शब्द समर

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18.8.13

कलमकार

भरे ज्योति से नयन, और ह्रदय मगन,
बढे आपके चरण, अब जीवन संधान में.
बने में आप कीर्तिमान, जग गाये यशगान,
आपके कार्य हों महान, और नाम हो जहान में.
कि नहीं झुके ये क़लम, जब तक लहू में दम,
भरें शब्दों में वो दम, जान फूंके जो पाषाण में.
त्याग अहंकार, सुन युग की पुकार,
'
विद्यार्थी' जुट जाएँ सब राष्ट्र निर्माण में

6.8.13

एक सफ़र में रेखा शेखावत के लिए..........

अभी एक सप्ताह पूर्व मैं एक यात्रा पर था. मैं जिस ट्रेन में बैठा था उसी में मेरे सामने एक लड़की भी बैठी थी. उसे मैंने जितनी बार भी उसके अधरों पर एक मुस्कुराहट तैरती हुई मिली अतः मेरा कवि मन चंचल हो उठा और उसने उसकी मुस्कुराहट को कुछ यूँ व्यक्त किया...

वह बहुत मुस्कुरा रही है
एक असमंजस मुझमें आ रही है
या तो हसींन कोई ख़्वाब बना रही है
या टूटा कोई ख़्वाब भुला रही है
वह बहुत मुस्कुरा रही है

हिलते हुए होठों और झपकती हुई पलकों से 
दो रहस्य जता रही हैं
या तो प्रियतम को पा रही है
या उस पल को पछता रही है
वह बहुत मुस्कुरा रही है

कभी क़ुदरत को अपलक निहारती
कभी मृगनयन मुझ पर डालती
दो बातें मुझको बता रही है
या वादियों संग गा रही है
या अश्क़ों को तड़पा रही है
वह बहुत मुस्कुरा रही है

बादलों सी सूरत वाली
राजपूताना की एक राजकुमारी
या बिना बोले ही कुछ बता रही है
या होठों के भीतर कोई गहरा राज़ छुपा रही है
वह बहुत मुस्कुरा रही है...

इसके बाद उसे पढ़ाया भी. वह प्रसन्न हो गई और अगले दिन की सुबह जब तक वह उतर नहीं गई तब तक मुस्कुराती रही. शायद अभी भी मुस्कुरा ही रही हो...


मौन प्रेम


प्रेम बीज उसके भी मन में
भाव वही मेरे अंतर में

मेरे लिए स्वप्न हैं उसके
वह भी बसी मेरे उर घर में

नयनों से तो बोल चुकी वह
मैंने भी कह दिया नज़र में

उसके बोल न फूटे अब तक
अधर सिले मेरे भीतर में

लज्जा-भय की लुका-छुपी है
दोनों लटके अभी अधर में

दोनों प्रेम पिपासे हृद के
लड्डू फूट रहे अंतर में.

26.6.13

चलो चलो रे चलो रे



आएं उत्तर की हवाएं, दक्षिण को ले जाएं
छाएँ पूरब में घटाएं, जाके पश्चिम में बरसाएं
सभी दिशाओं से आकर, बस एक ही गीत हम गाएं
चलो चलो रे चलो रे, चलो चलो रे चलो रे

सूरज आया निकल क्षितिज से, फिर तुम क्यों हो सोए
महाबली हो तुम बलशाली, किस्मत पर क्यों रोए
देखो अपनी भुजाएं, चाहो जैसा कर जाएं
फ़ौलादों की शाखाएं, ये चाहें सागर लंघ जाएं.
सभी दिशाओं से मिलकर, बस एक ही गीत हम गाएं
चलो चलो रे चलो रे, चलो चलो रे चलो रे

एक धरा है, एक गगन है, एक हमारी मंज़िल
एक आदम की औलादें, हौव्वा के हैं हम दिल
छोडो जाति की प्रथाएं, ये तो हैं विपदाएं
दूरी अपनी सब मिटाएं मानवता को धर्म बनाएं
सभी दिशाओं से मिलकर, बस एक ही गीत हम गाएं
चलो चलो रे चलो रे, चलो चलो रे चलो रे

तुम चाहो तो खलिहानों में भागीरथी आ जाए
तुम चाहो तो बंजर धरती सोने से लद जाए
छोडो आलस की अदाएं, समझो अपनी तुम क्षमताएं
तुमसे देश को आशाएं, चलो सागर को मथ आएं
सभी दिशाओं से मिलकर, बस एक ही गीत हम गाएं
चलो चलो रे चलो रे, चलो चलो रे चलो रे

14.6.13

अलसाया सूरज

आज सूरज भी अलसाया है.
और आँखे खोयी हुई हैं एक हसीन दुनिया में.
मदहोश चांदनी लिपटी हुई है बदन से.
और पूरे समय जगाये 
रखा अपने घर में .

