शब्द समर

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14.11.25

हम भारत के लोग : आवाज़ उनकी, ज़िम्मेदारी हमारी

आप सभी मंचासीन प्रबुद्ध जनों को प्रणाम करने के उपरान्त यह कहना चाहता हूँ कि मैं यहाँ पीरामल फाउंडेशन, शासन–प्रशासन या किसी भी संस्था का प्रतिनिधि बनकर नहीं आया हूँ। मैं आया हूँ इस देश का नागरिक बनकर—उस मिट्टी का बेटा बनकर, जहाँ आज भी अनगिनत बच्चे गाय–भैंस–बकरी चराते हुए अपना बचपन खो देते हैं; जहाँ छोटी-सी उम्र में होटल, टेंट और दुकानों में काम करते हाथ शोषण और कुपोषण से काँपते दिखाई देते हैं; जहाँ किशोरियाँ, महिलाएँ, युवा और युवतियाँ गरीबी, रक्ताल्पता, भेदभाव, लाचारी और उपेक्षा के अँधेरों से हर दिन जूझती हैं।

मैं उन्हीं की ओर से आया हूँ—उनकी पीड़ा, उनकी खामोशियों और उनके अनकहे सन्देश को अपने साथ लेकर। वे सिर्फ़ कह नहीं रहे—वे चीत्कार रहे हैं, बिलख रहे हैं, गिड़गिड़ा रहे हैं। सूखे हुए चेहरे और भूखी आँतें पुकार रही हैं—“आओ… देखो… सुनो हमें।”

“हम भारत के लोग—भूख, प्यास, गरीबी और असमानता की करवटों में तड़प रहे हैं। हम वही बच्चे हैं, जो कल इस देश का भविष्य सँवारने वाले हैं, पर आज हमारा अपना भाग्य किसी अँधेरी खोह में दबा पड़ा है। जिस उम्र में हमारे हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, उस उम्र में हमारे हाथों में गाय की घण्टी और भैंस की रस्सी पकड़ा दी गई है। जिस उम्र में हमारी अँगुलियाँ कलम थामकर काग़ज़ पर सपने उकेरतीं, उसी उम्र में वे चकला–बेलन घुमा रही हैं या दूसरों के घरों में झाड़ू–पोछा कर रही हैं। जिस उम्र में हमें पौष्टिक भोजन मिलना चाहिए, उस उम्र में हम होटलों की जूठन बटोरकर पेट भरने को मजबूर हैं।”

“इतना ही नहीं, शासन की तमाम योजनाएँ होने के बावजूद भी हम भारत के लोग आज अज्ञानता की उसी गहरी खोह में भटक रहे हैं। काग़ज़ों में पोषण की योजनाएँ चमकती हैं, पर हमारे गाँवों के सादे घरों तक वे योजनाएँ कभी पहुँच ही नहीं पातीं। आँगनबाड़ी के केन्द्र हैं, पर कितनी ही माताएँ आज भी यह नहीं जानतीं कि उनके बच्चे को कब, क्या और कितना खाना चाहिए। जागरूकता की कमी ने हमारे आहार को इतना कमजोर कर दिया है कि हमारे शरीर पर मांस कम, हड्डियों की गिनती ज़्यादा दिखाई देती है। हमारे शरीर में उतना ही मांस है, जितने से हमारा सफ़ेद कंकाल दिखाई न पड़े। कई बच्चों के पेट फूले हुए और शरीर सूखी तीलियों जैसे हैं—यह सिर्फ़ भूख नहीं, यह कुपोषण की चीख है।” 

गाँव की गलियों में घूमते छोटे-छोटे बच्चे जब अपनी पतली टाँगों पर लड़खड़ाते दिखाई देते हैं, तब लगता है जैसे पूरा गाँव उनके साथ लड़खड़ा रहा हो। किशोरियों की स्थिति तो और भी भयावह है—रक्ताल्पता ने जैसे उनके जीवन का रंग ही चूस लिया हो। हर महीने मासिक धर्म के दौरान होने वाली कमजोरी, चक्कर और थकान… पर वे बोलती नहीं, क्योंकि उन्हें लगता है—“कमजोरी तो लड़की होने का ही हिस्सा है।”

