कभी माँ नहीं बन पातीं;
वे सदैव माँ ही रह जाती हैं—
मात्र अपने बेटे की।
कई बार तो वे
नहीं बन पातीं दादी
अपनी पोती की भी,
और रह जाती हैं
केवल अपने पोते की दादी।
सदियों की परम्पराओं
की रस्सियों से बँधी,
ससुराल-रूपी कारागार में बन्द,
समाज के आदेशों का
यन्त्रवत् पालन करती हुई,
वे अपनी स्वतन्त्रता को
भूल चुकी होती हैं।
अपने साथ हुए
व्यवहारों को ही
विधि का विधान मानकर,
घूँघट तले घुटती हुई,
वे घोंट डालती हैं
गला अपनी बहुओं की
स्वतन्त्रता का भी।
और फिर—
बहू एक दिन सास बन जाती है।
वह भी अपनी
नवीन बहू को
स्वतन्त्रता नहीं दे पाती;
क्योंकि वह त्याग नहीं पाती
सास होने का मोह
और ससुराल में
वर्षों संघर्षों के पश्चात् प्राप्त
अपनी सत्ता का आकर्षण।
यह क्रम
पीढ़ी-दर-पीढ़ी
निरन्तर चलता ही आ रहा है।
न जाने—
कोई बहू,
स्वयं सास बनने के उपरान्त,
रोकना भी चाहेगी क्या,
इस परम्परा को?

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