‘शैतानी’ वास्तव में इसका तात्पर्य क्या है? आइए तनिक इस पर अपनी समझ बनाते हैं| शैतान-In English-Satan. Means-Devil. “The angel, who in Jewish belief is commanded by God, to tempt humans to sin, to accuse the sinners, and to carry out God's punishment.” अरबी-शैतान। शाब्दिक अर्थ-हैवान, बुराई करने वाला| “इब्राहिमी धर्मों में सबसे बुरी हस्ती का नाम है,  जो दुनिया की सारी बुराई का प्रतीक है। इन धर्मों में ईश्वर को सारी अच्छाई प्रदान की जाती है, और बुराई शैतान को। मनुष्य को बहका कर ईश्वर के सन्मार्ग का विरोध करनेवाली शक्ति जो कुछ सामी धर्मों यथा इस्लामी, ईसाई धर्म आदि में एक दुष्ट देवता और पतित देवदूतों के अधिनायक के रूप में मानी गई है।“ हिन्दी में इन्हें दुष्ट कहा जाता है, जिसका तात्पर्य है-बुरे आचरण वाला, कुटिल मनोवृत्ति वाला, दुर्जन, दूषित, सदोष, निकम्मा, नीच। यह भी माना जाता है कि दुष्ट व्यक्ति मनुष्यों को बहलाकर कुमार्ग में लगाता और ईश्वर तथा धर्म से मुकरता है।
हमारे समाज में यह भी कहा जाता है, बच्चे भगवान का रूप होते हैं|” भगवान् जो कि मात्र दूसरों का भला करता है, जो अनुचित का विरोधी एवं न्याय का प्रतीक माना जाता है| और दूसरी तरफ, जब यह वाक्य कानों में गूँजता है कि बच्चे शैतानी करते हैं, तब कथित शुभचिंतकों का एक बहुत बड़ा विरोधाभास दिखाई पड़ता है| लोगों में यह विरोधाभास क्यों है? या तो लोग शैतान और भगवान् दोनों को एक ही जैसा मानते हैं, या वे भगवान् और शैतान का मूल तात्पर्य नहीं जानते| किन्तु लोग इतने भोले भी नहीं हैं कि दुष्ट-देव, फ़रिश्ता-शैतान, Evil-Devil में अन्तर न कर कर पाते हों, अन्यथा भारत में प्रतिवर्ष दशहरा पर अरबों रुपए किसी का पुतला जलाने में खर्च नहीं होता, और लोग उसका आनन्द लेने के लिए अपना घर-बार छोड़ कर दूर-दूर तक रावण दहन देखने नहीं जाते| फिर बच्चों की तुलना शैतान से क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि लोग शैतानी कार्य और बच्चे द्वारा किये गये कार्य को समान रूप से देखते हैं? वैसे ऐसा भी हैं नहीं| लोग बहुत अच्छे से समझते हैं कि शैतानी क्या है|
शैतानी क्या है, विद्वानों द्वारा परिभाषित शैतानी को तो ऊपर ही शब्दार्थ के साथ बताया जा चुका है| क्या बच्चे उपरोक्त परिभाषा वाले की तरह कार्य करते हैं? यह अवलोकन का विषय हो सकता है| एक दृष्टि डालते हैं, बच्चों की गतिविधियों पर- एक पल में घर में, दूसरे पल खेल के मैदान में, और कुछ देर बाद छत पर पतंग उड़ाते हुए। एक काम में ज्यादा देर तक उनका मन नहीं लगता, और वे उठकर दूसरा काम करने लगते हैं| कितनी भी धूप हो, उन्हें खेलने से मतलब है| भाई-बहन, मित्र-मित्र ऐसी लड़ाई करते हैं, जैसे एक-दूसरे के जन्म-जन्मान्तरों के शत्रु हों| कुछ सामान उठाते हैं, वह हाथ से छूटकर गिर जाता है, और टूट जाता है| माँ-पिता, भाई-बहन खिलाना चाह रहे हैं, बच्चे ठुनकते हैं, खाते नहीं हैं| कुछ सामान देखा, मन को अच्छा लगा, उसे पाने के लिए मचल उठे, रोने लगे, घर सर पर उठा लिया| रास्ते में कोई चल रहा है गुलेल, पत्थर उठाया, दे मारा| किताब-पुस्तिका रखी हुई हैं, पढ़ा-फाड़ डाला| हाथ में डंडा है, तो किसी के सर पर, देह के किसी भाग पर लाल निशान बना दिया| कक्षा में बैठे हुए, कभी खिड़की से बहार झाँकते हैं, तो कभी सहपाठियों पर, तो कभी शिक्षक पर ही प्रहार कर डालते हैं| विद्यालय से घर की ओर, या घर से विद्यालय के मार्ग में, कभी कुछ, तो कभी कुछ अप्रत्याशित-सा कर जाते हैं|