अस्पताल हैं, स्वास्थ्य केन्द्र भी हैं, पर दूरी, अज्ञानता और झिझक दीवारें बनकर खड़ी हैं। प्रसव के समय आज भी कई घरों में दाई के भरोसे बच्चे जन्म लेते हैं और कई बार—जच्चा भी चली जाती है, बच्चा भी। आँसुओं से भीगा परिवार उस कमरे के बाहर खड़ा रह जाता है, जहाँ बस कुछ देर पहले एक औरत जीवन देने की कोशिश कर रही थी।

“विद्यालय भी हैं, पर शिक्षा के प्रति जागरूकता नहीं। कक्षाओं में दीवारें हैं, कुर्सियाँ हैं, शिक्षक हैं—पर हम भारत के लोग नहीं हैं। क्योंकि हमें लगता है कि खेत अधिक ज़रूरी हैं, घर का काम अधिक ज़रूरी है, पैसे अधिक ज़रूरी हैं। और इसी सोच के कारण हमारे बच्चे आज भी ‘पहली कक्षा से जीवन की कठिन परीक्षा’ में सीधे धकेल दिए जाते हैं। गाँवों की यह सच्चाई आँकड़ों में नहीं, इन थके चेहरों, इन सूखे पेटों और इन खाली विद्यालयों में दिखाई देती है। यह दर्द केवल आँकड़े नहीं—ये जीते-जागते लोग हैं, जिनका भविष्य हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूट रहा है। और हमारे साथ ये जो भी हो रहा है, वह जानबूझकर नहीं हो रहा है। इसके पीछे अशिक्षा, अज्ञानता और जागरूकता का अभाव बहुत बड़े कारण हैं।”

मैं, जितेन्द्र देव पाण्डेय ‘विद्यार्थी’, आज उन भारत के लोगों की चीखों की आवाज़ बनकर आया हूँ—उन धूमिल हो चुके चेहरों की मौन चीखों का दर्पण बनकर, जो हमारे गाँवों में, हमारे समाज में, हमारे ही बीच जीते हुए धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं। वे बहुत कुछ कह रहे हैं—इतना कि सुनने के लिए केवल हमारे कान पर्याप्त नहीं होंगे। हमें अपने मन, दिल और मस्तिष्क—सबके द्वार खोलने होंगे। हमें अपनी इच्छा–शक्ति को जगाना होगा, अपने Logo के Ego से बाहर निकलना होगा और अपनी सुविधाओं के खोल को त्यागकर उनकी जीवन–यात्रा में कदम रखना होगा। क्योंकि परिवर्तन दूर खड़े होकर नहीं आता—परिवर्तन वहीं जन्म लेता है, जहाँ एक मनुष्य दूसरे मनुष्य का हाथ थामता है। हमें उनके पास जाना होगा—उनके काँपते हाथ थामकर, उनकी आँखों में झाँककर, उनके हृदय की थरथराती आवाज़ सुनकर, उन्हें हिम्मत देते हुए यह कहना होगा—“हे भारत के लोग, हम भारत के लोग आपके अपने हैं… और आप हमारे। हम आपके बीच इसलिए आए हैं कि आपका दुःख समझ सकें, आपके संघर्ष को महसूस कर सकें और आपके साथ मिलकर उन कष्टों का अन्त कर सकें। इस अभियान में हमारी नहीं—आपकी जीत छिपी है। क्या आप अपने भविष्य के लिए हमारा हाथ थामेंगे?” 

