शब्द समर

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21.11.17

जो आग तेरे दिल में सुलगी

जो आग तेरे दिल में सुलगी,
उस आग को अब जल जाने दे
अरमानों की इस भट्ठी में,
एक चिंगारी पल जाने दे

तेरी हर चाहत की लकड़ी में,
ख्वाबों की लाशें सोई हैं
कर बन्द हवा को मुट्ठी में,
इसे बुझने का बल जाने दे
एक चिंगारी पल जाने दे

बे-मौत तेरे हर सपने को,
मरना ही लिखा है कुदरत ने
ले छीन खुदाया से अपनी,
तकदीर को अब खुल जाने दे
एक चिंगारी पल जाने दे

तमन्नाओं का हर एक धुआँ,
ढूँढेगा आसमाँ में ख़ुद को
तू खोल दिशाओं की राहें,
इसे अपने मन चल जाने दे
एक चिंगारी पल जाने दे

हर आँसू अपनी आँखों का,
जलता है बनकर तेल यहाँ
फानूस बन महफूज़ कर,
बन रूई उसे जल जाने दे.
एक चिंगारी पल जाने दे

19.11.17

बचपन

चित्र-साभार-गूगल 
बचपन,
एक बिखरी हुई,
लेकिन सिमटी ज़िन्दगी,
जिसे नहीं है चिन्ता,
उड़ने की,
न ही है परवाह,
गिर जाने की।

हर मंज़रों में
बे-ख़ौफ़ मैराथन करने वाले खिलाड़ी,
जिसे न जीतने का गुमान है,
न हार जाने का शोक,
इसी के रास्ते में मिलते हैं।

बचपन
एक ऐसा खेल का मैदान,
जिसमें मदमस्त हाथी,
चंचल हिरण,
खूँखार बाघ,
चालक लोमड़ी,
निरीह मेमना,
सब एक साथ मिल जाते हैं,
उछलते-कूदते।

बचपन,
एक ऐसा आँगन,
जिसमें चन्दा को पाने की ज़िद,
ख़ुद में खो जाने की प्रवृत्ति,
सब कुछ लुटा देने का हुनर,
सूरज को ललकारने की ताक़त
एक ही देहली पर होते हैं,
विराजमान।

आओ घूम आएँ
एक बार, उसी दुनिया में,
जिसे अब हम जी नहीं सकते,
बस तरस सकते हैं,
भरते हुए एक आह,
और यही सोचते रहेते हैं,
काश! समय का पहिया एक बार उल्टा घूम जाता।

16.11.17

बुढ़ापे का साथी

कवि जब लिखता है,
तो शब्द अपने आप बँटवारा कर लेते हैं|
कोई अपने हिस्से चुनता है सुकूँ,
तो कोई बेचैनी को ही रख लेता है|
कोई खुशियों को छुपा लेना चाहता है,
अपनी तिजोरी में,
तो कोई छलक पड़ता है बनके दर्द|

दर्द!
दर्द, सबसे छोटा,
और सबसे कम उम्र का होता है,
जो लेता है जिम्मा
कवि के अन्तिम समय तक साथ रहने का|
माँ-बाप के साथ भी दर्द ही रह जाता है,
उनके अन्तिम समय तक
साथ देने को|

15.11.17

सो गया वह

चित्र-साभार-गूगल 
सो गया वह,
आँखों में जीते हुए एक सपना,
जो रेगिस्तान की तरह था चमकीला
किन्तु
नहीं ला सका मुस्कुराहट
उसके होंठों पर|

सो गया वह,
एक ऐसी गाँठ को सुलझाते हुए,
जो उसकी ज़िन्दगी से भी थी अधिक मजबूत,
और बन गई फन्दा छटक कर उसके हाथों से|

सो गया वह,
एक ऐसी दरार में
जो उसकी ख्वाहिशों से भी थी अधिक गहरी,
जिसमें समा गया वह
अपनी पत्नी और बेटी की उमंगों की लाश लेकर|