बच्चे ऐसा क्यों करते हैं? क्या वे अपने परिजनों, मित्रों का अनभल चाहते हैं? मूल रूप से देखा जाय, तो बच्चों के ये क्रियाकलाप स्वभावतः होते हैं, न कि द्वेष-भाव में भरकर| ऐसा नहीं कि बच्चों में ईर्ष्या नहीं होती, होती है किन्तु वह क्षणिक ही होती है| उनमें किसी का सर्वनाश करने का संकल्प तो नहीं होता है, इस बात को कथित बड़े लोगों को समझना होगा| एक बच्चा है, जो दूध माँग रहा है, उसे वह तुरन्त चाहिए| नहीं मिलने पर अपनी क्षमता, या परिस्थिति के आधार पर तीन कार्य करेगा, एक-जो भी सामान उसके आसपास रहेगा, उसको हानि पहुँचाएगा, दो-रोएगा, तीन-तोड़-फोड़ से काम न बनता देख भी रोएगा, अर्थात् हानि और रुदन दोनों|  बच्चे द्वारा की गई दोनों ही गतिविधियाँ अपनी बात मनवाने के हथकण्डे हैं| उसके पास कोई और मार्ग ही नहीं होता है| इसी प्रकार की माँग यदि कोई बड़ा/वयस्क व्यक्ति करता/करती, और समय पर पूरा नहीं होता, तो वह मन-ही-मन कुढ़ जाता/जाती है, अब चूँकि वयस्क लोगों के पास थोड़ी समझ बढ़ गई रही होती है, अतः वे अपने भीतर उठने वाले हर गुबार को कई बार रोक लेते हैं, और अन्यमनस्क होकर या वहाँ से चले जाते हैं, या अप्रत्यक्ष कुछ ऐसा कर देते हैं, जिससे उनकी इच्छा पूर्ती न करने वाला/वाली थोड़े ही समय के लिए सही, किन्तु परेशान तो हो ही जाय|
अब यह देखने वाली बात है कि अधिक घातक क्या है, बच्चे द्वारा त्वरित प्रतिक्रिया, या वयस्क द्वारा अप्रत्यक्ष घात? इन दोनों में से शैतानी की श्रेणी में किसे रखा जाय? सोचे-समझे षड्यंत्र को, या अनभिज्ञ गतिविधियों को? मुन्शी प्रेमचंद ने बच्चों के भीतर उठने वाले असंख्य प्रश्नों पर आधारित एक कहानी ‘नादान दोस्त’ लिखी है| उस कहानी में माता-पिता की व्यस्तता के कारण अपने प्रश्नों का उत्तर न पाने वाले, केशव और श्यामा ने जो भी किया, वह मात्र अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिए, किन्तु परिणामतः चिड़ियों के अण्डों का गिर कर नष्ट हो जाना, उन्हें भी अप्रत्याशित लगता है|
बच्चों में प्रश्न एक सैलाब की तरह उमड़ते रहते हैं, वे उनका उत्तर खोजना चाहते हैं| जब बड़े उनकी सहायता नहीं करते, तो वे स्वयं प्रयोग करते हैं| क्या बच्चों द्वारा शंका-समाधान हेतु किये गये अनुसंधान को शैतानी कहा जाय? या उनके स्व-विनोद को शैतानी कहा जाया? क्या अपनी माँगों को पूरा करने के लिए किये गये हठ को शैतानी कहा जाय? यदि इन गतिविधियों को शैतानी कहेंगे, तो फिर उपरोक्त विद्वानों द्वारा परिभाषित शैतान, Devil और दुष्ट की परिभाषा में परिवर्तन की आवश्यकता होगी| यह भी समझना होगा कि ऐसा होने पर बच्चे आत्मग्लानि महसूस करने लगते हैं। आत्मग्लानि महसूस करने वाले बच्चों का आत्मविश्वास कम हो जाता है। वे अपने-आप पर शंका करने लगते हैं। वो समझने लगते हैं कि उनके साथ कुछ अनुचित हो रहा है। इस बात को ध्यान में रखना जरूरी है कि बच्चे कहीं अपराध-बोध से ग्रस्त न हो जाएँ।