साथियों, अब मैं उन भारत के लोगों की ओर से—उन बच्चों, किशोरियों, माताओं और खेतों में झुकते श्रमिकों की ओर से—आपसे यह जानना चाहता हूँ—क्या आप तैयार हैं? इस देश का नागरिक होने के नाते, अपने ही नागरिकों की आवाज़ सुनने, उनके साथ क़दम-से-क़दम मिलाकर चलने और शासन–प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे मानवता–अभियानों का हिस्सा बनने के लिए तैयार हैं? “जब हम किसी एक जीवन को थामते हैं, हम पूरे समाज को उठाते हैं।” अब निर्णय हम सबके हाथ में है—क्या हम आगे बढ़ेंगे? क्या हम उनका हाथ थामेंगे? क्या हम उन्हें वह भविष्य देंगे, जिसके वे उतने ही हक़दार हैं, जितने हम?

आइए, आज केवल संकल्प न लें—आज किसी के जीवन में उम्मीद बनें। क्योंकि कभी-कभी एक हाथ का सहारा, एक आवाज़ का भरोसा और एक कदम का साथ किसी की पूरी ज़िन्दगी बदल देता है। हम भारत के लोग हैं। और भारत के हर व्यक्ति की पीड़ा हमारी अपनी पीड़ा है। अब हमें केवल सुनना नहीं है—हमें साथ चलना है।

9.11.25

मेरी ज़िन्दगी का मजमून

मेरी ज़िन्दगी का जो उनवान है, मज़मून भी वही है,
जैसा दिखता है दिल मेरा — मेरा ख़ून भी वही है।

मैंने अपनी महबूबा में ही देखा है ख़ुदा अपना,
जो बनी मोहब्बत मेरी — मेरी ख़ातून भी वही है।

तलवारें उठती रहीं यहाँ मेरे इश्क़ के ख़िलाफ़,
जिसने तोड़ा घरबार मेरा — अफ़लातून भी वही है।

घोंपे गये ख़ंजर मेरी पीठ में — मरहम भी मिले हैं,
जिसने दिया ज़हर मुझे — मेरा ख़ैर-ओ-ख़ून भी वही है।

अपने चाँद को चाहा मैंने इक चाँद से ज़ियादा,
वही बनी है उल्फ़त मेरी — मेरा जुनून भी वही है।

हर दुआ में जिसका नाम आता है, बड़े ही अदब से,
मेरी तिश्नगी वही है — और मेरा सुकून भी वही है।

मोहब्बत में दोस्ती का करार सिर्फ़ वफ़ा का है,
इश्क़ में मिटने की रीत वही — क़ानून भी वही है।

किसे इल्ज़ाम दूँ अब इस तन्हाई की साज़िश का,
जिसने छोड़ा था राह में — उसका ममनून भी वही है।

7.10.25

हम जो कुकुरमुत्ते ही रहे…

हम आदि से अब तक,
कन्दमूल की भाँति,
गड़े पड़े थे मिट्टी के भीतर कहीं —
सघन वनांचलों,
पहाड़ों की अँधेरी गुफाओं,
नदियों के किनारे,
बिना इस भान के
कि हम वनवासी हैं,
या है हमारा अस्तित्व कुछ और भी।

हम प्रकृति
और वर्षा-जल पर आश्रित,
उसके ऋतुओं पर विश्वास के साथ,
मौसमी रहे आए।

कालान्तर में,
हम पर पड़ी दृष्टि कुछ भूखे सैलानियों की।
उन्होंने हमें खोद निकाला,
आलू-अरबी की तरह।
और दिखाई हमें ब्रोकली और गोभी
की सुन्दरता।
साथ ही किया प्रेरित,
प्राप्त करने को सौन्दर्य उतना ही।
दिखाया गया स्वप्न —
निखारने को रंग हमारा,
कि
स्याह-धूसर वर्ण
बन जाएगा श्वेत और चमकदार।

स्वभावानुसार, हम भी हुए मोहित,
और जीने की इच्छा हुई
बैंगन-भिण्डी की तरह।
जिस प्रकार नेनुआ-तोरई में
नहीं आने दिया जाता
 स्वाद कभी
कद्दू-लौकी का
,
उसी प्रकार, हम भी नहीं बन पाए —
परवल, शिमला मिर्च, सेम बीज या मटर कभी।

