शब्द समर

विशेषाधिकार

भारतीय दंड संहिता के कॉपी राईट एक्ट (1957) के अंतर्गत सर्वाधिकार रचनाकार के पास सुरक्षित है|
चोरी पाए जाने पर दंडात्मक कारवाई की जाएगी|
अतः पाठक जन अनुरोध है कि बिना रचनाकार के अनुमति के रचना का उपयोग न करें, या करें, तो उसमें रचनाकार का नाम अवश्य दें|

27.3.14

मैं पलायन करना चाहता हूँ



मैं सोच रहा हूँ  
कर लूँ पलायन
इस जिजीविषा से
|
मैं चला जाऊँ कहीं
अनन्त की यात्रा पर
लेकर अवकाश इस
सांसारिकता से
|

मैं सोच रहा हूँ जाकर
छिप जाऊँ
किसी स्याह अँधेरी
गिरि कन्दरा में
जहाँ नभ-मंडल और उसकी
तारिकाएँ हो रही हों दैदीप्यमान
आठों प्रहर
और हरण कर लें
अज्ञानलवदुर्विदग्ध इस अन्तः का
|

मैं सोच रहा हूँ
जाकर करूँ निवास,
किसी ऐसी मरुस्थली में
जहाँ समुद्र की उत्ताल-उच्छृंखल तरंगे
हिम की भांति हों स्थिर
और दे रही हों शन्ति मेरी
अन्तः के विचलन को
|

मैं सोच  रहा हूँ
चला जाऊँ किसी 
ऐसे हिम सागर में
जहाँ तपती हुई अग्नि शिखाएँ
भस्म कर दें मेरी
इच्छाओं को|

मैं सोच रहा हूँ
हो जाऊँ लुप्त किसी 
ऐसे अघोर वन में
जहाँ बजरियों की 
दीवारें रोक रही हो
प्राणघातक पवन को|

मैं सोच रहा हूँ
बैठ जाऊँ जेठ की 
दुपहरी में कहीं
जहाँ का मंद समीर
अपनी मंथर गति से
कर रहा हो
संताप मुक्त मुझे|

मैं पलायनवादी बनना चाहता हूँ
क्योंकि मैं नहीं चाहता
आगमी पीढ़ियाँ पढ़ें 
मात्र मेरा इतिहास
और मेरे चित्र के नीचे लिखा हो
विलुप्त प्राणी|

26.2.14

षड्यंत्रकारी

जन अज्ञान, और तंत्र बेजान,
देखो टोपीधारी कैसे टोपी पहना रहे|
आम रह गये आम, वो लें गुठली के दाम,
टोकरे से घोषणा के रस टपका रहे|
कि भूख रही चीत्कार, करे 'विद्यार्थी' हाहाकार,
सैफई में ख़ान जी कमर मटका रहे|
दे के चाय की बहार, और दूध की फुहार,
मोदियापा कर पप्पू जी मल्हार राग गा रहे|

24.2.14

मंज़िल के पुजारी

जितना गहरा हो सागर को झेलेंगे हम
जितनी ऊँची हो चोटी को पा लेंगे हम
हम जवाँ हैं जवानी की ये उम्र है
ज़िंदगानी को मस्ती से खेलेंगे हम

कौन कहता है कोई बड़ा काम है
अपनी मुट्ठी से किसका बड़ा दाम
एक क़ीमत जो हमने लगा दी कहीं
सारी दुनिया को उतने में ले लेंगे हम

एक वादा जो हमने किया जब कभी
वो इरादा न मुड़ता है पीछे कभी
लाख आएँ  त्रिलोकी के योद्धा मगर
पाँव अंगद का ज़मीं पर टिका देंगे हम

हम थिरकते है घुँघरू की झंकारों पर
होते मदहोश होठों के इशारों पर
पर अगर राह में कोई अंगार हो
पाने मंज़िल उसको भी बुझा देंगे हम|