अन्त में बस यही कि बाल-मन, बाल-चेष्टा, बाल-क्रीड़ा को समाज में घातक प्राणियों की तुलना से बचाना होगा, ताकि बच्चे स्वस्थ्य रूप से सोच सकें, और उचित-अनुचित में अन्तर कर सकें, और इसका दायित्व प्रत्येक अभिभावक, शिक्षक एवं सामजिक वयस्क एवं वृद्धों का है| बच्चों को शैतान न कह उसे खिलाड़ी, अभिनेता, शोधकर्ता इत्यादि एवं उनकी गतिविधियों को क्रीड़ा, मनोरंजन, शोध इत्यादि नाम दिया जा सकता है| तब हम कहीं जाकर बच्चों के बचपन से न्याय कर पाएँगे|

2.2.14

ब्राह्मण का विधर्मी प्रेम

जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी'
भाई मैं हिन्दू हूँ. तिस पर उच्च कुल गोत्र ब्राह्मण. बचपन से घर-गाँव और आस-पास के परिवेश से संस्कार मिले हैं कि बिना नहाए-पूजा पाठ किये अन्न-जल ग्रहण ना करूँ. किसी निम्न जाति के व्यक्ति के छुए अन्न-जल से परहेज करूं. अन्य जाति तो ठीक किन्तु चमारों और धैकारों (डोम) लोगों को छुऊँ भी नहीं अन्यथा अपवित्र हो जाऊंगा. मुसलमानों से कोसों दूरी बनाकर रहूँ, ये लोग बड़े ही कट्टर और कसाई होते हैं, हिन्दुओं को पसंद नहीं करते. 
मुझे जो बातें लोग बताते थे, जिनसे परहेज करने कि बातें मेरे कानों में पड़ती थीं वे लोग भी मुझसे यही बात कहते थे. "नाहीं बाबू हो तोहरे बड़े मनई लाग हमरन क छुअल खाब त तोहार जाति चलि जाई. हमरन से दुरिहाँ रहल कर." जिन्होंने किया मैं उनका नाम नहीं लिखूंगा किन्तु मैंने अपनी आँखों से देखा है कि एक केवट के घर में उसके आटे को लात से कुचल कर फेक दिया गया, उसके चूल्हे में पानी डाल दिया गया था. मैं बचपन से भक्त रहा हूँ. ईश्वर के प्रति सदैव से मेरी श्रद्धा रही है. मैं जब छठी कक्षा में था तभी गीता का पाठ किया था. उसमें पता नहीं क्या लिखा था किन्तु वह मेरा धार्मिक ग्रन्थ है इसलिए उसका पूरा अध्ययन किया था. रामचरित मानस की चौपाइयां तो अभी भी कंठस्थ हैं. विद्यालय में अन्ताक्षरी होती तो कोई मुझे परास्त नहीं कर सकता था. नलकूप पर मैं नहा रहा होता था तो कोई भी खैरवार जाति के घर का व्यक्ति उसके घेरे में खड़ा भी नहीं हो सकता था. विद्यालय में पानी पीते समय चमारों के लड़के दस कदम दूर होते थे. मुसलमान तो मेरे गाँव में नहीं थे हाँ पड़ोस के गाँव समदा में हैं उन्हें पता नहीं किन-किन शब्दों से चिढ़ाते थे. लम्बी सी शिखा और त्रिपुंड तिलक पूरे गाँव और विद्यालय में मेरी निशानी थी. स्मरण आता है कक्षा सातवीं में था. मेरे गाँव के ही एक शिक्षक (नाम नहीं लिखुंगा क्योंकि विवाद का कारण बन सकता है) सामाजिक विज्ञान पढ़ा रहे थे. उसमें था कि किसी से छुआछूत का भाव नहीं रखना चाहिए, सबको मिलजुल कर रहना चाहिए. चाहे कोई भी जाति-धर्म का व्यक्ति हो सब एक समान हैं. जो शिक्षक मुझे पढ़ा रहे थे उन्होंने मुझसे पानी मंगाया. प्रतिदिन जब भी उन्हें या किसी भी शिक्षक को प्यास लगती वे मुझे या मेरे जैसे ही किसी सवर्ण या तथाकथित पानी वाली जाति के ही बच्चे से पानी मंगाते और पीते. इस दिन भी उन्होने मुझसे पानी मंगाया. मैंने