शब्द समर

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2.2.14

ब्राह्मण का विधर्मी प्रेम

जितेन्द्र देव पाण्डेय 'विद्यार्थी'
भाई मैं हिन्दू हूँ. तिस पर उच्च कुल गोत्र ब्राह्मण. बचपन से घर-गाँव और आस-पास के परिवेश से संस्कार मिले हैं कि बिना नहाए-पूजा पाठ किये अन्न-जल ग्रहण ना करूँ. किसी निम्न जाति के व्यक्ति के छुए अन्न-जल से परहेज करूं. अन्य जाति तो ठीक किन्तु चमारों और धैकारों (डोम) लोगों को छुऊँ भी नहीं अन्यथा अपवित्र हो जाऊंगा. मुसलमानों से कोसों दूरी बनाकर रहूँ, ये लोग बड़े ही कट्टर और कसाई होते हैं, हिन्दुओं को पसंद नहीं करते. 
मुझे जो बातें लोग बताते थे, जिनसे परहेज करने कि बातें मेरे कानों में पड़ती थीं वे लोग भी मुझसे यही बात कहते थे. "नाहीं बाबू हो तोहरे बड़े मनई लाग हमरन क छुअल खाब त तोहार जाति चलि जाई. हमरन से दुरिहाँ रहल कर." जिन्होंने किया मैं उनका नाम नहीं लिखूंगा किन्तु मैंने अपनी आँखों से देखा है कि एक केवट के घर में उसके आटे को लात से कुचल कर फेक दिया गया, उसके चूल्हे में पानी डाल दिया गया था. मैं बचपन से भक्त रहा हूँ. ईश्वर के प्रति सदैव से मेरी श्रद्धा रही है. मैं जब छठी कक्षा में था तभी गीता का पाठ किया था. उसमें पता नहीं क्या लिखा था किन्तु वह मेरा धार्मिक ग्रन्थ है इसलिए उसका पूरा अध्ययन किया था. रामचरित मानस की चौपाइयां तो अभी भी कंठस्थ हैं. विद्यालय में अन्ताक्षरी होती तो कोई मुझे परास्त नहीं कर सकता था. नलकूप पर मैं नहा रहा होता था तो कोई भी खैरवार जाति के घर का व्यक्ति उसके घेरे में खड़ा भी नहीं हो सकता था. विद्यालय में पानी पीते समय चमारों के लड़के दस कदम दूर होते थे. मुसलमान तो मेरे गाँव में नहीं थे हाँ पड़ोस के गाँव समदा में हैं उन्हें पता नहीं किन-किन शब्दों से चिढ़ाते थे. लम्बी सी शिखा और त्रिपुंड तिलक पूरे गाँव और विद्यालय में मेरी निशानी थी. स्मरण आता है कक्षा सातवीं में था. मेरे गाँव के ही एक शिक्षक (नाम नहीं लिखुंगा क्योंकि विवाद का कारण बन सकता है) सामाजिक विज्ञान पढ़ा रहे थे. उसमें था कि किसी से छुआछूत का भाव नहीं रखना चाहिए, सबको मिलजुल कर रहना चाहिए. चाहे कोई भी जाति-धर्म का व्यक्ति हो सब एक समान हैं. जो शिक्षक मुझे पढ़ा रहे थे उन्होंने मुझसे पानी मंगाया. प्रतिदिन जब भी उन्हें या किसी भी शिक्षक को प्यास लगती वे मुझे या मेरे जैसे ही किसी सवर्ण या तथाकथित पानी वाली जाति के ही बच्चे से पानी मंगाते और पीते. इस दिन भी उन्होने मुझसे पानी मंगाया. मैंने धर्मेन्द्र कुमार चर्मकार को भेज दिया वह पानी लाया और पंडीज्जी को देने लगा. तड़ाआअक एक तमाचा उसके गाल पर गूंजा. वह वहीं खड़ा रहा मैं डर गया. मेरा कान पकड़कर उन्होंने उठाया. हम तोहसे पानी मंगाए रली न? वे मुझ पर जोर से गरजे. वे मुझे पीट नहीं सकते थे क्योंकि इसका एक कारण