शब्द समर
विशेषाधिकार
भारतीय दंड संहिता के कॉपी राईट एक्ट (1957) के अंतर्गत सर्वाधिकार रचनाकार के पास सुरक्षित है|
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24.8.19
तारीख़ों की दस्तक
मैं देता रहूँगा दस्तक तुम्हारी यादों के दरवाज़ों पर,
जब कभी तुम मशगुल हो जाओगे
ज़िन्दगी के कमरे अपनी मशरूफ़ियत के साथ|
तुम झट से उठ बैठोगे ,
बनाओगे मन कि "खोल दूँ दरवाज़ा,
भर लूँ आगोश में तारीख़ों को,"
लेकिन हक़ीक़त की बेड़ियाँ तुम्हें जकड़ लेंगी|
तुम फिर
घुल जाओगे
कमरे की सीलन में|
और मैं,
थोड़ी और देर थपथपा के किवाड़,
लौट जाऊँगा कुछ पलों के लिए|
तुम आँखों में बेबसी का पानी रोके,
फिर मशरूफ़ हो जाओगे,
मेरे वापस आने तक|
14.1.19
एक नया गीत
एक नया गीत गाएँगे हम आज मिलकर
क़दम अब मिलाएँगे हम आज मिलकर
नया गीत गाएँगे हम आज मिलकर
न छल न कपट न मुसीबत की चालें
न तलवार तमंचे न लाठी न भाले
मोहब्बत बहाएँगे हम आज मिलकर
जो छूटे हुए हैं उन्हें हम पुकारें
जो रूठे हुए हैं उन्हें हम दुलारें
कि बाहें फैलाएँगे हम आज मिलकर
नहीं भीख माँगें अब हम किसी से
नहीं रोते भागें अब हम किसी से
हकें छीन लाएँगे हम आज मिलकर
नहीं अब गुलामी करेंगे किसी की
नहीं रोटियों में पलेंगे किसी की
कि पंख सँवारेंगे हम आज मिलकर
न पीड़ा न आँसू नहीं दुश्मनी हो
न बाहें किसी की लहू से सनी हों
ख़ुशी में नहाएँगे हम आज मिलकर।
18.12.18
बगदरा-सिंगरौली का अन्तिम छोर
मैं अन्तिम छोर
हूँ,
जहाँ पानी भी
अपनी आख़िरी बूँद
के साथ ही पहुँच पाता है।
अन्तिम वह स्थान
होता है,
जहाँ प्रारम्भ
चाह कर भी नहीं पहुँच पाता,
और पहुँचता भी है,
तो चुका हुआ।
अन्तिम तक
पहुँचते-पहुँचते
मध्य भी थक ही
जाता है,
और तक जब पहुँचता
है
स्वयं ही अन्त हो
जाता है।
मुझ तक पहुँचने
वाली
सरकारें भी,
साहब-दर-साहब
बिखरी हुई आती हैं,
और साहब तो अक्सर
रीते हुए ही होते हैं।
हमें देने की
बजाय,
उल्टा हमें ही
देने पड़ जाते हैं।
मैं अन्तिम छोर
हूँ,
मेरी आवाज़
मुझमें ही घुट
रही है,
मुझमें ही मर रही
है।
प्रारम्भ ने अपनी
दीवारों पर
सफेदी पोत दी है,
मेरे अँधेरे को
दुनिया की नज़रों
से छुपा दिया है,
और अब वह
विश्वगुरु बन चुका है।
यह अलग बात है कि
उसके अन्तिम छोर
ने आज तक
सूर्य नहीं देखा।
मैं हूँ यहाँ
मैं हूँ यहाँ
कि देखना चाहता
हूँ मुस्कुराहट,
उन चेहरों पर भी,
जिन्हें ख़ुद से
मुस्कुराने के लिए
बचपन से ही उठाना
पड़ता है,
मैला, बोतलें, बोरियाँ, बेलन, बच्चे और थालियाँ।
जो होते हैं अनाम,
और बन जाते हैं
छोटू, लड़के और छोकरी।
मैं हूँ यहाँ
कि दिला सकूँ
उन्हें
किताबें, बल्ले-गेंद और खिलौने।
मैं हूँ यहाँ
कि बिखेर सकूँ
हँसी कपोलों पर।
मैं चिन्दियों
में बिखरी खुशी को
पूरा पैरहन देना
चाहता हूँ।
23.8.18
अंतिम इच्छा
उसका आगमन है अटल,
तो आएगी ही।
आलिंगित कर मुझे
भर लेगी मेरी
श्वासों के भीतर अपने।
मेरे स्पन्दनों
पर कर एकाधिकार,
रक्त-शिराओं में
बना डालेगी बाँध भी।
नेत्रों को कर
निमीलित,
हरेगी ज्योति,
और पूर्ण निःशक्त
कर,
कर देगी भू-शायी
मुझे।
वह है तो अतिथि,
परन्तु आती ही है,
है यह निश्चित ही,
क्योंकि वह
मृत्यु है।
हे भविष्य मेरे!