धर्मेन्द्र कुमार चर्मकार को भेज दिया वह पानी लाया और पंडीज्जी को देने लगा. तड़ाआअक एक तमाचा उसके गाल पर गूंजा. वह वहीं खड़ा रहा मैं डर गया. मेरा कान पकड़कर उन्होंने उठाया. हम तोहसे पानी मंगाए रली न? वे मुझ पर जोर से गरजे. वे मुझे पीट नहीं सकते थे क्योंकि इसका एक कारण तो मुझे पता है जब मैं अनामांकित था तभी से एक होनहार बच्चे के रूप में पूरे विद्यालय और गाँव में मेरा बर्चस्व था. दूसरा आज तक नहीं पता. क्योंकि किसी बच्चे का होनहार होना उसे उसकी पिटाई से बचा ले यह बात गले नहीं उतरती. मेरा परिवार दबंग भी नहीं है न मेरे माता-पिता हममे से किसी भाई -बहन का पक्ष लेकर विद्यालय में लड़ने ही जाते थे फिर भी? अभी लिखते समय एक कारण ध्यान में आ रहा है वह यह कि कहा जाता है मैं उनका पौपूज्य ब्राह्मण हूँ. उनके घर-ख़ानदान की लड़कियों से मेरे खानदान में विवाह होता है. पौपूज्य ब्राह्मण पर हाथ उठाने का मतलब था सात पीढ़ियों को नर्क में डालना. हो सकता है पाप के भय से न पीटा हो. मैं किसी भी शिक्षक को पंडीज्जी या सर जी कह के नहीं बुलाता था. सभी मेरे गाँव से ही थे अतः कुछ न कुछ रिश्ता होने के कारण मैं उसी संबंध सूचक शब्द से पुकारता था और आप की जगह तुम शब्द का प्रयोग करता था. “तुहिन न अबहिन पढ़ावत रल कि सब एक समान होन. चाहइ कौनउ जाति-धर्म क मनई होंइ. एही से हम एकरेकी पठइ देली.” पूरी कक्षा डरी हुई थी. लेकिन मैं निर्भीकता से बोला. कक्षा में तो बोल गया लेकिन अब डर इस बात का था कि कहीं यह बात भैया को पता चली तो जम के कुटाई होगी. हालाँकि कभी पीटा गया तो नहीं था लेकिन भैया का डर सदैव मेरे मन में भरा रहता था. तब तो सही गलत को समझ भी नहीं पता था. मैंने धर्मेन्द्र से पानी मंगाकर सही किया था या गलत तब मुझे नहीं पता था किन्तु अब सोचता हूँ वह मेरे क्रांति का पहला कार्य था. बड़ा हुआ धर्मों को समझने का प्रयास करने लगा तब समझ में आया ईश्वर मात्र जीव बनता है. मनुष्य, पशु, पक्षी फिर उन सबमें धर्म और जातियों का निर्धारण मनुष्य करता है. ईश्वर कोई एक शक्ति है जो अदृश्य है उसी को लोग अपने-अपने ढंग से पूजते हैं, उसकी इबादत करते हैं. मेरी शिखा, मेरा तिलक मेरे माथे पर रहे या न रहे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. ईश्वर भी समय के वश में है समय जो चाहता है वही करता है. यह जाति-धर्मों के लिए चिल्लाचोट मात्र मनुष्य करता है. मेरी यह समझ बन ही गई और इसी के आधार पर जीवन पथ बढ़ चला हूँ. विद्रोह और मैं दोनों भाई-भाई हैं. जहाँ कहीं अनुचित लगता है मैं तपाक से उठ खड़ा होता हूँ. इसके कई सारे नमूने विद्याद्य, महाविद्यालय और विशेष रूप से माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कुलपति के विरोध में प्रस्तुत हो चुके हैं. अनुचित के विपक्ष में बोलने पर कईयों ने मुझे सलाह भी दिया कि इस प्रकार मत बोला करो तुम्हारी छबि धूमिल होती है. मेरा एक ही उत्तर होता है अन्याय होने के बाद क्या छबि का आचार डालूंगा? मैं सीधी में जब पढ़ रहा था