तो मुझे पता है जब मैं अनामांकित था तभी से एक होनहार बच्चे के रूप में पूरे विद्यालय और गाँव में मेरा बर्चस्व था. दूसरा आज तक नहीं पता. क्योंकि किसी बच्चे का होनहार होना उसे उसकी पिटाई से बचा ले यह बात गले नहीं उतरती. मेरा परिवार दबंग भी नहीं है न मेरे माता-पिता हममे से किसी भाई -बहन का पक्ष लेकर विद्यालय में लड़ने ही जाते थे फिर भी? अभी लिखते समय एक कारण ध्यान में आ रहा है वह यह कि कहा जाता है मैं उनका पौपूज्य ब्राह्मण हूँ. उनके घर-ख़ानदान की लड़कियों से मेरे खानदान में विवाह होता है. पौपूज्य ब्राह्मण पर हाथ उठाने का मतलब था सात पीढ़ियों को नर्क में डालना. हो सकता है पाप के भय से न पीटा हो. मैं किसी भी शिक्षक को पंडीज्जी या सर जी कह के नहीं बुलाता था. सभी मेरे गाँव से ही थे अतः कुछ न कुछ रिश्ता होने के कारण मैं उसी संबंध सूचक शब्द से पुकारता था और आप की जगह तुम शब्द का प्रयोग करता था. “तुहिन न अबहिन पढ़ावत रल कि सब एक समान होन. चाहइ कौनउ जाति-धर्म क मनई होंइ. एही से हम एकरेकी पठइ देली.” पूरी कक्षा डरी हुई थी. लेकिन मैं निर्भीकता से बोला. कक्षा में तो बोल गया लेकिन अब डर इस बात का था कि कहीं यह बात भैया को पता चली तो जम के कुटाई होगी. हालाँकि कभी पीटा गया तो नहीं था लेकिन भैया का डर सदैव मेरे मन में भरा रहता था. तब तो सही गलत को समझ भी नहीं पता था. मैंने धर्मेन्द्र से पानी मंगाकर सही किया था या गलत तब मुझे नहीं पता था किन्तु अब सोचता हूँ वह मेरे क्रांति का पहला कार्य था. बड़ा हुआ धर्मों को समझने का प्रयास करने लगा तब समझ में आया ईश्वर मात्र जीव बनता है. मनुष्य, पशु, पक्षी फिर उन सबमें धर्म और जातियों का निर्धारण मनुष्य करता है. ईश्वर कोई एक शक्ति है जो अदृश्य है उसी को लोग अपने-अपने ढंग से पूजते हैं, उसकी इबादत करते हैं. मेरी शिखा, मेरा तिलक मेरे माथे पर रहे या न रहे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. ईश्वर भी समय के वश में है समय जो चाहता है वही करता है. यह जाति-धर्मों के लिए चिल्लाचोट मात्र मनुष्य करता है. मेरी यह समझ बन ही गई और इसी के आधार पर जीवन पथ बढ़ चला हूँ. विद्रोह और मैं दोनों भाई-भाई हैं. जहाँ कहीं अनुचित लगता है मैं तपाक से उठ खड़ा होता हूँ. इसके कई सारे नमूने विद्याद्य, महाविद्यालय और विशेष रूप से माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में कुलपति के विरोध में प्रस्तुत हो चुके हैं. अनुचित के विपक्ष में बोलने पर कईयों ने मुझे सलाह भी दिया कि इस प्रकार मत बोला करो तुम्हारी छबि धूमिल होती है. मेरा एक ही उत्तर होता है अन्याय होने के बाद क्या छबि का आचार डालूंगा? मैं सीधी में जब पढ़ रहा था उस समय संघ से वास्ता हुआ. भारतीय संस्कृति की झलक और परम्पराओं के निर्वहन का बोझ देख मैं उस ओर आकर्षित हो गया. बचपन से इच्छा थी