शब्द समर

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18.9.25

वेदना की सहचरी-स्त्री

चिकित्सक बोले –
“देवि, आवश्यक है आपको पूर्ण विश्रान्ति।
नितान्त शैय्या-विश्राम ही देगा त्राण
इस कटि-पीड़ा से!”

विनम्र निवेदन है, वैद्यवर –
क्या यह सम्भव है यथार्थ में?
कि एक स्त्री,
जो जी रही है मातृत्व का सतत जीवन,
जो है पत्नि किसी पुरुष की,
गृहिणी एक विस्तृत कुल की,
जहाँ वास करते हैं –
सास-श्वसुर,
ज्येष्ठ-जिठानी,
और घर के अन्य अंग।

जहाँ दिन नहीं होता विश्रान्त,
रात्रि नहीं होती रिक्त।
जहाँ अष्टयाम चलती है
कर्तव्यों की शृंखला।
जहाँ मेरी कर्मठता
ही आधार है-
परिवार के सन्तुलित धुरी की,
और मेरी थकान की भी,
कभी नहीं होती किसी को चिन्ता।

वैद्यराज!
कोई ऐसा उपचार बताइए,
जो कर सके इस वेदना का शमन,
पर न बाधित हो
मेरी गृह-कर्तव्यों की निरन्तरता।

दीजिए कोई औषधि –
जो दे सके क्षणिक शान्ति भी,
और दीर्घकालिक सामर्थ्य भी,
ताकि मेरा श्वसुराल रहे प्रसन्न,
और मैं न कहलाई जाऊँ –
"आलसी", "अकर्मण्य", या
"आजीवन व्याधिपीड़ित"।

जब स्त्री ने कही
अपनी पीड़ा की यह अन्तर्वेदना,
तो वैद्य ने कर लिया धारण मौन।
पुनः कुछ क्षण के,
दीर्घ श्वसित हो बोले –

“हे देवि,
यदि आप हैं इस समाज की स्त्री,
तो फिर यह पीड़ा
आपकी सहचरी ही कहलाएगी।
चाहे आप हों स्त्री किसी
कुलीन की,
या मलिन गृह-वासी हों।
आप हों
विस्तारित-परिवार में,
या जीती हों नितान्त
निजी, एकल जीवन। 

स्त्रियों के लिए यह संसार
वेदना-रहित नहीं है।
पीड़ा और स्त्री
सहोदरी न हों भले ही,
परन्तु सखियाँ अवश्य हैं –
जो जीवनभर साथ निभाती हैं,
और साथ छोड़ती हैं
मात्र उसी क्षण,
जब स्त्री मुक्त होती है
इस भव-सागर से।”

30.8.25

मोर नहीं भए मोरे सँवरिया

भोर भयी घनश्याम न आए
बाट जोहत मोर बीती रे रतिया

किस सौतन संग रास रचायो
सुधि करि करि मोर बिहरे रे छतिया

मुझ बिरहन पर तरस न आई
ऐसी लुभा के गई रे सवतिया

रंग भी श्याम औ अंग भी कारो
साँवली सूरत मोहनी मुरतिया

माखनचोर ने हृदय चुरायो
मोर नहीं अब मोर सुरतिया

पीर हिया की कासूँ सुनाऊँ

मोर नहीं भए मोरे सँवरिया।

भारत की आत्मा की ओर

लोग कहते हैं, "तुम घूमते रहते हो।"
मैं भी कहता हूँ, "हाँ, मैं घूमता रहता हूँ।"

मैं घूमता रहता हूँ,
क्योंकि मुझे घूमना
है पसन्द;
पर मात्र इसलिए नहीं घूमता,
कि मैं घूमना चाहता हूँ।
मैं इसलिए भी घूमता हूँ,
ताकि घूम-घूमकर
मैं घूम सकूँ भारतवर्ष को,
और जान सकूँ इसकी विशेषता को।

मेरा घूमना
नहीं होता घूमना मात्र —
चमकती कारों में,
सुन्दर-चमकीली सड़कों पर।
मेरा घूमना होता है —
सुदूर गाँवों, दुर्गम वनांचलों में,
जहाँ
मैं चलता हूँ कोसों पैदल,
चढ़ता हूँ उत्तुंग पर्वतमालाओं पर,
लाँघता हूँ हहाती-उफनाती नदियों को,
धँसता हूँ पिण्डलियों तक कीचड़ों में,
काँटों से उलझते-जूझते हुए
पहुँचता हूँ उन तक भी,
जो सदियों से
कटे हैं —
कथित इस सभ्य समाज से।