उस समय संघ से वास्ता हुआ. भारतीय संस्कृति की झलक और परम्पराओं के निर्वहन का बोझ देख मैं उस ओर आकर्षित हो गया. बचपन से इच्छा थी सरस्वती शिशुमंदिर में पढ़ने की किन्तु परिवार की आर्थिक समस्या थी नहीं पढ़ सका. यहाँ आकर एक अवसर मिला है इससे जुड़ने का सो जुड़ गया. एक लम्बा सा कुर्ता, माथे पर लाल लम्बा तिलक और सर पर लम्बी सी शिखा और वाणी में ओज. यह देख बजरंग दल के ज़िला अध्यक्ष ने मुझे सम्मिलित होने के लिए कहा मैं सम्मिलित हो भी गया. शाखा में प्रतिदिन उपस्थित होने लगा. बड़ा ही आनंद आता. मेरे जुड़ने के सातवें दिवस एक जन भाषण देने बैठे उनका नाम अभी मुझे स्मरण नहीं है. उन्होंने बहुत सारी बातें कहीं जो देशहित में थीं किन्तु एक बात मुझे सुई की भाँति चुभ गई. उन्होंने कहा मुसलमान और इसाईयों को इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं. ये म्लेच्छ होते हैं. इनका वध करने से पुण्य मिलेगा. उसी मंच पर मेरा उन महानुभाव से विवाद हो गया और संघ से मेरा संबंध भी विच्छेद. मैं मानव को मात्र मानव के रूप में देखता हूँ किसी जाति-धर्म के आधार पर नहीं. मैं जब भोपाल में था वहाँ एक मुस्लिम घर में ही रहता था. पूजा करता था और ज़ोर से तीन बार शंख बजाता था. मैंने वहीँ रहकर नमाज पढ़ना सीखा. कलमा तो ज़ुबानी याद हो गया. “लाइलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद-उ-रसुल्लाह” अवसर मिलते ही जुमे की नमाज पढ़ लेता हूँ. इस समय भी कई सारे मुसलमान मेरे घनिष्ट मित्र हैं. उन सबसे द्वेष कैसे कर सकता हूँ. मेरे कसी भी हिन्दू घर्म ग्रन्थ में नहीं लिखा है कि मैं मित्र से घात करूँ वरन रामचरित मानस में बाबा तुलसी दास ने लिखा है “जे न मित्र दुःख सुनी होहिं दुखारी. तिनहिं विलोकत पातक भारी.” मुसलमान मेरे मित्र हैं तो मैं उन्हें हानि कैसे पहुंचा सकता हूँ? अभी कुछ दिन पूर्व मेरे जन्मदात्री राजस्थान के पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मंदिर में दर्शन के लिए आये. आयु अधिक है अतः मेरा उनके साथ होना आवश्यक है. सो मैं भी उनके साथ था. पुष्कर दर्शन के पश्चात् मैंने उनसे अजमेर शरीफ़ दरगाह चलने का आग्रह किया. मैं डर रहा था पिता जी या माँ की डांट पड़ेगी किन्तु वे पुत्र की इच्छा को पूरी करने के लिए तैयार हो गये. हम अजमेर शरीफ़ गये. माता-पिता भी भीतर तक गये. वहां मुझे ढेर सारा फूल मिला. ईश्वर पर असीम श्रद्धा है फूल रख लिया. नवलगढ़ आया अपने कमरे में लीला बिहारी श्री कृष्ण के चरणों में वह फूल अर्पित कर दिया. मेरी माँ को अन्य जाति-धर्म के लोगों से समस्या होती है और पिताजी तो प्रख्यात पण्डित हैं उन्हें तो होना ही है. मैंने फूल कृष्ण के पास रख दिया और माता-पिता से बोला देखो अगर इसको अल्लाह से कोई दिक्कत होगी तो यह फूल को तुरंत ही लात मार देन चाहिए क्यों जो किसी से घृणा करता है उसे अपने पास नहीं रहने देता किन्तु तब से लेकर आज पन्द्रह दिन हो गये वे फूल सूख कर मुरझा गये हैं लेकिन कृष्ण के चरणों में ही पड़े हैं.

