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26.9.26

क्या मर रही है मानवता मेरी...?

किसी लड़की का बलात्कार हुआ,
किसी के साथ छेड़छाड़ हुई;
किसी की हुई नृशंस हत्या,
कहीं चोरी हुई, कहीं लूट,
कहीं डकैती हुई।

कहीं पति ने
पत्नी का हर लिया जीवन ही,
तो कहीं पत्नी ने ही
पति को उतार दिया मृत्यु के घाट।

कहीं सन्तानों ने निकाल दिया
अपने ही माता-पिता को घर से,
तो कहीं माता-पिता ने ही
घोंट दिया गला
अपने ही नवजात शिशु का।

ये सारे वृत्तान्त
घूमते रहते हैं,
गूँजते रहते हैं
दिन-प्रतिदिन
आँखों और कानों में-
पत्र-पत्रिकाओं,
दूरदर्शन, आकाशवाणी
और सामाजिक संजालों के माध्यम से।

परन्तु न तो मेरे मस्तिष्क में
होती है हलचल कोई,
न ही हृदय में उठती है
कोई ज्वाला,
देख-सुनकर
इन दुर्दान्त घटनाओं को।
और कई बार तो
अनसुना या अनदेखा कर दिया मैंने
इन भीषण वृत्तान्तों को-
मानो घटा ही न हो कुछ,
और न हो मेरी अपनी पीड़ा ये।
 
बीते कितने ही दिन,
कितने मास,
कितने वर्ष हो गए;
पर मेरे हृदय में
एक कम्पन तक न हुई,
न ही उठी तनिक सिहरन भी
इन हृदयविदारक आघातों से।

बैठा हूँ सोचता-
आखिर क्यों हुआ होगा ऐसा?
क्या मैं ही हो चुका हूँ
हृदयहीन?
या मर चुके हैं
करुणा के वे भाव
जो कभी मेरे हृदय में जीवित थे?
क्या बैठ गया है
कोई भय मेरे भीतर भी?
या फिर पड़ता ही नहीं
मुझ पर कोई अन्तर?

क्या प्राप्त कर चुका हूँ मैं
उस स्थिति को,
जिसे कहते हैं-
स्थितप्रज्ञता,
जहाँ मनुष्य
सुख-दुःख से परे हो जाता है? 

या फिर निरन्तर मिलते रहे
इन आघातों से
इतना भर चुका है हृदय,
कि अब किसी पीड़ा के लिए
उसमें स्थान ही शेष नहीं?

या बन चुकी है
मेरी प्रवृत्ति ही ऐसी-
इन घटनाओं को सुनना,
कुछ क्षण ठहरना,
और फिर
उन्हें उपेक्षित कर देना?

भाव जो भी हों,
कारण जो भी हो-
पर ये भाव
मानवता के तो नहीं हैं;
और न ही
देशहित में हैं।

यदि इन निर्दयी,
इन भयावह वृत्तान्तों से
नहीं पिघलता हृदय मेरा,
यदि किसी पीड़ा का
नहीं होता तनिक भी आभास,
यदि किसी करुण क्रन्दन से
नहीं काँपती आत्मा मेरी-
तो निश्चय ही
मर रहा हूँ मैं,
और मेरे साथ-साथ
मर रही है मानवता मेरी।

मेरा न सुनना,
न बोलना,
न लिखना,
न किसी को बताना,
इन घटनाओं को
अपने भीतर ही दबा जाना-
चलती हुई साँसों के साथ
एक मृत देह को
ढोने के अतिरिक्त
और कुछ नहीं है।

क्योंकि मनुष्य होना
मात्र साँस लेना नहीं,
पीड़ा को अनुभव करना भी है;
अन्याय को देखकर
अन्तरात्मा का काँप उठना भी है;
और जहाँ आवश्यक हो,
वहाँ बोल उठना भी है। 
जिस हृदय में
करुणा नहीं,
जिस वाणी में
प्रतिरोध नहीं,
जिस चेतना में
मानवता नहीं-
वह हृदय,
वह वाणी,
वह चेतना
जीवित होकर भी
मृत ही है।

और तब प्रश्न यह नहीं होगा
कि संसार में
इतनी निर्दयता क्यों है-
प्रश्न यह होगा कि
उस निर्दयता को देखकर
मैं स्वयं
इतना सम्वेदनहीन क्यों हो गया हूँ?
कहीं ऐसा तो नहीं
कि दूसरों की मृत्यु की
बार-बार आती इन वार्ताओं के बीच
चुपचाप,
बिना किसी आहट के,
शनैः-शनैः
मर रही है मानवता मेरी।

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