8.2.14

हैपी हग डे



साभार-गूगल,
आज हग दे|
फिर साल भर इन्तज़ार करना पड़ेगा|
प्रेमिका की बाँहों में
लिपटकर हगो,
धीरे-धीरे हगो, या झपटकर हगो,
पर खूब हगो|
हग का भी, 
अपना एक अलग ही आनन्द है|

कामदेव भी आज के दिन
लजा-लजा कर हग रहे होंगे,
और रति भी,
किन्तु आज दोनों हगेंगे|
काश! कि मेरी भी कोई प्रेमिका होती,
मैं भी उसे बाँहों में
जकड़कर खूब हगता,
और वह भी हगती|


बाग़ में, बगीचा में, घर में, दूकान में
अगवाड़े में-पिछवाड़े में
,
झाड़ी में
, झुरमुट में
अरहर के खेत में
, 
गेहूँ के खलिहान में
,
आरी में
, मेड़ में
छुप कर हगो|


चाहे वर्तमान
खुली संस्कृति के अनुसार
,
अगर कंज़र्वेटिव नहीं हो तो
,
खुलेआम सड़कों पर
,
माता-पिता के सामने
,
बड़ों के सम्मान में
,
कालेज प्रांगण में
,
कक्षा में, घर के आँगन में
,
छात्र शिक्षकों के सामने
,
और शिक्षक छात्रों के सामने
हग डालो|


बैठ के हगो,
या खड़े-खड़े
,
झुक कर हगो,

या पड़े-पड़े,
पर आज के दिन ज़रूर हगो|

चूम-चूम के हगिये,
झूम-झूम के हगिये
,
काँख-काँख के हगिये,
पाँख-पाँख के हगिये|
कई दिनों बाद वाले
अपने साथ टिशू-शुशू
पेपर ज़रूर रखना,
न जाने फुर्क़तों का पानी
कितना निकले,
तो उसे पोछेंगे कैसे
?

मेरे अधकचरे हिन्दी भाषी साथियों!
बुरा मत मनाना
मेरे 
'हगने' शब्द से.
घिन भी मत करना 
'हगने' की प्रक्रिया से|
हिन्दी में यह शब्द
अवश्य असामाजिक है,
लेकिन अंग्रेज़ी के गुलामों के लिए
भरी सभा में सभ्यता का प्रतीक है|
मैं भी सभ्य बन रहा हूँ,
और अंग्रेज़ी में हग रहा हूँ,
क्योंकि जिस तरह
अंग्रेज़ी के 
'रिपोर्ट' शब्द को हिन्दी के
बहुवचन में 
'रिपोर्टें'
डॉक्टर को 'डॉक्टरों'
,
इस्तेमाल किया जाता है,
उसी तरह से मैंने
अंग्रेज़ी के 
'हग' को
हिन्दी में हग दिया है|

मैं जिस जगह रहता हूँ
वहाँ अंग्रेज़ी का ही बोलबाला है,
मजबूरी में मुझे इस
भाषा को हगना पड़ा है|
अब मैं आये दिन अंग्रेज़ी में ही
हगने लगा हूँ|
हगना हिन्दी में हो
या अंग्रेज़ी में
इससे मन तो   
हल्का हो ही जाता हैं
,
इसे वैज्ञानिकों ने भी
प्रमाणित कर दिया है|
तो फिर पक्का न
आज हग दें
?