सरस्वती शिशुमंदिर में पढ़ने की किन्तु परिवार की आर्थिक समस्या थी नहीं पढ़ सका. यहाँ आकर एक अवसर मिला है इससे जुड़ने का सो जुड़ गया. एक लम्बा सा कुर्ता, माथे पर लाल लम्बा तिलक और सर पर लम्बी सी शिखा और वाणी में ओज. यह देख बजरंग दल के ज़िला अध्यक्ष ने मुझे सम्मिलित होने के लिए कहा मैं सम्मिलित हो भी गया. शाखा में प्रतिदिन उपस्थित होने लगा. बड़ा ही आनंद आता. मेरे जुड़ने के सातवें दिवस एक जन भाषण देने बैठे उनका नाम अभी मुझे स्मरण नहीं है. उन्होंने बहुत सारी बातें कहीं जो देशहित में थीं किन्तु एक बात मुझे सुई की भाँति चुभ गई. उन्होंने कहा मुसलमान और इसाईयों को इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं. ये म्लेच्छ होते हैं. इनका वध करने से पुण्य मिलेगा. उसी मंच पर मेरा उन महानुभाव से विवाद हो गया और संघ से मेरा संबंध भी विच्छेद. मैं मानव को मात्र मानव के रूप में देखता हूँ किसी जाति-धर्म के आधार पर नहीं. मैं जब भोपाल में था वहाँ एक मुस्लिम घर में ही रहता था. पूजा करता था और ज़ोर से तीन बार शंख बजाता था. मैंने वहीँ रहकर नमाज पढ़ना सीखा. कलमा तो ज़ुबानी याद हो गया. “लाइलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद-उ-रसुल्लाह” अवसर मिलते ही जुमे की नमाज पढ़ लेता हूँ. इस समय भी कई सारे मुसलमान मेरे घनिष्ट मित्र हैं. उन सबसे द्वेष कैसे कर सकता हूँ. मेरे कसी भी हिन्दू घर्म ग्रन्थ में नहीं लिखा है कि मैं मित्र से घात करूँ वरन रामचरित मानस में बाबा तुलसी दास ने लिखा है “जे न मित्र दुःख सुनी होहिं दुखारी. तिनहिं विलोकत पातक भारी.” मुसलमान मेरे मित्र हैं तो मैं उन्हें हानि कैसे पहुंचा सकता हूँ? अभी कुछ दिन पूर्व मेरे जन्मदात्री राजस्थान के पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मंदिर में दर्शन के लिए आये. आयु अधिक है अतः मेरा उनके साथ होना आवश्यक है. सो मैं भी उनके साथ था. पुष्कर दर्शन के पश्चात् मैंने उनसे अजमेर शरीफ़ दरगाह चलने का आग्रह किया. मैं डर रहा था पिता जी या माँ की डांट पड़ेगी किन्तु वे पुत्र की इच्छा को पूरी करने के लिए तैयार हो गये. हम अजमेर शरीफ़ गये. माता-पिता भी भीतर तक गये. वहां मुझे ढेर सारा फूल मिला. ईश्वर पर असीम श्रद्धा है फूल रख लिया. नवलगढ़ आया अपने कमरे में लीला बिहारी श्री कृष्ण के चरणों में वह फूल अर्पित कर दिया. मेरी माँ को अन्य जाति-धर्म के लोगों से समस्या होती है और पिताजी तो प्रख्यात पण्डित हैं उन्हें तो होना ही है. मैंने फूल कृष्ण के पास रख दिया और माता-पिता से बोला देखो अगर इसको अल्लाह से कोई दिक्कत होगी तो यह फूल को तुरंत ही लात मार देन चाहिए क्यों जो किसी से घृणा करता है उसे अपने पास नहीं रहने देता किन्तु तब से लेकर आज पन्द्रह दिन हो गये वे फूल सूख कर मुरझा गये हैं लेकिन कृष्ण के चरणों में ही पड़े हैं.