सो गया वह,
ऐसे समन्दर में
जहाँ
मछलियाँ ही थीं, मछलियों की दुश्मन,
जैसे आदमी है आदमी के ही खून का प्यासा|

सो गया वह,
बिना तकिया,
बिना बिस्तर
बिना कन्धा
बस पेट में बाँध के गमछा,
डरते हुए समाज से,
लड़ते हुए भूख से|

सो गया वह,
फँस कर असीम इच्छाओं के भँवरजाल
और न जगने वाली नींद के आगोश में
सो गया वह,

न आने वाले कभी होश में|

14.11.17

तुम्हारी अलिखित अमिट कहानी मैं

चित्र-साभार-गूगल 
जब तुम लिख रहे थे स्वयं को,
बुन रहे थे ताना-बाना अपने जीवन का,
कर रहे थे सुखमय वर्णन अपनी जीवन-यात्राओं का|

ठीक उसी समय
तुमने किया होगा स्मरण मुझे भी,
मेरा चित्र बार-बार मूँद देता होगा 
नेत्र तुम्हारे|
मैं आई होऊँगी तुम्हारे मन के द्वारा पर,
खटखटाया भी होगा किवाड़ को थाप दे-देकर|

तब
तुम हुए होगे हिंसक,
किया होगा प्रहार अपनी स्मृतियों पर,
चलाया होगा घातक अस्त्र मेरी सह-अनुभूतियों पर,
की होगी नृशंस हत्या मेरे साथ के समय की,
और फिर
तुम अपने लेखन में
स्वयं अकेले ही दिखने लगे होगे,
प्रत्येक स्थान पर,
जबकि
तुम्हें है पता
तुम्हारे हर उस समय की सहवासी हूँ मैं|

जिस जीवन को आज तुमने उकेरा है इन पन्नों पर,
ये पन्ने तुम्हें चिढ़ाते भी होंगे,
परन्तु अब तो तुम निर्लज्ज बन चुके हो,
तुम्हें नहीं पड़ता होगा अन्तर कोई,
किन्तु ध्यान रखना,
मैं भले ही तुमसे हो चुकी हूँ दूर भौतिक रूप से,
पर तुम्हारा मन चाहकर भी
कभी भी मुझे तुमसे विलग न होने देगा,
क्योंकि जब भी तुम अपने जीवन के इन पन्नों को पलटोगे,
सबसे पहले मेरा ही मुख दिखेगा,
प्रत्येक शब्दों में|

मेरा नाम लिखने की आवश्यकता भी नहीं,
क्योंकि
तुम मुझसे विच्छिन्न हुए हो,
अपने जीवन से नहीं,
मेरा नाम तुम्हारे जीवन के साथ ही जुड़ा हुआ है,
तनिक एक बार स्वयं का नाम लो,
उसके बाद मेरा नाम स्वयमेव ही बोल दोगे|
भले ही मुझे छलकर
तुम हो गये परे मुझसे,
चुन लिया नया पथिक साथी
परन्तु
मैं तुम्हारे जीवन-यात्रा की
अलिखित, अमिट कहानी हूँ|  

6.11.17

नीरो अभी भी जीवित है

मिट्टी के घरौंदे में,
कपास की देह पहने,
तेल जैसे विषाक्त हवा को अवशोषित कर,
लपटें ऐसे किरणें फैलाती हैं,
जैसे वृक्ष कोई प्राणवायु।
जितना ही भरता जाता है तेल,
उतना ही,
रोम-रोम जलता है दीया,
रोम की तरह।
मनुष्य नाचता है, गाता है,
करता है सहस्रों कर्म,
और बजाता रहता है बंशी,
इसी के प्रकाश में।

सम्भवतः नीरो अभी भी जीवित है।

10.10.17

रेगिस्तानी पलकें

दुःख में हर बार मूँद लेता है वह,
अपनी पलकें|
जब भरने लगती हैं आँखें,
तो सूख जाता है उसका पानी|
बहुत तपाया है ज़िन्दगी की धूप ने उसे|
अब उसकी आँखों में समन्दर नहीं,
रेगिस्तान बसता है|