शब्द समर

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25.3.20

राष्ट्रबन्दी-2

देश आपात स्थिति में है
पूर्ण राष्ट्रबन्दी की,
की गई है घोषणा।
वैश्विक महामारी के काल में
कोई न निकले
अपने निवास से बाहर,
नहीं तो,
किए जाएँगे दण्डित,
बन्द कर दिए जाएँगे बन्दी गृह में।
करते यही घोषणा,
गली-गली घूम रहे हैं सैनिक जन।

तू क्यों घूम रहा है बाहर झुरुआ?
और तेरे बच्चे भी?
क्या तुझे नहीं पता
कि बाहर घूमना है अपराध?
अभी उठा लिया जाएगा,
और दे दिया जाएगा कारावास?

साहब!
यह कारावास,
हम सबको मिलेगा न?
तो ले चलो न मुझे
और मेरे बच्चों को वहीं।
हम दिहाड़ी लोग इक्कीस दिन
बिना खाए कैसे रहेंगे?
बाहर गए,
तो महामारी मारेगी,
घर में रहे तो भूख।
अच्छा होगा,
आप हम सबको अन्दर ही डाल दीजिए
कम-से-कम
दोनों समय का भोजन तो मिला करेगा
जेल में ही सही,
हम कुछ और दिन जी तो लेंगे।

राष्ट्रबन्दी-1

सुना तुमने?
क्या?
बन्द।
बन्द पूरा देश,
बन्द हर प्रदेश
चप्पा-चप्पा बन्द,
कोना-कोना बन्द।
बन्द विश्व, बन्द यह संसार।

जो नहीं डरा कभी गजराज से,
न भयाक्रान्त हुआ वनराज से
उस मानव को
एक सूक्ष्म, अदृश्य जीव ने
स्वेच्छिक काल-कोठरी में
जीने के लिए कर दिया है पूर्ण लाचार।

राजा ने कर दिया है आदेश,
पूर्ण राष्ट्रबन्दी की।
रहोगे एकान्त में
तो ही है जीवन का प्रत्याभूत।
ऐसा कहकर
राजा ने
पल्ला झाड़ लिया है।
अब अपने जीवन के उत्तरदायी
तुम्हीं होंगे।
चाहते हो यदि लम्बा जीवन,
तो चले जाओ एकविंश दिवसीय
पूर्ण गृहवास में।
जीते रहोगे
तो यह समाज पुनः मिल जाएगा।

31.1.20

हम उबले लोग

हम उबल चुके हैं,
हम पूरी तरह उबल चुके हैं।
हमारी साँसें उबल चुकी हैं,
हमारी ज़िन्दगी उबल चुकी है।
केवल उबले ही नहीं,
फूल भी गए हैं हम,
हमारी नसों के पोर-पोर में,
पानी भी भर चुका है।

अब बस छीलना बाकी है,
हम बिने नाख़ून के,
बिना कुरेदे ही,
उकेले जा सकते हैं,
परत-दर-परत।

वो देखो,
वो फ़क़ीर आ रहा है।
उसके झोले में कुछ है शायद?
शायद मसाला है।
हाँ वही मसाला,
जिसे लेने कभी,
पुर्तगाल, डच, अँग्रेज़ आये थे,
और उठा ले गए,
पूरा-का-पूरा,
हम सिंक चुके लोगों को पका कर|

इस दाढ़ी वाले फ़क़ीर के पास भी,
शायद वही मसाला है,
लेकिन यह हमसे मसाला लेने नहीं,
हममें मिलाने आया है।

इसके झोले में,
जाति का नमक,
कारोबार की धनिया
रोज़गार का ज़ीरा
और सबसे ख़ास
जो मसाला है,
वह है,
धर्म नाम की लाल मिर्च।

इसके तीखे स्वाद को
हममें डालकर,
अपना भोजन स्वादिष्ट बनाएगा।

भरपेट खाएगा,
डकार लगाएगा,
और जैसा कि कहता है,
फ़क़ीर आदमी है,
झोला उठाएगा,
चला जायेगा|

