शब्द समर

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21.11.13

ये दाग़दार शहर

ये शहर,
ये दाग़दार शहर
ये सहर,
ये दाग़दार सहर,
शहर भी रुलाया, 
सहर भी रुलाया, 
पोछने अश्क़ यहाँ
कोई न आया, 
शहर भी पराया,
सहर भी पराया .

जैसी थी शब, 
वैसे थे सब, 
न शहर में बसेरा,
न सहर में बसेरा, 

शब भी अँधेरी
सहर भी अँधेरा
सब में अँधेरा, 
शहर में अँधेरा, 

न शब आज मेरी
न सब आज मेरे
न शहर आज मेरा,
न सहर आज मेरी.

जा रही हूँ
तुम्हारे लिए
ये शब छोड़कर,
ये सब छोड़कर, 
ये शहर छोड़कर,
ये सहर छोड़कर.

19.11.13

दुनिया की दीवारें

तेरे सामने मैं, मेरे सामने तू,
बातों के बीच दीवारें हैं.
तू मुझसे जीती, मैं तुझसे जीता
दोनों दुनिया से हारे हैं.


मैं इश्क़ के आँगन में हूँ खड़ा,
तू उल्फ़त के दरवाज़े पर,
तू देखे मुझे, मैं देखूँ तुझे,
नज़रों के बीच कटारें हैं.


तू बँधी है रस्मों-रिवाज़ों से,
बेड़ी मुझमें जज़्बातों की.
तू मुझमें बसी, मैं तुझमें बसा,
लोगों पड़ी दरारे हैं.


तू लड़ बैठी तुफ़ानों से,
मैं जूझ रहा हैवानों से,
तू मेरी मंज़िल, मैं तेरा मंज़िल,
रस्ते में पड़े अंगारे हैं

13.11.13

मुझे मौन कर दो

मेरे कार्यों में ताला लगा दो,
मेरी ज़ुबान पर ताला लगा दो,
मेरे विचारों पर ताला लगा दो,
मेरी भावनाओं पर ताला लगा दो.

मुझे कुछ करने मत दो,
मुझे कुछ बोलने मत दो,
मुझे सोचने मत दो,
मुझे महसूसने मत दो.

मुझे लंगड़ा बना दो,
मुझे गूंगा बना दो,
मुझे हीन कर दो,
मुझे शून्य कर दो.

आप ऐसा कर सकते हैं क्योंकि आपका ओहदा मुझसे बड़ा है.

4.11.13

किस अर्थ का होगा नया बरस

तब से लेकर आज तलक
बीते कितने नये बरस,
कितने जी कर गुज़र गये
कितने जीने को रहे तरस.

कालचक्र का गतिमय काँटा
टिक-टिक चलता रहता है
आदि जहाँ से होता उसका
अन्त वहीं वह करता है.
नहीं एक क्षण स्थिर होता
नहीं फिजां का लेता रस
कितने जी कर गुज़र गये
कितने जीने को रहे तरस.

रवि से लेकर वार सनीचर
अगणित सात दिवस बीते
चैत्र से लेकर फाल्गुन तक
गणना में माह क्षण-क्षण रीते
मुल्ला, पंडित, पादरियों की
नहीं हुई कभी खाली मस
कितने जी कर गुज़र गये
कितने जीने को रहे तरस

बुध सामान है होली मेरी
रवि सामान दिवाली है
यथा भौम के ईद मनाता
जस शनि क्रिसमस खाली है
जस मैं हर दिवस मनाता
त्यौहार मनाता बिलकुल तस
कितने जी कर गुज़र गये
कितने जीने को रहे तरस.

हो यदि शुभ रवि-सोम मंगल
बुध-गुरु शुक्र यथावत हों
शनि शान्ति रहे बिन क्लेश-कलह
अर्थ जब मन संयत हो.
लिए व्यथा यदि आया भी
किस अर्थ का होगा नया बरस
कितने जी कर गुज़र गये
कितने जीने को रहे तरस.

20.10.13

सूना रविवार


आज फिर रविवार है
आज फिर होगी वह अपने
प्रेमी का आलिंगन.
आज फिर मैं
निहार रहा हूँ अपलक
फूलों की कलियों को
जैसे बिसूरता था उसे
जब
वह मेरे गोद में रखकर अपना सर
सोया करती थी.
यह सूरज तब भी साक्षी था
जब मुझमें थी पूरी हरियाली
उसके केशों की,
आज भी है यही प्रमाण,
जब बचा हूँ मात्र एक ठूंठ
उसके चले जाने से.
 

तब यह सूरज इतना तीखा नहीं था
पर आज इसकी किरणें
अर्जुन के तीर की तरह
भीष्म को छलनी कर रही हैं.