29.9.13

जीवन एक अंतहीन प्यास

एक ऐसी कला जिससे जन्म लेते ही हर प्राणी प्रेम करने लगता है। मूक हो, या वाचाल, इस प्रेम से कोई भी अछूता नहीं है। यदि कोई किसी व्यक्ति से पूछे कि आप सबसे अधिक किससे प्रेम करते हैं? उस समय सामने वाले व्यक्ति की जो प्रतिक्रिया होगी, वह देखते ही बनेगी। क्योंकि इस प्रश्न के पश्चात् अधिकतर लोगों के समक्ष अपने किसी प्रेमी-प्रेमिका, या किसी घनिष्ठ का चित्र उभर कर आता है, जबकि प्रत्येक प्राणी, जिससे सबसे अधिक प्रेम करता है, वह है एक ‘कला’। वह कला कुछ और नहीं 'जीवन' है।
प्रत्येक जीव, जब तक उसके शरीर में रक्त संचरित होता, तब तक इससे चिपका रहता है, और विपरीत आने वाली हर परिस्थिति से लोहा लेने के लिए तैयार रहता है। शरीर के भीतर होने वाली विभिन्न क्रियाएँ ‘जीवन’ हैं। जैसे ही समस्त दैहिक क्रियाएँ बंद होती हैं, उसी समय कहा जाता है, “फलाँ जीव नष्ट हो गया।“ जीव का तात्पर्य है, सप्राण, या जिसमें ‘जीवन’ हो वही जीव है।
मेरी दृष्टि में ‘जीवन’ को मात्र चलने-फिरने का नाम दे देना अन्याय होगा। यह ऐसी कला है, जिसमें पारंगत होना सभी जीवधारियों के वश में नहीं है। ‘जीवन’ एक उद्देश्य है, जिसमें सुगम, और दुर्गम मार्ग से होकर निकलना पड़ता है। यहाँ सुगमता को प्रेम और दुर्गमता को घृणा का पात्र बनना पड़ता है। इसे प्रसन्नता और खिन्नता भी कहा जा सकता है।
जीव अपने ‘जीवन’ में मात्र, प्रकाश चाहता है, अन्धकार नहीं, जबकि वह भूल जाता है कि घड़ी की सुई किसी एक स्थान पर नहीं टिकती। यदि वह मनोरम और सिन्दूरी प्रकाश को जन्म देने वाली उषा काल का भोर बन नवोर्जा से सँवारती है, तो उसी प्रकाश को यौवन का रूप देते हुए तपती-चमकती धूप वाली दोपहरी भी बन थकाती है। यदि उसी प्रकाश के विलोपन, और अन्धारम्भ के मन्द समीर वाली संध्या बन लुभाती है, तो काली-घनी, सियारों और झींगुरों की ध्वनियों से भयभीत कर देने वाली पूर्णान्धकार वाली रात्रि के रूप में डराती भी है। यही प्रक्रिया अनवरत और निरन्तर चलती रहती है, सब के जीवन में। सृष्टि ने समस्त जीव धारियों को एक ही सुविधा सामान रूप से प्रदान किया है, वह है समय। किसी के समय की घड़ी की सुई कभी भी स्थिर नहीं होती, उसी प्रकार व्यक्ति के ‘जीवन’ में प्रकाश और अन्धकार भी स्थायी नहीं रहते, हाँ यह अवश्य है कि ऋतुओं के आधार पर प्रकाश और अन्धकार की समयावधि अधिक-कम होती रहती है। प्रकाश का गमन व्यक्ति को जितना ही शीघ्र प्रतीत होता है, अन्धकार का उसके ‘जीवन’ से प्रस्थान उससे भी कहीं अधिक विलम्ब से लगता है। कोई भी जीव अपने ‘जीवन’ में दुःख को समीप नहीं देखना चाहता, किन्तु सुख को वह प्रेयसी की भाँति आलिंगित किये रहना चाहता है। यहाँ प्रकाश और अन्धकार क्रमशः सुख-दुःख के प्रतीक ही हैं। अतः सूर्य और चन्द्रमा के पग-से-पग मिलाने वाली एक घड़ी है ‘जीवन’, जो साँसों की सुइयों के साथ निरंतर गतिमान होता है। 
‘जीवन’  पीढ़ी-दर-पीढ़ी हर प्राणी में अलग-अलग प्रकार से हस्तान्तरित होने वाली एक संस्कृति का नाम है। ‘जीवन’ एक प्रकार का जीवन और सामाजिक मूल्य है, जो कई सिद्धांतों और वर्जनाओं के जाल-रूप में गुँथा होता है, और प्राणी चाह कर भी उससे बाहर नहीं निकल पाता। ‘जीवन’ संक्रमण है, जो सकारत्मक और नकारात्मक दोनों रूपों में प्राणी-से-प्राणी को प्रभावित करता है, और स्वयं से प्रेम करने के लिए एक-दूसरे को प्रेरित करता है। ‘जीवन’ वरण है, जिसे हर कोई अंत से अनंत तक अपने से आलिंगित किये रहना चाहता है। शरीर त्याग के पश्चात् भी, यश-अपयश के रूप में इस संसार में सनाम अमरत्व प्राप्त कर लेने का नाम है ‘जीवन’।
‘जीवन’ एक धारा है, जो अपने अनन्त जलधि की प्राप्ति के लिए, निरंतर बहता ही रहता है। अपने उद्गम से लेकर अनन्त के समाधि-संगम तक, अनगिनत गुण-दोषों को समेटे, दोनों छोरों को तृप्त-अतृप्त करता अविराम चलायमान रहता है ‘जीवन’।
‘जीवन’ ऐसा सहचर है, जिसे पाने के लिए सृष्टि जीव के समक्ष नित करबद्ध खड़ी रहती है। ‘जीवन’ ऐसा भोज है, जिसकी प्राप्यता के लिए हर जीव उसी प्राकर कतार में खड़ा रहता है, जैसे राजकीय व सहकारी विक्रय केन्द्रों में, निर्धनता के स्तर से नीचे जीवन यापन करने वाले लोग। सृष्टि जीवों को एक अनुपम और अद्वितीय उपहार देती है, जिसका नाम है ‘जीवन’। यह उपहार बिना किसी प्रतियोगिता या प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित हुए ही पुस्कार स्वरूप मिलता है। डॉ. हरिवंश राय बच्चन के शब्दों में ‘जीवन’ मदिरा है, जिसका पान किये बिना इस सृष्टि का कोई भी आगन्तुक नहीं रह सकता।

