शब्द समर

विशेषाधिकार

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7.3.11

मै बड़ा हो गया









लेटा था छत पे,
ताक रहा था आसमान को,
एक तारा चलता दिखाई दिया,
मुझे मेरा बचपन दिखाई दिया.
नीचे उतरा दरवाज़ा खोला,
तेज़ रोशनी थी बल्ब की,

बचपन उसी में खो गया,
एहसास हुआ की मै बड़ा हो गया.




1.3.11

क्यों करे कोई मुझे पसंद

मुझे नहीं करता कोई पसंद
क्योंकि मै नहीं जानता
कपट और छल-छंद.
मैं नहीं बनाता अनायास ही
किसी के जननी या भगिनी के साथ
अनैतिक सम्बन्ध गालियों से
नहीं कसता फब्तियां
किसी राह चलती बाला पर,
मेरी माता ने नहीं पिलाई घूंटी
कभी अपशब्द की.

4.2.11

माँ सुनो तुम्हारे आंसू नहीं ललकार चाहिए


माँ सुनो तुम्हारे आँसू नहीं ललकार चाहिए,
देश को बचाने की पुकार चाहिए,
मुझे तुम्हारे हाथों से तलवार चाहिए|

अक्षय-निर्भय पूतों की
मत भूलो तुम माता हो,
जिनके सीने से अक्सरतूफ़ान ही टकराता हो|
इन वीरों को माँ तेरी यलगार चाहिए|

कर तिलक हमारे माथे पर
,
हाथों में तुम शस्त्र दो,
कर दूँ शत्रु धराशायी एक क्षण में,
मुझको वह ब्रह्मास्त्र दो,
माँ तेरी एक बार मुझे फुफकार चाहिए|

शूरवीरों का मस्तक
,
झुका कोई क्या पता है,
तेरे चरणों के सिवा माँ,
अपना कौन विधाता है,
इन चरणों की माँ हमे रफ़्तार चाहिए|

तुम हो माता शूरवीर की
,
भावुकता का त्याग करो,
रग-रग में तुम मातु हमारे,
तेज़ लपट की आग भरो,
तुम्हारी आँखों से ज्वाला-अंगार चाहिए|

नहीं लजाऊँ दूध तुम्हारा
,
रिपु की छाँव जो पड़ जाये,
कर दूँ छिन्न-भिन्न मै उसको,
अगर पाँव भी दिख जाये,
मुझे तुम्हारी इच्छा का गुबार चाहिए|

एक हाथ तोड़ मैं उसके
,
दूजे में रख जाऊँगा,
मस्तक होगी पड़ी धरा पर,
धड़ स्वान तक पहुँचाऊँगा,
एक बार तुम्हारे हुक्म का उद्गार चाहिए|

ममता के आँचल से माता
,
अब हमको तुम मुक्त करो,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी,
शास्त्रों से संयुक्त करो,
पन्ना जैसे मोह का तिरस्कार चाहिए|

तुम शक्ति दुर्गा की
,
चामुण्डा भी तुम्हीं हो माँ,
राजपूताने की पद्मिनी हो,
लक्ष्मीबाई तुम्ही हो माँ,
तुम्हारे भीतर सुनामी-सा अब ज्वार चाहिए|

3.2.11

अबके बरस हम जइबे गवनवा

अबके बरस हम जइबै गवनवा रे
सुन ले रे सजनी
घोड़ी में चढ़ी के आइहैं सजनवा रे
सुन ले रे सजनी

१) करु मोर सबरे सजू सिंगार
हम चउके मा जइबै,
पियउ के संग परदेस निकरि फेर
कबहूँ न अइबै
भरि दे हाथ मोरी चूड़ी-कंगनवा रे
२) छूटी पिरितिया मायरि से अब
सासुर से लागी
अपने पराये लागें घर-परिवार मन
विरति सी जागी
पियउ के सुधि करि सिहरे रे मनवा रे
सुन ले रे सजनी
३)लाल-लाल चुनरी औ लाल सेनुरवा
लाल मोर अंगवा
लाल रंग डोली औ लाल फूल-माला संग
लाल बजनहवा
लाल रंग पिया संग निकारे परनवा रे
सुन ले रे सजनी
४) चारी जना के कन्धा की गाड़ी पे
सवारी हम करबै
छोड़ी पुरान हम नये घर जात मन
तनिकौ न डरबै
पाइ मोहे संग मुसुकाये सजनवा रे
सुन ले रे सजनी
५) राम-नाम के विदाई गीत होई जब
घर हम छोड़बै
परछन करिहैं गोती-परिवार जब
घर से निकरबै
केहू आँखी आँसू केहू गाई मंगल गनवा रे
सुन ले रे सजनी
६) माया त रोवें खिरकी में जाइ
बाबा रोवें दुअरवा
बहिनी त रोवे कोठरी लुकाइ
भैया रोवें ओसरवा
प्यारी-सुकुमारी किहिस सून अगनवा रे
सुन ले रे सजनी
७) दक्खिन दिसि एक नदी के किनार
जहाँ मोर ससुररिया
उजरि-उजरि लगे उहाँ के जहान
नहीं मानुस के डेरिया
रहबे अकेले लेई आपन परनवा रे
सुन ले रे सजनी
८) चौखुट घर में निमुठ ओसारी जहाँ
हम सोई जइबै
रीती-रिवाज जब से पियउ निभैहें
तब तक हम सुसतैबै
लाल लपट बनी अइहें सजनवा रे
सुन ले रे सजनी

23.1.11

असीम की आकांक्षा

जी करता है, समेट लूं
अनंत सागर को अपने आलिंगन में,
किन्तु मेरी बाहें नहीं हैं उतनी बड़ी.
जी करता है, पी लूं
सारा पानी बरसते हुए बादलों का,
किन्तु नहीं फैलता मेरा मुंह समाहित करने को उन्हें.
जी करता है, नाप लूं
पूरी धरती को एक पग में,
किन्तु वामन जैसे नहीं हैं मेरे पाँव.
मैं अनंत ब्रह्माण्ड में
करोड़ों के बीच बिखरा हुआ एक
जीव हूँ.

12.1.11

मीडिया में परिवर्तन वक़्त कि ज़रुरत

आज मीडिया में कई नए प्रयोग किये जा रहे हैं. ये प्रयोग ही मीडिया में परिवर्तन की राह प्रशस्त कर रहे हैं. इसी सिलसिले में स्टार न्यूज़ के राष्ट्रीय मामलों के संपादक दीपक चौरसिया से खास बातचीत की हमारे विकल्प संवाददाता जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी' ने. प्रस्तुत है बातचीत के मुख्य अंश....
प्रश्न- क्या आपको लगता है कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया अपने उद्देश्यों से भटक रहा है?
उत्तर-
नहीं ऐसा नहीं है. इलेक्ट्रोनिक मीडिया अपने जगह पर सही कार्य कर रहा है. आज का दर्शक जो पसंद कर रहा है, इलेक्ट्रोनिक मीडिया उससे भी बेहतर देने की कोशिश कर रहा है. हाँ कुछ परिवर्तन हो रहे हैं जो वक़्त की ज़रुरत है.
प्रश्न- इलेक्ट्रोनिक मीडिया इन्फोटेंमेन्ट की ओर बढ़ रहा है, इसके पीछे क्या कारण है?
उत्तर-
नहीं. मीडिया अपने उद्देश्यों के साथ है. हाँ, हर कोई खबरों के आलावा मनोरंजन चाहता है. एक ही चीज़ देखकर दर्शक बोर ना हो इसलिए खबरों के आलावा फिल्म या मनोरंजनात्मक चीजें दिखाई जाती हैं.
प्रश्न- धोनी के शादी की जो आपने रिपोर्टिंग की वो पत्रकारिता के किस विधा के अंतर्गत आती है?
उत्तर-
यह पत्रकारिता की कोई अलग विधा नहीं है, धोनी या सानिया मिर्ज़ा ऐसे लोग हैं जिन्हें देश की आधे से ज्यादा जनता पसंद कराती है. इनके शादी के खबर को लोग उतनी ही दिलचस्पी से देखते हैं जीतनी अन्य खबरों को.
प्रश्न- फिल्म खट्टा-मीठा के प्रमोशन के लिए आपने अपने चैनल के न्यूज़ रूम का रंग बदल कर उपयोग किया
था. यह पत्रकारिता के किस परिवर्तन को दर्शाता है?
उत्तर-
मैनें एक दिन पहलवान सुशिल कुमार का साक्षात्कार लिया था, इसमें मैं उनसे पहलवानी करता दिखाई देता हूँ. एक चित्र हज़ार शब्द के बराबर होता है. फिल्म खट्टा-मीठा या किसी भी फिल्म के प्रमोशन के लिए न्यूज़ रूम को वह स्वरुप इसलिए दिया जाता है जिससे दर्शक उस फिल्म से भली-भांति परिचित हो सके.
प्रश्न- स्टार एंकर हंट के ज़रिये जिनका चयन किया गया, उनकी विशेष खूबियाँ क्या थीं?
उत्तर-
स्टार एंकर हंट में हमने उन लोगों का चयन किया था जिन्किब आवाज़ दर्शक को पसंद आये, शब्दों का उच्चारण सही हो, भाषा का ज्ञान हो, व्यक्तित्व आकर्षक हो और क्षणिक निर्णय क्षमता हो जिससे पी सी आर से मिल रहे निर्देशों को समझ सकें.
प्रश्न- आपने कहा कि एंकर बनने आते हैं और रिपोर्टर बनकर रह जाते हैं, इसका क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
देखिये टीवी के स्क्रीन पर कि ख्वाहिश सभी में होती है. जो व्यक्ति एंकर बनने के लिए मीडिया में आता है, उसे एंकरिंग कि बेसिक जानकारियां जो मैनें स्टार एंकर हंट के लिए बताईं, नहीं रहतीं. जब पता चलता है तो वह अपने अन्दर उन क्षमताओं का विकास नहीं कर पाता इसलिए रिपोर्टर तक ही सीमित रह जाता है.
प्रश्न- प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में आप किसे बेहतर मानते हैं?
उत्तर-
दोनों अपने-अपने जगह पर श्रेष्ठ हैं. फ़िलहाल तो वेब मीडिया भी अपने पाँव जमा चुकी है फिर भी प्रिंट या इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. इससे साबित होता है कि कोई भी माध्यम श्रेष्ठ या निम्न नहीं है. हाँ, ये है कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया जनता तक ज़ल्दी पहुंचता है और प्रिंट देर से लेकिन अपने पाठकों को वह सारी जानकारियां उपलब्ध कराता है