26.1.14

ये हवा जो चली है, महक लेने दो



ये हवा जो चली है महक लेने दो,
इसकी ख़ुशबू में धीमा ज़हर ना भरो.
लाखों जीते इसकी छुअन से यहाँ,
इसमें बिजली के कंपन का डर ना भरो.

कोई महलों में है, कोई फुटपाथ में,
जी रहें हैं सभी अपनी औक़ात में.
मत बनाओ झोपड़ियों पे ताजमहल,
अपने घर से किसी को बेघर ना करो.
ये हवा..................................

सबका दीन भी है, सबका ईमान है,
सबका अपना भी कोई एक भगवान् है.
इन कटारों में ज़ंग अब लग जाने दो,
अपने जंग में किसी की कबर ना भरो.
ये हवा...........................................

एक भटके हुए की, नज़र तुम बनो,
एक अँधेरे शहर की सहर तुम बनो.
ज़िंदगी है मिली सबको जी लेने दो,
किसी की जाँ को तुम उम्र-ए-बदर ना करो.
ये हवा................................................
 

5.1.14

जीवन के आधार : अंक

   यह वही समय है, जो शताब्दियों से प्रतिदिन इसी क्षण आता है| आज वही रविवार है, जो वर्षों से निरंतर हर छः दिन पश्चात् आ जाता है| यह वही 1 जनवरी है जो प्रत्येक 12 महीने पश्चात् द्वार खटखटाती है| यह वही 17वाँ वर्ष है, जो प्रयेक 100 वर्षों की यात्रा कर कई पीढ़ियों के आवागमन का दर्शक है| परिवर्तित हुआ है, तो मात्र सहस्त्र अंक 2000 का| हिन्दू वर्षानुसार गिना जाय तो मात्र 57 वर्ष पीछे चल रहा है, ‘ईसवीय वर्ष’| ये सारे अंक आ-आ कर जा चुके हैं| इन सभी अंको ने बहुत कुछ देखा, समझा और सुना है| ये शास्त्रों, बाइबिल, क़ुरानों, गुरु ग्रन्थ साहेबों के सबसे निकट के साक्षी हैं|
   ये साक्षी हैं, इन संविधानों के साथ मानव द्वारा किये गये हत्याओं के भी| ये साक्षी हैं, अनन्त समुद्र की उत्ताल विनाशक कई सुनामियों के| ये प्रमाण हैं, पृथ्वी की डगमगाहट से हुए यायावरों के विवशताओं की| इन्होनें प्रस्तुत किया है साक्ष्य, कई बार तीव्र वायु वेग, अति वृष्टि और दुर्भिक्षों से अनगिनतों संतापितों का| जब दिया होगा किसी रचनाकार ने पहला अंक 1| अपने जन्म के उस काल का भी साक्षी है, यह अंक| उसके पूर्व भी जीवन था, वह भी मनुष्य का, उस अनगिनत समय के भी साक्षी रहे होंगे, ये आजन्मित अंक| 1 के पश्चात् कभी 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 तक आये होंगे| सबके आगमन के अभिलेख हैं ये| 0 का आविष्कार तो बहुत बाद में हुआ| उस प्रथम दिन से आज तक इस 1 का अगणित बार दोहराव हो चुका है|