मैं नहीं चाहता,
मेरे शव का जीवन
हो अत्यल्प।
बने घातक
वन्य-काष्ठ,
या जल-विद्युत के
लिए,
और
सिन्दूरी-पीली,
आड़ी-टेढ़ी रेखाओं
के मध्य बचे राख मात्र,
कुछ ही क्षण
तमतमा कर।
मैं तनिक भी नहीं
इच्छुक
कि मेरे
जीवनोपरान्त
मनोरंजन हो
अघाए-जनों के लघु-दीर्घाहार का,
और परिजनों पर आए
बोझ बलात रीतिपालन का।
है मेरी प्रबल
लालसा यह
कि
दिया जाऊँ फेंक
किसी निर्जन-कानन में,
जहाँ न हो
मानव-रेख भी,
और जिए मेरा
पार्थिव,
मृत-जीवन भी कुछ
दिवस।
मैं चाहूँगा,
करना आमंत्रित
श्वान-शृगालों,
कीट-कागों, गृद्ध-ब्यालों को।
मिले उन्हें भी
प्रेम मेरा,
जो चलती देह को
छू भी नहीं पाते।
उनका उदराहार बन,
मैं करूँ तृप्त
क्षुधा उनकी।
कथित
वीभत्स-ज्ञानी
एवं नरभक्षी
मनु-सन्ततियों
के शोषण से कहीं
श्रेष्ठ है,
अज्ञानी एवं मूक
प्रकृति-जन्यो के मध्य,
मिट्टी का मिट्टी
हो जाना।
तुमने उठाया माँ! बहुत भार मेरा...
तुमने उठाया माँ!
बहुत भार मेरा।
सहा इतना,
जो था बहुत ही
अनसहा।
पिये वो घूँट
व्यथा के,
जो ज़हर से भी थे
अधिक विषैले।
जेठ की ज्वाला,
ठिठुरन माघ की,
उबड़-खाबड़ रास्ते,
चाही-अनचाही
ज़िन्दगी,
रक्तीले आँसू,
दर्दीला बदन,
और एक अनदेखी
मंज़िल-
'मैं'
जिसपर उठते ही
आये क़दम तुम्हारे।
एक-दो दिन,
या प्रहर नहीं,
बल्कि दिन-ब-दिन
महीना-दर-महीना,
साल-दर-साल,
यह सिलसिला चलता
ही आ रहा
आज तक।
तुमने सुनी उनकी
भी,
जो कहीं कमतर थे
तुमसे।
तुमने सहन किया
उन्हें भी,
जो थे बस
तुम्हारी एक फूँक के बराबर।
तुमने उनकी भी
मार खाईं,
जो तुम्हारी
अँगुली की प्रहार से भी
तिलमिला उठते।
पर तुमने पी लिया
इन सारे विषों को,
शिव बनकर।
वह जो तुम्हारे
गले में नीला रंग है न माँ
मैं जानती हूँ,
यह कुदरती नहीं।
तुम्हारे गाल पर
जो लकीरें हैं,
ये कोई श्रृंगार
नहीं है तुम्हारा।
मैं जानती हूँ
माँ
कि दुश्मन की लाश
से भी
बदतर तरीके से
घसीटी गई हो तुम।
मैं जानती हूँ यह
सब
कि
कोख में मेरी
रक्षा करने का
दण्ड मिला है
तुम्हें।
तुम जो चाहती थी
ख़ुद बनना,
तुम चाहती थी
जैसा जीना,
वह न हो सका कभी,
क्योंकि मूँछों
और नाक ने तुम्हें
बन्दी कर दिया
परम्पराओं की जेल में।
तुम्हारी क़लम
बेलन,
कॉपी चकला बन गई।
खेल
पति के बिस्तर से
लेकर
गृहस्थी की चाकरी
बन गए।
माँ तुमने वास्तव
में जीवन
नहीं नर्क जिया
है।
तुम्हें लोगों ने
मारा,
और तुमने अपने
सपनों को।
कितनी हत्याएँ
हुई हैं न माँ?
कितनी भावनाओं की
लाश उतरा रही है न
तुम्हारे मन के
कुएँ में?
पर माँ! अब ऐसा
नहीं होगा,
मैं ऐसा होने ही
न दूँगी माँ।
लो पकड़ो तुम भी
यह क़लम माँ
और लिख डालो अपनी
तक़दीर।
अभी तक माँ
देती थी अक्षर
ज्ञान बेटियों को,
आज एक बेटी करती
है प्रण
करने को शिक्षित
अपनी माँ को।
ताकि उसकी माँ को
फिर न पीना पड़े
वही कालकूट,
जिसे वह बचपन से
पीती आई है।
तुम पढ़ोगी माँ,
तुम बढ़ोगी माँ,
तुम लडोगी माँ,
तुम जियोगी माँ।
तुम अपनी ज़िन्दगी
जियोगी
अपने पसन्द की
अपने सपनों की
ज़िन्दगी।
13.4.18
खोखली मानवता
मैं कहीं धँसता जा रहा हूँ
एक अतल गहराई में|
किसी ऐसी खोह में
जहाँ मेरी ही चीख़ें
मेरे कानों को फाड़ रही हैं|
आँखों के सामने एक गहरा सन्नाटा है,
ऐसी ख़ामोशी जो
निर्वात की तरह भीतर तक पसरती जा रही है|
ज़बान बोलती है,
तो शब्दों में खोखलापन दिखाई देता है|
मैं एक निहीर मूक प्राणी-सा लगने लगा हूँ,
जिसका कभी-भी-कोई-भी शिकार कर सकता है|
मन यह मानने को तैयार नहीं
पर दिल धड़क-धड़क कर
झकझोर रहा है मुझे,
बार-बार अपनी तीव्र गति से
समझा रहा है
सुनों!
तुम्हें समझना होगा,
स्वीकारना होगा,
अपने गले तक यह बात उतारनी होगी
कि तुम
पशुओं नहीं,
मनुष्यों के बीच रहते हो,
जहाँ कोई सुरक्षित नहीं है,
कोई भी मतलब,
कोई भी|
अपना खून भी नहीं
अपना निजी खून भी|
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