पोर-पोर में जकड़न है,
और अंगड़ाई है युगल भुजंगिनी सी .
एक सितारी छुअन है
और झंकृत है आपादमस्तक देह.
परिंदों को आज दानें की फ़िक्र नहीं है.
उनकी दुनिया आज इसी घोसले में ही सिमटी है.
वक़्त थम गया है
क्योंकि आज सूरज अलसाया है

7.6.13

अतिरिक्त आदमी

दादा थे तब लाठी, दीदी हैं तब भी लाठी.
खादी थी तब भी लाठी, खाकी है तब भी लाठी.
पीठ थी तब भी लाठी, पेट है तब भी लाठी.
राज था तब भी लाठी, लोक है तब भी लाठी.
गोरे थे तब भी लाठी, काले हैं तब भी लाठी.
दाढ़ी थी तब भी लाठी, मूंछे हैं तब भी लाठी.
छोटे थे तब भी लाठी, बड़े हैं तब भी लाठी.
बाँझ थी तब भी लाठी, गर्भ है तब भी लाठी.
अंगूठा था तब भी लाठी, कलम मिली है तब भी लाठी.
गूंगा था तब भी लाठी, बोल फूटे तब भी लाठी.
अँधा था तब भी लाठी, दीख रहा है तब भी लाठी.
भूखा था तब भी लाठी, खाने लगा तब भी लाठी.
निःशक्त था तब भी लाठी, सशक्त हुआ तब भी लाठी.
निर्वस्त्र था तब भी लाठी, सवस्त्र हूँ तब भी लाठी.
आस्तिक था तब भी लाठी, नास्तिक हूँ तब भी लाठी.
घूंघट में थी तब भी लाठी, बाहर निकली तब भी लाठी.
पवित्र थी तब भी लाठी, लूट ली गई तब भी लाठी.
घर में सोया तब भी लाठी, पगडण्डी पर हूँ तब भी लाठी.
लाठी, लाठी, लाठी, लाठी,
सर से लेकर पाँव तक मुझको अब मिलती है लाठी.
दिन में लाठी, रात में लाठी, सुबह में लाठी, सांझ को लाठी,
बूढ़े-बच्चे, त्रिया-जवान सबको बस मिलती है लाठी.
जन्म में लाठी, जीवन में लाठी,
अब मेरा शव निकलेगा लगता है केवल खाकर लाठी.
लाठी, लाठी, लाठी, लाठी,
लाठी, लाठी, लाठी, लाठी.
मैं अन्य पुरुष हूँ, अतिरिक्त आदमी
जो नहीं है गिनती में
न मारने वाले की न खाने वाले की
कि कितनी मैंने खाई लाठी.
बस यही जाना मैंने कि बरस रही हैं
मुझ पर
लाठी दर लाठी,
लाठी दर लाठी.

30.5.13

आइडिया पैदा करो

पैदा करो, पैदा करो, पैदा करो,


आइडिया पैदा करो

तुम पैदा हुए हो इसलिए पैदा करो
तुम पैदा किये गये हो इसलिए पैदा करो
तुम जीना चाहते हो इसलिए पैदा करो
दूसरों का मुंह सीना चाहते हो इसलिए पैदा करो
अपने पैदाइश पर कुछ खटपटिया पैदा करो
आइडिया पैदा करो

पैदा कुत्ता भी हुआ है
पैदा कुकुरमुत्ता भी हुआ है
पैदा बन्दर भी हुआ है
पैदा सिकंदर भी हुआ है
तुम दो पैरों वाले जानवर
ग़ैरों में अपनी अलग दुनिया पैदा करो
आइडिया पैदा करो

खेत से पैदा हुआ अन्न खाते हो
ट्यूबवेल का पानी डकारते हो
पत्थर से पैदा हुआ सोना पहनते हो
शांत वातावरण में टहलते हो
कुछ नहीं कर सकते नाकारों
तो सोने के लिए एक खटिया पैदा करो
आइडिया पैदा करो

तुम्हारे पूर्वजों ने पैदा किया है आग
तभी तुम पैदा कर पाते हो रोटी
किसी ने पैदा किया हथियार
तभी काट पाते हो किसी को बोटी-बोटी
अपना ही पेट भरने के लिए
चाहे भजिया पैदा करो
पर आइडिया पैदा करो

ओर्विल ने जहाज पैदा करके
तुम्हें आसमान तक पहुँचाया
ग्राहमवेल ने पैदा करके टेलीफोन
धरती का दोनों छोर मिलाया
आर्यभट्ट ने पैदा किया है शून्य
तुम विचारशून्य एक संख्या ही पैदा करो
पर आइडिया पैदा करो

तुम लेटते थे ज़मीन पर
किसी ने गद्दा पैदा किया
किसी ने समाजोपयोगी
तो किसी ने भद्दा पैदा किया
तुम कुछ नहीं कर सकते तो
कुछ घटिया पैदा करो
पर आइडिया पैदा करो

पैदा हुआ है वह भी
जो फुटपाथ पर सोता है
पैदा हुआ है वह भी
वातानुकूलित भवनों में भी रोता है
आज तुम अपने दिमाग से
एक लखपतिया पैदा करो
एक आइडिया पैदा करो.