18.12.10

मै नितांत अकेला

बचा हूँ
मै नितांत अकेला,
क्योंकि मैनें लड़ी थी
लड़ाई बर्चस्व की.
मैं,
पीछे नहीं हटा
रचने में षड़यंत्र उनके विरुद्ध
जो रहते थे शेष नाग की तरह
छत्र किये हुए
मेरे सर पर.
मैं पीछे नहीं हटा
प्रयोग करने में चारों नीतियां
(साम, दाम, दंड, भेद)
जो वास्तव में होती हैं शत्रु के लिए.
मैनें अपनाई आंग्लनीति
तोड़ने को उनका घर
जो थे मेरे मध्य रात्रि के भी
दुखानुगामी
मैं करना चाहा विनाश
अपने ही परिजनों का
क्योंकि मैं चाहता था
स्थापित करना स्वयं को सबके बीच.
मैनें चलाए तलवार से भी घातक
शब्दबाण,
कर दिया उनका सर
धड से अलग
और तड़पने को छोड़ दिया उन्हें
सूखे बरगद की तरह.
उनके सहचरों को बनाया अपना मित्र,
उनका शत्रु,
तोड़ दिया उनकी ही कमर
जिनके रीढ़ के सहारे
मै खुद खड़ा था.
मेरे इस चाल को समझ गये मेरे
कृत्रिम हितैषी.
वे समझ गये,
कल हमसे भी करेगा यही-
छल, कपट, धोखा, फरेब, जालसाजी,
धकेल देगा हमें भी
विषैले कुएं में
मीठे पानी का लालच देकर.
वे समझ गये,
सहज प्रवृत्ति मानव की
जो करता है किसी एक से
कुटिलता निज स्वार्थ हेतु
वह नहीं छोड़ता किसी को भी
अपने चक्रव्युहू से.
सब कर गये मुझसे किनारा
मैं
अब बचा हूँ बे सहारा.
मेरे हाथ-पांव अब ढीले हो गये हैं,
मेरी विषैली वाणी
अब घी उडेलना चाहती है,
किन्तु नहीं है कोई सुनने वाला.
मेरी दसों उंगलियाँ एकत्र होकर
गिडगिडाना चाहती हैं,
पर कोई अब मुझे दुत्कारता भी नहीं
लोग अब मुझे अब ताकते तक नहीं
जबकि मैं पुनः बैठना चाहता हूँ
उन्ही के बीच
जिन्हें मैंने बना लिया था अपना अनुगामी
कुटिलता से.
लेकिन मैं समझ गया
नहीं देखेंगे वे मेरी तरफ
क्योंकि
मैं
हूँ
स्वार्थी, कपटी, छली, विश्वासघाती,
आस्तीन का सांप, पाखंडी, घमंडी,
अनंत दुर्गुणों का आलय.
और न जानें क्या-क्या........
मुझे
नहीं था पता,
मेरे दुष्कर्मों की सजा
मेरे देखते यहीं मिल जाएगी.
अब मैं क्या करूँ
मैं
हो गया हूँ
असहाय,
नितांत अकेला.