सैलानियों की दिखाई दुनिया को देखने,
शलजम, चुकन्दर की तरह
जैसे ही निकाला गर्दन थोड़ा-सा —
हम काट दिए गए मूली-गाजर की तरह,
और चीरे गए पालक-चौंराई बनाकर।
हम काटे और चीरे ही गए थे,
कि तभी ज़िन्दगी ने हमें कूट दिया,
सोंठ और अदरक की तरह।
फिर कई लोग आए,
सेवक और हमदर्द बनकर,
और हमारी ज़िन्दगी को
प्याज़ के छिलके की तरह उतारने लगे,
नीछने लगे लहसुन की कली बनाकर। 

हमारी ज़िन्दगी में भरी —
करेले की कड़वाहट,
और हरी मिर्च के तीखेपन से
आँसू झरने की तरह बह निकले।
और वे —
टमाटर, नींबू, में काला नमक मिलाकर,
लेने लगे चटखारे हमारे दर्द का,
और बेचने लगे,
मसाले मिलाकर
एवाकाडो के समाचार के रूप में|

तेज पत्ता की तरह तड़के में पड़ने वाले हम,
कड़ाही में ही जलते रहे,
पर कभी
धनिया पत्ती बन महक नहीं पाए।
तेल में सबसे पहले खौला देने के बाद भी,
अपने होने का
न ही किसी को एहसास करा पाए।

लोगों की बातों में आकर,
हम चले तो थे —
मशरूम बनकर,
अपनी छतरी को आसमान में फैलाने,
पर एक वर्ग आज भी है
जो हमें कुकुरमुत्ता ही कहता है,
खाना भी नहीं चाहता,
और कटहल में लगे काँटे की ही भाँति
हम उपेक्षित रहे आए| 

सदियाँ बीत गईं —
हमें खोदे हुए,
निकाले हुए,
धोए हुए।
पर आज तलक हमें
न तो गोभी की सुन्दरता मिली,
न ही ब्रोकली वाला भाव।

हम आज भी आदिवासी कन्दमूल की ही तरह
अपना भावहीन, अर्थहीन जीवन जी रहे हैं।
और वे —
सब्ज़ियों का व्यापार करके
करोड़पति बन चुके हैं। 

26.9.25

हे माधव!

जब श्याम मेघ भी सूखें हों,
और धरती हो ऊसर-बंजर,
जब पवन अग्नि की ज्वाला हो,
और वृक्ष दिखें निर्जर-जर्जर।

जब रात्रि गहन अँधेरी हो,
और जीवन आशा-हीन लगे,
जब मार्ग लगें भयकर सारे,
और वाणी भाषा-हीन लगे।

जब साथ न हो मैत्री कोई,
और एकल-जीवन वासी हो,
जब उल्लास पतित हो नेत्रों से,
और सर्वांग पूर्ण उदासी हो।

तब हाथ तुम्हारा आता है —
हे केशव! मेरे सखा, सुनो,
तब साथ तुम्हारा आता है —
हे माधव! तू ही दिखा, सुनो।

मातृ-पितृ का स्नेह मिला,
भ्राता-भगिनी से पूर्ण किया,
वसुधा-सम कुटुम्ब दिया,
जीवन-रस सम्पूर्ण दिया।

उजाड़, निर्जन उपवन में,
तुमने जो सुमन खिलाया है,
तन-मन से मैं तृप्त हुआ,
जीवन सम्पूर्ण ही पाया है।

कृष्ण दिया, कृष्णा दिया,
मधुवन को मधुमास दिया,
निर्मल-निश्छल हृदय दिया,
दिव्य शान्ति का वास दिया।

अब और न माँगूँ कुछ तुझसे —
ओ मोहन! मेरे मित्र, सुनो,
अनुसरण करूँ शरण तेरी,
और चित में तुम्हारा चित्र, सुनो।