हे बारह फ़रवरी!
तू साल भर बाद ही क्यों आती है,
जबकि मैं हर रोज़ हगना चाहता हूँ|
चलो साथियों मैं तो सुबह से
इन्तज़ार कर रहा हूँ,
कौन है,

जो मेरे साथ हगना चाहता है?
आओ तो वेलकम
,
जाओ तो भीड़ कम|

2.2.14

ब्राह्मण का विधर्मी प्रेम

जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी'
भाई मैं हिन्दू हूँ. तिस पर उच्च कुल गोत्र ब्राह्मण. बचपन से घर-गाँव और आस-पास के परिवेश से संस्कार मिले हैं कि बिना नहाए-पूजा पाठ किये अन्न-जल ग्रहण ना करूँ. किसी निम्न जाति के व्यक्ति के छुए अन्न-जल से परहेज करूं. अन्य जाति तो ठीक किन्तु चमारों और धैकारों (डोम) लोगों को छुऊँ भी नहीं अन्यथा अपवित्र हो जाऊंगा. मुसलमानों से कोसों दूरी बनाकर रहूँ, ये लोग बड़े ही कट्टर और कसाई होते हैं, हिन्दुओं को पसंद नहीं करते. 
मुझे जो बातें लोग बताते थे, जिनसे परहेज करने कि बातें मेरे कानों में पड़ती थीं वे लोग भी मुझसे यही बात कहते थे. "नाहीं बाबू हो तोहरे बड़े मनई लाग हमरन क छुअल खाब त तोहार जाति चलि जाई. हमरन से दुरिहाँ रहल कर." जिन्होंने किया मैं उनका नाम नहीं लिखूंगा किन्तु मैंने अपनी आँखों से देखा है कि एक केवट के घर में उसके आटे को लात से कुचल कर फेक दिया गया, उसके चूल्हे में पानी डाल दिया गया था. मैं बचपन से भक्त रहा हूँ. ईश्वर के प्रति सदैव से मेरी श्रद्धा रही है. मैं जब छठी कक्षा में था तभी गीता का पाठ किया था. उसमें पता नहीं क्या लिखा था किन्तु वह मेरा धार्मिक ग्रन्थ है इसलिए उसका पूरा अध्ययन किया था. रामचरित मानस की चौपाइयां तो अभी भी कंठस्थ हैं. विद्यालय में अन्ताक्षरी होती तो कोई मुझे परास्त नहीं कर सकता था. नलकूप पर मैं नहा रहा होता था तो कोई भी खैरवार जाति के घर का व्यक्ति उसके घेरे में खड़ा भी नहीं हो सकता था. विद्यालय में पानी पीते समय चमारों के लड़के दस कदम दूर होते थे. मुसलमान तो मेरे गाँव में नहीं थे हाँ पड़ोस के गाँव समदा में हैं उन्हें पता नहीं किन-किन शब्दों से चिढ़ाते थे. लम्बी सी शिखा और त्रिपुंड तिलक पूरे गाँव और विद्यालय में मेरी निशानी थी. स्मरण आता है कक्षा सातवीं में था. मेरे गाँव के ही एक शिक्षक (नाम नहीं लिखुंगा क्योंकि विवाद का कारण बन सकता है) सामाजिक विज्ञान पढ़ा रहे थे. उसमें था कि किसी से छुआछूत का भाव नहीं रखना चाहिए, सबको मिलजुल कर रहना चाहिए. चाहे कोई भी जाति-धर्म का व्यक्ति हो सब एक समान हैं. जो शिक्षक मुझे पढ़ा रहे थे उन्होंने मुझसे पानी मंगाया. प्रतिदिन जब भी उन्हें या किसी भी शिक्षक को प्यास लगती वे मुझे या मेरे जैसे ही किसी सवर्ण या तथाकथित पानी वाली जाति के ही बच्चे से पानी मंगाते और पीते. इस दिन भी उन्होने मुझसे पानी मंगाया. मैंने धर्मेन्द्र कुमार चर्मकार को भेज दिया वह पानी लाया और पंडीज्जी को देने लगा. तड़ाआअक एक तमाचा उसके गाल पर गूंजा. वह वहीं खड़ा रहा मैं डर गया. मेरा कान पकड़कर उन्होंने