18.10.13

आज पिया से लड़ बैठी

आज पिया से लड़ बैठी मैं, 
वे रूठ कहीं परदेस निकल गये,
दिन भर से मैं अश्रु बहाऊँ,
विरह के मारे जिया विकल भये.

रूठे हैं, तो रूठे रहें वे,
क्या रोज़ मनाने मैं ही जाऊँ?
जाऊँ तो झिड़की सुनूँ,
और आँखों में ज्वाला ही पाऊँ.
अब जाऊँ भी किस डगर चलूँ मैं,
जाने वे किस देश निकल गये.
दिन भर से मैं अश्रु बहाऊँ,
विरह के मारे जिया विकल भये.


मन मेरा भी करता है,
मैं रूठूँ कभी और वे मनाएँ,
मैं हठ कर घर से निकल पडूँ,
वे प्यार से हाथ पकड़ ले आएँ.
उनके आलिंगन के प्यासे,
अधरों के रस तड़प के रह गये.
दिन भर से मैं अश्रु बहाऊँ,
विरह के मारे जिया विकल भये.

निकल गये तो निकल भी जाएँ,
अब मैं न मनाने जाऊँगी,
पहला बोल न बोलूँगी,
ये अपना प्रण तो निभाऊँगी.
प्रणय के इस माला में,
प्रेम के मोती अगल-बगल भये.
दिन भर से मैं अश्रु बहाऊँ,
विरह के मारे जिया विकल भये.

बिन चकोर को देखे तो,
चाँदनी जैसे बनी अमावस,
स्पन्दन में भय गूँजता,
कुछ कर ना बैठें आज क्रोध वश.
प्रेम भरे इस गुस्से में,
मेरे मन के भाव विकल भये.
दिन भर से मैं अश्रु बहाऊँ,
विरह के मारे जिया विकल भये.

ए री सखी! जा तू उनसे कह,
व्यथित नेत्र के अविरल धार,
उनके एक बोल पर ही,
निछावर करूँ सारा अभिसार.
विरह नयन ऐसे बरसे हैं,
भीग कपोल आज काजल भये.
दिन भर से मैं अश्रु बहाऊँ,
विरह के मारे जिया विकल भये.

15.10.13

अन्तः-मन

एक रात मैं स्वयं से बात कर रहा था, बहुत सारी बातें हुईं, उनमें जो मुझे सार्थक लगीं वह मैं अपने पाठकों तक प्रेषित कर रहा हूँ.

मन-मैं दुनिया में हूँ, यही क्या कम है,
           लेकिन क्यों हूँ, इसका भ्रम है?
अन्तः-तुम दुनिया में हो, यही क्या कम है,
         तुम हो क्योंकि साथ तुम्हारे श्रम है.
मन- उद्देश्य बड़ा या जीवन,
          भटकूँ कब तक मैं वन-वन?
अन्तः ध्येय ही तो जीवन का मूल है,
            लक्ष्यहीन साँस चुभती जैसे शूल है.
मन - है कौन दिशा जिस ओर चलूँ मैं,
            जीवन की सार्थकता पर पलूँ मैं?
अन्तः-तुम्हारी अभिरुचि जहाँ पुकारे,
          दौड़े जाओ उसके द्वारे.
मन- घिसटने की है उम्र कहाँ तक,
            थकने लगा हूँ पहुँच यहाँ तक?
अन्तः-संतोष न होगा ह्रदय जब तक,
          भागते फिरोगे जीवन में तब तक.
मन- तो क्या मैं संतुष्टि को वरण करूं,
           जीवन का विस्तरण करूं?
अन्तः-हैं मार्ग तुम्हारे पास सभी,
         बस इनको समझा करो कभी.
मन-तो क्या मारूं मैं भावनाओं को,
          कुचल दूं उच्चाकांक्षाओं को?
अन्तः-है क्षमता तो कर डालो,
         पर पहले समझो और भालो.
मन- क्यों जालों में उलझाते हो,
         स्पष्ट नहीं बतलाते हो?
अन्तःजीवन ही एक पहेली है,
         समझो इसको तो सहेली है.
मन-अब क्या मैं तुमसे बात करूं,
        अपना समय बरबाद करूं?
अन्तः-बस यही मुझे समझाना था,
        आगे तुम्हें बढ़ाना था.
        न लो किसी से तुम सलाह,
       बस पकड़ लो जीवन की राह.
       पुष्प न मिले तो शूल ही सही,
       जीवन में एक भूल ही सही.
       हर भूल में एक शिक्षा होगी,
      और कठिन परीक्षा होगी.
      पर मार्ग तुम्हारा अपन होगा,
      नहीं किसी से दबना होगा.