25.9.25

यारियाँ

यारियाँ नहीं होतीं टूटने को
जो टूट जाएँ, यारियाँ नहीं होतीं|

मुश्किलों से उबरना है नहीं आसाँ  
जो उबर जाएँ, दुश्वारियाँ नहीं होतीं| 

बेकाम हैं जवानियाँ आजकल  
जो काम आ जाएँ, बेकारियाँ नहीं होती| 

बे-तआल्लुक़ है ज़िन्दगी उनकी
जो बे-तार्रुफ़ हो जाएँ, वफ़ादारियाँ नहीं होतीं|

ज़िन्दगी का सौदा ज़िन्दगी नहीं होती
जो ज़िन्दगी हो जाएँ, करोबारियाँ नहीं होतीं|


18.9.25

वेदना की सहचरी-स्त्री

चिकित्सक बोले –
“देवि, आवश्यक है आपको पूर्ण विश्रान्ति।
नितान्त शैय्या-विश्राम ही देगा त्राण
इस कटि-पीड़ा से!”

विनम्र निवेदन है, वैद्यवर –
क्या यह सम्भव है यथार्थ में?
कि एक स्त्री,
जो जी रही है मातृत्व का सतत जीवन,
जो है पत्नि किसी पुरुष की,
गृहिणी एक विस्तृत कुल की,
जहाँ वास करते हैं –
सास-श्वसुर,
ज्येष्ठ-जिठानी,
और घर के अन्य अंग।

जहाँ दिन नहीं होता विश्रान्त,
रात्रि नहीं होती रिक्त।
जहाँ अष्टयाम चलती है
कर्तव्यों की शृंखला।
जहाँ मेरी कर्मठता
ही आधार है-
परिवार के सन्तुलित धुरी की,
और मेरी थकान की भी,
कभी नहीं होती किसी को चिन्ता।

वैद्यराज!
कोई ऐसा उपचार बताइए,
जो कर सके इस वेदना का शमन,
पर न बाधित हो
मेरी गृह-कर्तव्यों की निरन्तरता।

दीजिए कोई औषधि –
जो दे सके क्षणिक शान्ति भी,
और दीर्घकालिक सामर्थ्य भी,
ताकि मेरा श्वसुराल रहे प्रसन्न,
और मैं न कहलाई जाऊँ –
"आलसी", "अकर्मण्य", या
"आजीवन व्याधिपीड़ित"।

जब स्त्री ने कही
अपनी पीड़ा की यह अन्तर्वेदना,
तो वैद्य ने कर लिया धारण मौन।
पुनः कुछ क्षण के,
दीर्घ श्वसित हो बोले –

“हे देवि,
यदि आप हैं इस समाज की स्त्री,
तो फिर यह पीड़ा
आपकी सहचरी ही कहलाएगी।
चाहे आप हों स्त्री किसी
कुलीन की,
या मलिन गृह-वासी हों।
आप हों
विस्तारित-परिवार में,
या जीती हों नितान्त
निजी, एकल जीवन। 

स्त्रियों के लिए यह संसार
वेदना-रहित नहीं है।
पीड़ा और स्त्री
सहोदरी न हों भले ही,
परन्तु सखियाँ अवश्य हैं –
जो जीवनभर साथ निभाती हैं,
और साथ छोड़ती हैं
मात्र उसी क्षण,
जब स्त्री मुक्त होती है
इस भव-सागर से।”

30.8.25

मोर नहीं भए मोरे सँवरिया

भोर भयी घनश्याम न आए
बाट जोहत मोर बीती रे रतिया

किस सौतन संग रास रचायो
सुधि करि करि मोर बिहरे रे छतिया

मुझ बिरहन पर तरस न आई
ऐसी लुभा के गई रे सवतिया

रंग भी श्याम औ अंग भी कारो
साँवली सूरत मोहनी मुरतिया

माखनचोर ने हृदय चुरायो
मोर नहीं अब मोर सुरतिया

पीर हिया की कासूँ सुनाऊँ

मोर नहीं भए मोरे सँवरिया।