उठाया. हम तोहसे पानी मंगाए रली न? वे मुझ पर जोर से गरजे. वे मुझे पीट नहीं सकते थे क्योंकि इसका एक कारण तो मुझे पता है जब मैं अनामांकित था तभी से एक होनहार बच्चे के रूप में पूरे विद्यालय और गाँव में मेरा बर्चस्व था. दूसरा आज तक नहीं पता. क्योंकि किसी बच्चे का होनहार होना उसे उसकी पिटाई से बचा ले यह बात गले नहीं उतरती. मेरा परिवार दबंग भी नहीं है न मेरे माता-पिता हममे से किसी भाई -बहन का पक्ष लेकर विद्यालय में लड़ने ही जाते थे फिर भी? अभी लिखते समय एक कारण ध्यान में आ रहा है वह यह कि कहा जाता है मैं उनका पौपूज्य ब्राह्मण हूँ. उनके घर-ख़ानदान की लड़कियों से मेरे खानदान में विवाह होता है. पौपूज्य ब्राह्मण पर हाथ उठाने का मतलब था सात पीढ़ियों को नर्क में डालना. हो सकता है पाप के भय से न पीटा हो. मैं किसी भी शिक्षक को पंडीज्जी या सर जी कह के नहीं बुलाता था. सभी मेरे गाँव से ही थे अतः कुछ न कुछ रिश्ता होने के कारण मैं उसी संबंध सूचक शब्द से पुकारता था और आप की जगह तुम शब्द का प्रयोग करता था. “तुहिन न अबहिन पढ़ावत रल कि सब एक समान होन. चाहइ कौनउ जाति-धर्म क मनई होंइ. एही से हम एकरेकी पठइ देली.” पूरी कक्षा डरी हुई थी. लेकिन मैं निर्भीकता से बोला. कक्षा में तो बोल गया लेकिन अब डर इस बात का था कि कहीं यह बात भैया को पता चली तो जम के कुटाई होगी. हालाँकि कभी पीटा गया तो नहीं था लेकिन भैया का डर सदैव मेरे मन में भरा रहता था. तब तो सही गलत को समझ भी नहीं पता था. मैंने धर्मेन्द्र से पानी मंगाकर सही किया था या गलत तब मुझे नहीं पता था किन्तु अब सोचता हूँ वह मेरे क्रांति का पहला कार्य था. बड़ा हुआ धर्मों को समझने का प्रयास करने लगा तब समझ में आया ईश्वर मात्र जीव बनता है. मनुष्य, पशु, पक्षी फिर उन सबमें धर्म और जातियों का निर्धारण मनुष्य करता है. ईश्वर कोई एक शक्ति है जो अदृश्य है उसी को लोग अपने-अपने ढंग से पूजते हैं, उसकी इबादत करते हैं. मेरी शिखा, मेरा तिलक मेरे माथे पर रहे या न रहे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. ईश्वर भी समय के वश में है समय जो चाहता है वही करता है. यह जाति-धर्मों के लिए चिल्लाचोट मात्र मनुष्य करता है. मेरी यह समझ बन ही गई और इसी के आधार पर जीवन पथ बढ़ चला हूँ. विद्रोह और मैं दोनों भाई-भाई हैं. जहाँ कहीं अनुचित लगता है मैं तपाक से उठ खड़ा होता हूँ. इसके कई सारे नमूने विद्याद्य, महाविद्यालय और विशेष रूप से माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कुलपति के विरोध में प्रस्तुत हो चुके हैं. अनुचित के विपक्ष में बोलने पर कईयों ने मुझे सलाह भी दिया कि इस प्रकार मत बोला करो तुम्हारी छबि धूमिल होती है. मेरा एक ही उत्तर होता है अन्याय होने के बाद क्या छबि का आचार डालूंगा? मैं सीधी में जब पढ़ रहा था उस समय संघ से वास्ता हुआ. भारतीय संस्कृति की झलक और परम्पराओं के निर्वहन का बोझ देख मैं उस ओर आकर्षित हो गया. बचपन से इच्छा थी सरस्वती शिशुमंदिर में पढ़ने की किन्तु परिवार की आर्थिक समस्या थी नहीं पढ़ सका. यहाँ आकर एक अवसर मिला है इससे जुड़ने का सो जुड़ गया. एक लम्बा सा कुर्ता, माथे पर लाल लम्बा तिलक और सर पर लम्बी सी शिखा और वाणी में ओज. यह देख बजरंग दल के ज़िला अध्यक्ष ने मुझे सम्मिलित होने के लिए कहा मैं सम्मिलित हो भी गया. शाखा में प्रतिदिन उपस्थित होने लगा. बड़ा ही आनंद आता. मेरे जुड़ने के सातवें दिवस एक जन भाषण देने बैठे उनका नाम अभी मुझे स्मरण नहीं है. उन्होंने बहुत सारी बातें कहीं जो देशहित में थीं किन्तु एक बात मुझे सुई की भाँति चुभ गई. उन्होंने कहा मुसलमान और इसाईयों को इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं. ये म्लेच्छ होते हैं. इनका वध करने से पुण्य मिलेगा. उसी मंच पर मेरा उन महानुभाव से विवाद हो गया और संघ से मेरा संबंध भी विच्छेद. मैं मानव को मात्र मानव के रूप में देखता हूँ किसी जाति-धर्म के आधार पर नहीं. मैं जब भोपाल में था वहाँ एक मुस्लिम घर में ही रहता था. पूजा करता था और ज़ोर से तीन बार शंख बजाता था. मैंने वहीँ रहकर नमाज पढ़ना सीखा. कलमा तो ज़ुबानी याद हो गया. “लाइलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद-उ-रसुल्लाह” अवसर मिलते ही जुमे की नमाज पढ़ लेता हूँ. इस समय भी कई सारे मुसलमान मेरे घनिष्ट मित्र हैं. उन सबसे द्वेष कैसे कर सकता हूँ. मेरे कसी भी हिन्दू घर्म ग्रन्थ में नहीं लिखा है कि मैं मित्र से घात करूँ वरन रामचरित मानस में बाबा तुलसी दास ने लिखा है “जे न मित्र दुःख सुनी होहिं दुखारी. तिनहिं विलोकत पातक भारी.” मुसलमान मेरे मित्र हैं तो मैं उन्हें हानि कैसे पहुंचा सकता हूँ? अभी कुछ दिन पूर्व मेरे जन्मदात्री राजस्थान के पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मंदिर में दर्शन के लिए आये. आयु अधिक है अतः मेरा उनके साथ होना आवश्यक है. सो मैं भी उनके साथ था. पुष्कर दर्शन के पश्चात् मैंने उनसे अजमेर शरीफ़ दरगाह चलने का आग्रह किया. मैं डर रहा था पिता जी या माँ की डांट पड़ेगी किन्तु वे पुत्र की इच्छा को पूरी करने के लिए तैयार हो गये. हम अजमेर शरीफ़ गये. माता-पिता भी भीतर तक गये. वहां मुझे ढेर सारा फूल मिला. ईश्वर पर असीम श्रद्धा है फूल रख लिया. नवलगढ़ आया अपने कमरे में लीला बिहारी श्री कृष्ण के चरणों में वह फूल अर्पित कर दिया. मेरी माँ को अन्य जाति-धर्म के लोगों से समस्या होती है और पिताजी तो प्रख्यात पण्डित हैं उन्हें तो होना ही है. मैंने फूल कृष्ण के पास रख दिया और माता-पिता से बोला देखो अगर इसको अल्लाह से कोई दिक्कत होगी तो यह फूल को तुरंत ही लात मार देन चाहिए क्यों जो किसी से घृणा करता है उसे अपने पास नहीं रहने देता किन्तु तब से लेकर आज पन्द्रह दिन हो गये वे फूल सूख कर मुरझा गये हैं लेकिन कृष्ण के चरणों में ही पड़े हैं.