अंत में ‘जीवन’ संघर्ष है। अपने अस्तित्व के महाभारत की रणभूमि है ‘जीवन’। यह ऐसा कुरुक्षेत्र है, जहाँ पाण्डव-कौरव भी,  रथी-सारथी भी और स्वयं कृष्ण भी, सभी कुछ वही होता है, जो जीना चाहता है। स्वयं को उपदेश देता है, स्वयं को स्वयं से मारता है,  स्वयं ही परीक्षित को बचाकर कर अपने इच्छा रूपी वंश की रक्षा करता है। इसीलिए जितना मृत्यु के समीप है, उतनी ही एक अंतहीन प्यास है यह ‘जीवन’।

12.1.13

नग्नता से नंगेपन तक



मैं जब कक्षा छठी में था तब मुझे पढ़ाया गया था कि पृथ्वी जब उत्पन्न हुई तब वह आग के गोले के समान थी। धीरे-धीरे वह सूर्य से दूर होती गई और उसका तापमान घटता गया। कालान्तर में अभी तक जितने शोध हो सके हैं या जितनी खगोलशास्त्रियों ने जानकारी जुटाई उसके अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड में पृथ्वी ही एक ऐसी ग्रह है जिसमें जीवन संभव है।
इसी प्रकार अनेक दूसरे जीवों की उत्पत्ति के पश्चात् मनुष्य की उत्पत्ति हुई। इतिहासकारों के अनुसार जब मनुष्य वानर से नर बना, तब वह निर्वस्त्र था। उसे वस्त्र पहनना नहीं आता था या यूं कहें कि तब वस्त्र क्या होता है, उसे पता भी नहीं था। समय बीतता गया मानव में बुद्धि का विकास हुआ उसने बड़े-बड़े आविष्कार किये और आज हम जिस युग में जी रहे हैं वह युग ‘कलयुग’ है। कलयुग अर्थात ‘कल’ माने ‘यन्त्र’, ‘युग’ माने ‘समय’।
चक्र की आकृति गोल होती है और संयोग से समय और पृथ्वी की आकृति भी गोल ही है। प्रतिदिन घड़ी की सुई जहां से यात्रा प्रारंभ करती है एक निर्धारित काल के पश्चात् वह उसी स्थान पर पहुंचती है तथा एक क्षण भी व्यर्थ किये बिना वह अगली यात्रा प्रारंभ कर देती है। सृष्टि के निर्माण से अब तक समय रुका नहीं है और वह निरंतर गतिमान है। अपने साथ असंख्य परिवर्तन लिए यह समय असंख्य निर्माण व विनाश  का साक्षी है।
मेरे पूर्वजों ने जो अपना समय बताया था या अभी तक का जो जीवन मैंने जिया है  तथा इस संसार का जो रूप देखा है तो पिछले 10 वर्षों में स्वयं ही अपने व आसपास में कई परिवर्तन देखा है। जब उसे सोचता हूं तो जो परिवर्तन हो रहे हैं उसमें तीव्र गति से पीढ़ियों में अन्तर दिख रहा है। रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, विचार, शौक इत्यादि हर क्षेत्रों में।
इन सभी परिवर्तनों के अतिरक्तित जो प्रकृतिक परिवर्तन दिख रहे हैं वे एक बहुत बड़े विनाश  की सूचना देते हुए से प्रतीत हो रहे है। आज समूचा मानव समाज हो रहे जलवायु परिवर्तन व बढ़ रहे    वैश्विक -ताप से भयभीत है। पश्चिमी देशों में तथा कुछ-कुछ भारतीय महानगरों में अब पूर्ण वस्त्र पहनने वालों की तदात घटने लगी है। पुरुष हो या स्त्री वस्त्र पहनने की रुचि लोगों की कम ही दिखाई पड़ रही है।
कहने का तत्पर्य यह है कि समय जहां से प्ररंभ होता है उसी स्थान पर पहुंचता है। पृथ्वी सूर्य से अलग होकर आग के समान थी तो अब तीव्रता से बढ़ रहा वैश्विक-ताप इसे पुनः उसी स्थिति में पहुंचने का द्योतक लग रहा है वहीं वस्त्र विहीन आदिम मानवों की भांति वर्तमान मानव समाज धीरे-धीरे उसी दिशा की ओर अग्रसर हो रहा है। गोल धरती, गोल रह जायेगी किन्तु वह पुनः अपने चरम ताप को प्राप्त  कर लेगी और नंगा मानव अपने पूर्वजों की भांति नंगा हो जायेगा इस सृष्टि से मानव नामक प्राणी का पुनः सर्वनाश  हो जायेगा। यह नग्न  से नंगेपन की यात्रा है। मनुष्य निर्वस्त्र  पैदा हुआ तो उसका विनाश  भी नंगा ही होगा। यही काल की गति है जो गोल है न आदि है न अंत।