     1 से लेकर 9 तक की जितनी भी प्राकृत संख्याएँ हैं, वे कभी भी किसी परिवर्तन की कारक नहीं बनती| हर बार परिवर्तन करता है 0, जिसका अपना अकेले कोई अस्तित्व नहीं, कोई मूल्य नहीं, किन्तु किसी भी अंक का वामांगी होते ही, उसकी गणना इतनी बढ़ा देता है कि मनुष्य उस अधिकता की प्राप्ति के लिए विक्षिप्त हो जाता है|
      0 भी एक प्रकार की भीड़ है, और मनुष्य भी| दोनों में अंतर यह है कि 0 जितना बढ़ता जाता है, उतना ही शक्तिशाली होता है, किन्तु मनुष्य की भीड़ कई बार निरर्थक ही रह जाती है| इन भीड़ों की महत्ता और शक्ति तब और बढ़ जाती है, जब इनका नेतृत्व करने वाला 1 इनके साथ होता है| किसी भी 1 के पीछे जितने अधिक 0 होते हैं, वह एक उतना ही अधिक सामर्थ्यवान बनता जाता है|
   इस अतिआधुनिकता के समय में कभी-कभी विचारता हूँ, वह अंक विहीन जीवन कैसा रहा होगा? आज जब इन अंको का एक ही क्षण में अगणित बार उपयोग हो रहा है| ऐसी परिस्थिति में ये अंक स्वयं की उपयोगिता पर इठलाते है, या बैलों की भाँति निरंतर जुतते रहने के कारण क्षोभ हो रहा होगा? यह मेरे समझ से परे लगता है, किन्तु इन अंकों में इतनी शक्ति है, तभी तो इन्होने मनुष्य को अपने लिए एक अलग भाषा का नामकरण करने के लिए विवश कर दिया|
   ‘गणित’ भाषा का जन्म मात्र एक संयोग नहीं इन 0....9 जैसे महारथियों के साथ चलने की आवश्यकता है| यह इन 10 वीरों का पराक्रम या शौर्य ही है कि इनकी गूढ़ता को समझने के लिए मनुष्य ने संगणक, लघु संगणक या गणक इत्यादि जैसे कई यत्रों का आविष्कार किया| इन यत्रों के आविष्कार में भी इन्हीं महावीरों का योगदान रहा है| एक विशेष बात यह है कि इनकी अपनी कोई आकृति नहीं है, ये निराकार हैं, जो जिस वस्तु में इन्हें देखना चाहे, ये उसी में दिख जाते हैं| इनका किसी भी जीव या निर्जीव के साथ कोई भेदभाव नहीं है| ठोस, द्रव यहाँ तक कि अदृश्य वायु के भी लिए बराबर की मात्रा दर्शाते हैं|
   जब बात आती है, किसी नवीनता की तो विचार करता हूँ, इसमें नूतन क्या है? ये अंक जो कल भी मेरे साथ तन्द्रा विछोह से लेकर निद्रा प्रेम तक निरंतर गतिमान थे? व्यक्ति जो कुछ भी करता है, वह इन अंकों के हस्तक्षेप के बिना संभव ही नहीं है| प्राच्य और नवीन दोनों के मध्य वर्तमान का जो बंधन है, वह भी गणना से परे नहीं है| भविष्य वक्ता हों, या भूत शास्त्री सब इन अंकों के दास हैं| सब बार-बार इन्हीं 0...9 तक की परिक्रमा करते हैं| वृद्ध भूत हैं, जो वर्तमान से बहुत पूर्व में अस्तित्व में आ चुके होते हैं|