मेरा घूमना नहीं होता घूमना मात्र;
मेरे घूमने में
होती है भेंट —
जली हुई उघड़ी देह,
काँटों से बिंधे नंगे पाँव,
चिपचिपे, रूखे, उलझे केश,
कपाल में धँसी हुई आँखों में कीचड़,
पीठ से चिपकी हुई अन्तड़ियाँ,
और हृदय में अपार सम्मान लिए
धरणी-पुत्रों
और ग्राम्य-वधुओं से —
जिनमें होती है
प्रसन्नता और हर्ष,
तो वहीं छिपी होती है — किसी की पीड़ा-व्यथा,
जो वर्षों से,
पीढ़ी-दर-पीढ़ी,
उनके जन्म के पूर्व से ही
चिपक जाती है साथ उनके।

मैं बैठ उनकी पंगति में,
उनके चूल्हे में
चुरे भात-दाल को खाता हूँ
बड़े ही चाव से।
खोल कर रख देता हूँ अपने कान,
मन को कर देता हूँ स्थापित उनके समक्ष,
ताकि पीड़ित की पीड़ा को
मैं कर सकूँ एकाकार स्वयं से।

समस्या रूपी अजगर से जकड़े लोग
नहीं जानते जतन अपनी त्राण का।
मेरे घूमने में जटिल-से-जटिल समस्या
होती है हल;
होते हैं समाधान उनके निवारण के —
जिनका अनुसंधान करते हैं
हम मिलजुलकर, एकजुटता से।

मेरे घूमने में
हमारे सुख, सीख, शिक्षा,
रीतियों, परम्पराओं और संस्कृतियों का
होता है निहित एक सार —
जो थोड़ा बाँधता हूँ
मैं अपनी पोटली में,
और कुछ संजो लेते हैं वे
अपनी कुटिया में।

मेरा घूमना, घूमना नहीं है;
मेरा घूमना —
भारत की आत्मा को आत्मसात करना है,
वह आत्मा,
जो गाँधी जी के अनुसार
"बसती है गाँवों में।"

26.7.25

स्मृति की नैतिकता

धीरे-धीरे व्यक्ति भूलने लगता है,
अपकार भी, उपकार भी।

अपकार भूलता है,
तो कृतज्ञता वश,
लगता है देने सम्मान उसी को,
जिसने किया होता है,
कभी घोर तिरस्कार
और अपमान भी कभी।
और जब भूलता है,
उपकार किसी का,
तो होता है कृतघ्न इस प्रकार
कि नहीं हिचकता करने में
तिरस्कृत, उपेक्षित या अपमानित उसे भी,
जो उसकी डूबती नौका का,
रहा था सहारा भी कभी।

अपकार भूल जाना,
एक श्रेष्ठ गुण भी है।
इससे व्यक्ति के महान बनने के,
खुलते हैं मनः एवं व्यक्तित्व द्वार,
परन्तु उपकार भूलना...?

उपकार करना
जितना ही है श्रेष्ठतम कार्य,
उसे भूलना
नीचता की पराकाष्ठा है।
यह कृत्य,
व्यक्ति के व्यक्तित्व को न मात्र
नाराधमता की ओर
खींच ले जाता है,
बल्कि उसके अधमपन को
सर्वत्र प्रदर्शित भी कर देता है|

अतः अपकार भूल,
यदि उपकार न भी कर सकें,
तो न करें कोई खेद मन में,
परन्तु उपकार भूलकर,
अपकार न करें किसी का,
प्रयास करें यहाँ तक
कि शत्रु का भी पीठ पीछे अहित न हो।

20.7.25

ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ...?

ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ?
कैसे तोहें निज पीर सुनाऊँ?
ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ?

नैहर में थी मैं प्यारी चिरैया
सासुर में मोहे बँधी हथकड़िया
कैसे तोहें अपना दर्द दिखाऊँ?
ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ?

मायरि की मैं प्राण पियारी
बाबुल की तो रानी सुकुमारी
सासुर का कहते मैं शरमाऊँ
ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ?

ना रुचि भोजन ना रुचि जीवन
ना रुचि बोलन ना रुचि पहिरन
दूसर रुचि मैं समय बिताऊँ
ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ?

गुणी भले हूँ पर नहीं कोई गिनती
निज अधिकार भी पाऊँ करि विनती
भले हूँ सबल पर अबल कहाऊँ
ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ?

सुन्दर मुख पर रहूँ कर पर्दा
शक्ति समस्त लिये फिरें मर्दा
बोलन पर निज जान गवाऊँ
ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ?

कभी बोलें सास कभी रे ननदिया
जिठानी लड़ें जैसे लड़े रे कंजरिया
छोटका देवर को मैं कैसे समझाऊँ?
ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ?

गाँव समाज बना जैसे पिंजरा
नजर गड़ाए डरत मोर जियरा
कैसे के मैं निज लाज बचाऊँ?
ए री सखी तोहें का मैं बताऊँ?