26.1.14

ये हवा जो चली है, महक लेने दो



ये हवा जो चली है महक लेने दो,
इसकी ख़ुशबू में धीमा ज़हर ना भरो.
लाखों जीते इसकी छुअन से यहाँ,
इसमें बिजली के कंपन का डर ना भरो.

कोई महलों में है, कोई फुटपाथ में,
जी रहें हैं सभी अपनी औक़ात में.
मत बनाओ झोपड़ियों पे ताजमहल,
अपने घर से किसी को बेघर ना करो.
ये हवा..................................

सबका दीन भी है, सबका ईमान है,
सबका अपना भी कोई एक भगवान् है.
इन कटारों में ज़ंग अब लग जाने दो,
अपने जंग में किसी की कबर ना भरो.
ये हवा...........................................

एक भटके हुए की, नज़र तुम बनो,
एक अँधेरे शहर की सहर तुम बनो.
ज़िंदगी है मिली सबको जी लेने दो,
किसी की जाँ को तुम उम्र-ए-बदर ना करो.
ये हवा................................................
 

5.1.14

जीवन के आधार : अंक

   यह वही समय है, जो शताब्दियों से प्रतिदिन इसी क्षण आता है| आज वही रविवार है, जो वर्षों से निरंतर हर छः दिन पश्चात् आ जाता है| यह वही 1 जनवरी है जो प्रत्येक 12 महीने पश्चात् द्वार खटखटाती है| यह वही 17वाँ वर्ष है, जो प्रयेक 100 वर्षों की यात्रा कर कई पीढ़ियों के आवागमन का दर्शक है| परिवर्तित हुआ है, तो मात्र सहस्त्र अंक 2000 का| हिन्दू वर्षानुसार गिना जाय तो मात्र 57 वर्ष पीछे चल रहा है, ‘ईसवीय वर्ष’| ये सारे अंक आ-आ कर जा चुके हैं| इन सभी अंको ने बहुत कुछ देखा, समझा और सुना है| ये शास्त्रों, बाइबिल, क़ुरानों, गुरु ग्रन्थ साहेबों के सबसे निकट के साक्षी हैं|
   ये साक्षी हैं, इन संविधानों के साथ मानव द्वारा किये गये हत्याओं के भी| ये साक्षी हैं, अनन्त समुद्र की उत्ताल विनाशक कई सुनामियों के| ये प्रमाण हैं, पृथ्वी की डगमगाहट से हुए यायावरों के विवशताओं की| इन्होनें प्रस्तुत किया है साक्ष्य, कई बार तीव्र वायु वेग, अति वृष्टि और दुर्भिक्षों से अनगिनतों संतापितों का| जब दिया होगा किसी रचनाकार ने पहला अंक 1| अपने जन्म के उस काल का भी साक्षी है, यह अंक| उसके पूर्व भी जीवन था, वह भी मनुष्य का, उस अनगिनत समय के भी साक्षी रहे होंगे, ये आजन्मित अंक| 1 के पश्चात् कभी 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 तक आये होंगे| सबके आगमन के अभिलेख हैं ये| 0 का आविष्कार तो बहुत बाद में हुआ| उस प्रथम दिन से आज तक इस 1 का अगणित बार दोहराव हो चुका है|
     1 से लेकर 9 तक की जितनी भी प्राकृत संख्याएँ हैं, वे कभी भी किसी परिवर्तन की कारक नहीं बनती| हर बार परिवर्तन करता है 0, जिसका अपना अकेले कोई अस्तित्व नहीं, कोई मूल्य नहीं, किन्तु किसी भी अंक का वामांगी होते ही, उसकी गणना इतनी बढ़ा देता है कि मनुष्य उस अधिकता की प्राप्ति के लिए विक्षिप्त हो जाता है|