वह चला जाएगा.
किसी और को उबालने-तलने
और लाल मिर्च से
अपना भर्ता स्वादिष्ट बनाने।

हम उसिने जा चुके लोग,
उसके कुचलने पर,
सिर्फ चीत्कार मार सकते हैं।

1.12.19

निरर्थक


वह जो होना चाहता था,
उसे किसी ने होने नहीं दिया|

उसे जो होना चाहिए था,
उसे भी किसी ने होने नहीं दिया|

उसे जो नहीं होना था,
वह तो कभी वह हो ही नहीं सकता था|

वह जो हो चुका है,
उसे वह भी नहीं जानता 
कि वह क्या हुआ है|

फिर भी उस होने को,
वह जीता है 
अपने शरीर, 
और दूसरों के मन में
यही उसका आदि और यही अन्त है|

बीच में जो भी है,
वह तड़पने की कविता है,
जो न भी होता
तो भी वह होता..

24.9.19

अगर आप प्रेम में हैं


अगर आप प्रेम में हैं,
तो उसे खुलेआम ज़ाहिर करिए।
प्रेम को प्रकट करना, दिखावा नहीं होता
न ही होता है उसका प्रचारीकरण,
प्रेम प्राकट्य
प्रेम-प्रगाढ़ता के ताबूत की एक कील होता है।
अगर आप प्रेम में हैं
और आपका प्रेम नहीं है असहज,
तो अश्लीलता को छोड़कर,
सबकुछ दुनिया को दिखाइए।

हो सकता है,
दुनिया आपके प्रेम को न करे स्वीकार,
न करे तारीफ़,
तो क्या फ़र्क़ पड़ता है,
क्योंकि दुनिया अपने मतलब के अलावा
किसी की सगी नहीं होती।
इसलिए यदि आप प्रेम में हैं,
तो उग आइए हरी-हरी घास की तरह।

थकी और मरी हुई आवाजें

थकी और मरी हुई आवाज़ें
,
न जग सकती हैं,
न जगा सकती हैं।
न उठ सकती हैं,
न उठा सकती है।
न चल सकती हैं,
न चला सकती हैं।
न दौड़ सकती हैं,
न दौड़ा सकती हैं।

आवाज़ों में चाहिए ग़र इंक़लाब-
तो मुट्ठियों को भींच लो,
आँखों को खींच लो
उछाल दो जहान में
लहरा दो आसमान में,
कि एक साथ में बोल दो
हवा में स्वर को घोल दो।
कि घुलने दो स्वरों को तुम
उड़ने दो परों को तुम
अब ये पर रुके नहीं
अब ये सर झुके नहीं।

कि उड़ चलो वहाँ पे तुम
जहाँ हैं राजा-रानियाँ
बन रही हर रोज़ जहाँ
लूट की कहानियाँ।
लुट रहें हैं रोज़ जहाँ
सलमा और सुरेन्दर
लूटते ही जा रहे हैं
डेविड और विश्वम्भर।

इनकी ईंट पर तुम आज
पत्थरों को भौंक दो
इनकी भीत पर तुम आज
लाल रंग छौंक दो।
कि पोत दो कालिमा
इनके षड्यंत्र पर
और गोबरों का लेप दो
समस्त काले मन्त्र पर।

गला इनका रेत दो
बिना हथियार के
ज़ुबान इनकी चेप दो
बिना किसी वार के।
ख़त्म इनका खेल हो,
इनको सबको जेल हो
इनकी चाल चले नहीं
इनकी दाल गले नहीं

आदमी को आदमी का हक़ तुम्हें दिलाना है
इसीलिए ज़ुबां पे अपने इंक़लाब लाना है।
जाग आओ आज तुम
उठाओ आवाज़ भी
हो नहीं थके-मरे
कर दो आग़ाज़ भी।

क्योंकि
थकी और मरी हुई आवाज़ें,
न जग सकती हैं,
न जगा सकती हैं।
न उठ सकती हैं,
न उठा सकती है।
न चल सकती हैं,
न चला सकती हैं।
न दौड़ सकती हैं,
न दौड़ा सकती हैं।

23.9.19

दमदम ज़िन्दगी


दमदम भागती रहती है तू
ऐ ज़िन्दगी!

दम भर तो ठहर जा,
ज़रा तो दम लेने दे|

मेरा तो दम घुटता जा रहा है
तेरे हरदम भागते रहने से|

तू दम रही है मुझे,
और बेदम होता जा रहा हूँ मैं|

लगता है दम निकाल कर ही
दम लेगी तू|