प्रेम की नैया



संबन्धों में ‘महत्व’ और ‘विवशता की समझ’दोनों का अपना विशेष स्थान है। एक, व्यक्ति अपने निकटस्थ को जो ‘महत्व’ देता है, यह उसके संबन्ध स्थापन की इच्छा पर निर्भर करता है तथा दूसरा, अपने समीपस्थ की मजबूरी को कितना समझता है तथा दोनों पर  एक-दूसरे की  विश्वसनीयता कितनी है? दो संबन्धियों में ये दोनों गुण हों तो निःसंदेह संबन्ध गोंद चिपकी हुई वस्तु की भांति जन्म-जन्मान्तर तक प्रगाढ़ रहेंगे।
 उदाहरण स्वरूप ‘ब’ और ‘स’ दोनों की मित्रता थी किन्तु न दोनों एक-दूसरे  की विवशता समझते थे न ही एक-दुसरे को कोई विशेष महत्व ही दिया। इसी कारण दोनों का अहंकार बीच में आ गया और परिणामतः दोनों का जीवन मार्ग पृथक हो गया।

  वहीं एक और उदाहरण लें कि ‘प’ और ‘ग’ के बीच मित्रता है। इनमें ‘प’ ‘ग’ को बहुत ही महत्व देता है किन्तु उसकी मजबूरी नहीं समझ पाता। जबकि ‘ग’ ठीक इसके विपरीत है वह ‘प’ की लाचारी तो समझता है किन्तु उसे महत्व नहीं देता। यदि व्यक्ति किसी को स्व से अधिक महत्व देता और सामने वाले से आपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती तो यह बात उसे दुःख पहुंचाती है तथा उसके स्वाभिमान को ठोकर सी प्रतीत होती है  परिणामतः संबन्धों में टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

   ‘प’ के साथ कुछ ऐसा ही है। ‘ग’ को लेकर वह बेहद चिंतित रहता है। वह चाहता है कि मैं जो भी करूं-कहूं ‘ग’ तुरंत उसकी सकारात्मक प्रतिक्रिया दे किन्तु ‘ग’ के लिए ‘प’ तथा उसकी भावनाएं या उसकी गतिविधियां उतनी महत्वपूर्ण नहीं लगतीं। ‘ग’ के लिए ‘प’ की अपेक्षा और भी कई सारी बातें या कार्य अधिक महत्वपूर्ण लगते है अतः वह ‘प’ की ज्यादातर अवहेलना करता रहता है। चूंकि  ‘ग’ ‘प’ की मजबूरी समझता है अतः उसे ‘प’ से कोई समस्या नहीं होती किन्तु ‘प’ के लिए ‘ग’ द्वारा अवहेलित किया जाना संसार की सबसे बड़ी घटना लगती है इसलिए वह ‘ग’ से सदैव असंतुष्ट रहता है।

यहीं ठीक एक उदाहरण ‘क’ और ‘ल’ का है। दोनों एक-दूसरे को स्वयं से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं  तथा एक-दूसरे की विवशताओं को भी समझते हैं। यही कारण है कि दोनों के संबन्धों में कभी खटास नहीं आई।  दूर-दूर रहकर भी दोनों प्रसन्न रहते हैं। दोनों का एक-दूसरे पर अटल विश्वास है।
   इन्हीं तीनों उदाहरणों से यह प्रमाणित तो हो ही रहा है कि ‘महत्व’ और ‘विवशता’ का संबन्ध में कितना योगदान है। इन दोनों  के आलावा दो और महत्वपूर्ण भाव हैं 'विश्वास' तथा  ‘अहंकार’। इनमें जहां ‘विश्वास’ संबन्ध को प्रगाढ़ता की ओर प्रशस्त करता है वहीं ‘अंहकार’ विच्छेद करने के लिए आग में घी का काम करता है।
‘ब’,‘स’ और ‘प’ के साथ समस्या यह है कि वे अपने संबन्धी से अधिक विशिष्टता ‘अहंकार’ को देने लगते हैं जिससे उनके संबन्धों में सदैव जटिलता बनी रहती है। वहीं ‘ग’, ‘क’ और ‘ल’ विश्वास की विशिष्टता के बल पर गहरे व अटूट संबन्ध स्थापित कर पाते हैं।
  इन तीन प्रकार के संबन्धों में दूसरे संबन्धी ‘प’ और ‘ग’ के संबन्ध ‘क’ और ‘ल’ के श्रेणी तक आसानी से पंहुच सकते हैं किन्तु इसके लिए दोनों को अपनी भावनाओं को एक-एक चरण आगे बढाना होगा। सहृदीय संबन्ध तभी बनेंगे जब ‘महत्व’, ‘विवशता की समझ’ तथा ‘विश्वास’ के पराग पड़ेंगे क्योंकि, "प्रेम की नैया राम के नहीं विश्वास के भरोसे तैरती है"।