      0 भी एक प्रकार की भीड़ है, और मनुष्य भी| दोनों में अंतर यह है कि 0 जितना बढ़ता जाता है, उतना ही शक्तिशाली होता है, किन्तु मनुष्य की भीड़ कई बार निरर्थक ही रह जाती है| इन भीड़ों की महत्ता और शक्ति तब और बढ़ जाती है, जब इनका नेतृत्व करने वाला 1 इनके साथ होता है| किसी भी 1 के पीछे जितने अधिक 0 होते हैं, वह एक उतना ही अधिक सामर्थ्यवान बनता जाता है|
   इस अतिआधुनिकता के समय में कभी-कभी विचारता हूँ, वह अंक विहीन जीवन कैसा रहा होगा? आज जब इन अंको का एक ही क्षण में अगणित बार उपयोग हो रहा है| ऐसी परिस्थिति में ये अंक स्वयं की उपयोगिता पर इठलाते है, या बैलों की भाँति निरंतर जुतते रहने के कारण क्षोभ हो रहा होगा? यह मेरे समझ से परे लगता है, किन्तु इन अंकों में इतनी शक्ति है, तभी तो इन्होने मनुष्य को अपने लिए एक अलग भाषा का नामकरण करने के लिए विवश कर दिया|
   ‘गणित’ भाषा का जन्म मात्र एक संयोग नहीं इन 0....9 जैसे महारथियों के साथ चलने की आवश्यकता है| यह इन 10 वीरों का पराक्रम या शौर्य ही है कि इनकी गूढ़ता को समझने के लिए मनुष्य ने संगणक, लघु संगणक या गणक इत्यादि जैसे कई यत्रों का आविष्कार किया| इन यत्रों के आविष्कार में भी इन्हीं महावीरों का योगदान रहा है| एक विशेष बात यह है कि इनकी अपनी कोई आकृति नहीं है, ये निराकार हैं, जो जिस वस्तु में इन्हें देखना चाहे, ये उसी में दिख जाते हैं| इनका किसी भी जीव या निर्जीव के साथ कोई भेदभाव नहीं है| ठोस, द्रव यहाँ तक कि अदृश्य वायु के भी लिए बराबर की मात्रा दर्शाते हैं|
   जब बात आती है, किसी नवीनता की तो विचार करता हूँ, इसमें नूतन क्या है? ये अंक जो कल भी मेरे साथ तन्द्रा विछोह से लेकर निद्रा प्रेम तक निरंतर गतिमान थे? व्यक्ति जो कुछ भी करता है, वह इन अंकों के हस्तक्षेप के बिना संभव ही नहीं है| प्राच्य और नवीन दोनों के मध्य वर्तमान का जो बंधन है, वह भी गणना से परे नहीं है| भविष्य वक्ता हों, या भूत शास्त्री सब इन अंकों के दास हैं| सब बार-बार इन्हीं 0...9 तक की परिक्रमा करते हैं| वृद्ध भूत हैं, जो वर्तमान से बहुत पूर्व में अस्तित्व में आ चुके होते हैं|

  ये अंक भी अब वृद्ध हो चुके हैं, पश्चात् इसके भी कार्य इन्हीं के माध्यम से हो पा रहा है| मैं जब भी कोई नवीनता खोजता हूँ, तो इन्हीं 0...9 के चारों ओर घूम कर रह जाता हूँ, फिर मुझे आभास होता है कि इन अनंत गामियों के अतिरिक्त कुछ भी न तो नवीन है, न प्राचीन| ये सभी सामूहिक रूप से अंत से अनंत की यात्रा पर हैं| ये तब भी नहीं रुकेंगे, जिस दिन समस्त भू-मंडल का विनाश हो जायेगा| ये उस काल के साक्षी बनेंगे, और नई पीढ़ी को अतीत के रूप में स्मरण कराते रहेंगे| ये आद्य से अंत तक के सबसे बड़े सहचर हैं| ये एक-एक क्षण के साक्षी हैं| ये विघटित एकता के पर्याय हैं|