7.7.25

प्यार का खारापन

उसने कहा,
"बहुत अरसा बीत गया,
तुमसे बात नहीं हुई|
न मोहब्बत की हमने,
न गिले हुए,
न शिकवे किये|
ऐसा लगता है,
जैसे जी नहीं रहे हैं,
बस जी रहे हैं|"

मैंने कहा,
"मैं तुम्हें याद हूँ,
तुम मेरे दिल में हो|
मैं जी रहा हूँ तन्हा,
तुम अपनी महफ़िल में हो,
मैं बतिया लेता हूँ तन्हाई से,
और तुम आँसुओं से|
न तुम मुझसे जुदा हुई,
न मैं हुआ दूर तुमसे;
बस कुछ रस्में हैं
जिनकी बेड़ियों में
तुम बंधी हो,
और मैं भी जकड़ दिया गया हूँ|

तुम अपने अश्क़ों का भेजो ख़त मुझे,
और मैं भी भेजता हूँ पैग़ाम तुम्हें
अपनी बेबसी का|
दोनों इसी में खो जाएँ,
जैसे भी जी रहे हैं
चलो,
सारा खारापन पी जाएँ
|"

2.7.25

तुम स्त्री हो-हुँकार दो

तुम स्त्री हो,
चाहे कवयित्री हो, अभिनेत्री हो,
नृत्यांगना हो, वीरांगना हो,
सिद्ध हो, प्रसिद्ध हो,
अनाम हो, या सनाम हो,
परन्तु स्त्री ही;
तुम्हारा नाम है|

तुम हो शैशव काल में,
तरुणाई की चाल में,
यौवन तुम्हारे भाल में,
या पूर्ण वार्धक्य हो खाल में,
किन्तु लैंगिक रूप से;
स्त्री ही हो तुम त्रिकाल में|

चाहे तुम सृजित हो, तुम पूजित हो,
तुम सेवि हो, तुम देवि हो,
तुम माता हो, जगदाता हो,
तुम मित्र हो, या पवित्र हो,
परन्तु स्त्रीत्व ही;
तुम्हारा चरित्र है|

मन में तुम्हारे ममता है,
हृदय में कोमलता है,
सबके प्रति समता है,
वंश, ध्वंस की क्षमता है,
परन्तु स्त्रीत्व ही;
तुममें रमता है|

चाहे तुम सबला हो, तुम चपला हो,
तुम दिव्य हो, तुम भव्य हो,
तुम क्षेम हो, तुम प्रेम हो,
या तपस्विनी हो, या ओजस्विनी हो,
परन्तु स्त्रीत्व ही;
तुम्हारी दैनन्दिनी है|

तुम भक्ति हो, तुम शक्ति हो,
तुम श्रेय हो, तुम ज्ञेय हो,
तुम मान हो, सम्मान हो,
तुम गीत हो, तुम जीत हो,
परन्तु स्त्रीत्व ही:
तुम्हारी रीत है|

तुम स्त्री हो,
तुम्हारे स्त्री होने को,
और अपने आप से
निम्न होने, अल्प होने जैसे
विषाक्त भावों का आभास
करते व कराते हैं, वे,
जिन्होंने नाद में डूबकर बदल ली है
रंग अपनी चमड़ी की,
जो स्वयं बहिर्रूप से,
प्रदर्शित होते हैं शुभचिन्तक तुम्हारे,
परन्तु खाल के भीतर
इनकी धमनियों में बहता है,
कलुषित रक्त
प्रति तुम्हारी देह, तुम्हारी सुन्दरता,
तुम्हारे भावों-विचारों की अभिव्यक्ति के|
इन शृगालों की दृष्टि में
तुम होती हो एक मृगा मात्र,
जिसे ये जम्बुक देखते हैं अपनी
कुटिल व तीक्ष्ण दृष्टि सहित-
लोलुप जीह्वा से,
और
चुभा देना चाहते हैं,
समस्त दन्तपंक्तियाँ तुम्हारी देह में,
चबा जाना चाहते हैं,
तुम्हारा तन, मन, अस्तित्व, कृतित्व, सतीत्व, मान-मर्यादा सहित-
समस्त प्रतिष्ठा तुम्हारी|

परन्तु सुनों,
तुम स्त्री हो,
और तुम्हारा स्त्री होना ही द्योतक है
कि तुम हो क्षमतावान, शक्तिमान हो सामर्थ्यवान हो|
अपनी मुष्टि-प्रहार से
दन्तहीन कर डालो,
उन समस्त अरण्यश्वानों को,
रज-धूल से दृष्टिहीन कर दो,
वकभक्तों को|
जिह्वा निकाल
बना लो प्रत्यंचा समस्त गिरदानों की,
और सिंघणी सम हुँकार से
कर दो रहस्योद्घाटन
रंगे सियारों का|
कर दो घोषणा समस्त ब्रह्माण्ड में
कि तुम स्त्री हो,
और
अनिच्छा से नहीं कर सकता स्पर्श कोई भी तुम्हें,
चाहे हो वह दानव, मानव या साक्षत देव ही,
और यदि किसी ने की धृष्टता
तो दुर्योधन की जंघा
अब भीम नहीं,
तुम स्वयं तोड़ोगी|