  ये अंक भी अब वृद्ध हो चुके हैं, पश्चात् इसके भी कार्य इन्हीं के माध्यम से हो पा रहा है| मैं जब भी कोई नवीनता खोजता हूँ, तो इन्हीं 0...9 के चारों ओर घूम कर रह जाता हूँ, फिर मुझे आभास होता है कि इन अनंत गामियों के अतिरिक्त कुछ भी न तो नवीन है, न प्राचीन| ये सभी सामूहिक रूप से अंत से अनंत की यात्रा पर हैं| ये तब भी नहीं रुकेंगे, जिस दिन समस्त भू-मंडल का विनाश हो जायेगा| ये उस काल के साक्षी बनेंगे, और नई पीढ़ी को अतीत के रूप में स्मरण कराते रहेंगे| ये आद्य से अंत तक के सबसे बड़े सहचर हैं| ये एक-एक क्षण के साक्षी हैं| ये विघटित एकता के पर्याय हैं|

31.12.13

लाचार कुत्ते की जिंदगी


लाचार कुत्ते की ज़िन्दगी
आज सुबह घने कोहरे के बीच मैं अपने स्कूटी से चला आ रहा था। कोहरे के बारे में क्या बयान करूँ बस ये समझ लीजिये कि पाँच मीटर की दूरी पर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। अचानक मेरी गाड़ी के नीचे कोई दब जाने की उम्मीद से कूद पड़ा। मेरी गाड़ी उससे ये टकराई, टकराई, टकराई, इस स्थिति में ही थी कि मैंने ब्रेक लगा दिया। सामने देखा तो एक कुत्ता था। ठण्ड से कुड़कुड़ाता हुआ एक दम मरियल सा दीख रहा था। देखने से लग रहा था शायद इसका कोई मालिक नहीं है, बस यूँ ही आवारा है। होटलों और बड़े भोजों के दोने-पत्ते चाटने वाला। गरीब, बेबस, लाचार। हड्डियाँ तो आसानी से गिनी जा सकती थीं।
मेरे ब्रेक लगाने के बाद मैंने हॉर्न बजाया, यह कहने के लिए कि “हट जाओ मुझे जाने दो” किन्तु वह नहीं हटा। मैं खड़ा हो गया। आदतन मैंने उसे प्रणाम किया और पूछा, "क्यों जानबूझ कर मेरी गाड़ी के नीचे आते हो?
उसके चेहरे और आँखों ने मुझे बताया कि मैं अपनी निर्धनता से तंग आ गया हूँ। जिस किसी के दरवाज़े पर जाता हूँ वही दुत्कार देता है। अब कहीं भी सुकून से रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं मिलता। होटलों पर चाय की पत्तियाँ खा-खा कर मेरी यह दशा हो गई है। रोटी की बजाय मुझे लोगों की गालियाँ, उनकी मार और दुत्कार मिल रही हैं। मैं रात में किसी के घर के सामने बैठ कर भौंकता हूँ कि शायद इस घर के मालिक को मुझ पर तरस आ जाए कि मैंने रात भर उसके घर की रखवाली के लिए अपनी नींद गवाई है, रात भर भौंका है, तो एक टुकड़ा रोटी नसीब ही हो जाय, लेकिन ठीक उसके उल्टा होता है। उस घर का मालिक मुझे जूते से मार कर यह कहकर भगा देता है कि हरामी ने मुझे रात भर भौंक कर सोने नहीं दिया। हर जगह मेरा हवन करते हाथ जल जाता है। बाकी मौसम तो किसी तरह बीत गये लेकिन यह हड्डियों को कँपा देने वाली ठण्ड बर्दाश्त नहीं हो रही है। किसी के घर आश्रय माँगने जाऊँगा तो मार खाऊँगा। ठण्ड में थोड़ी भी चोट लगती है तो बहुत दर्द होता है। मेरा अपना भी स्वाभिमान है। कब तक किसी और की दुत्कार सहन करूँ?
मैं उसके सामने निःशब्द था। क्या बोलता? क्या उसे दिलाशा देता? क्या समझाता? मेरी दार्शनिक-सैद्धान्तिक  बातों से न उसका दर्द मिटता, न उसकी ठण्ड जाती; या हो सकता है एक-दो दिन उसमें जोश भर जाता, लेकिन दो-चार दिनों बाद तो उसकी वही हालत होने वाली है। फिर वह इसी तरह किसी वाहन के नीचे कूदेगा, या ट्रेन के नीचे सो जाएगा। मैंने उसे एक सुझाव दिया। मेरे सुझाव में निर्दयता थी। मैंने उसे कहा देखो जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है। उसे न मेरा भाषण बदल सकता है न डॉक्टर की दवा। मैं भी एक दिन मर जाऊँगा, तुम भी मरने ही आये हो। अभी मरे नहीं तो मर ही जाओगे, लेकिन मुझे ऐसा लगता है, “मुझे और तुम्हें अभी और जीना है, इसलिए तो मेरी गाड़ी तुमसे नहीं टकराई।“ अन्यथा तुमसे टकराकर दोनों मर जाते। तो जब बच ही गये हैं, तो क्यों न कुछ और सार्थक कार्य कर लिया जाय।
वैसे मैं तुम्हें मरने से नहीं रोकूँगा, क्योंकि मैं स्वयं इतना सक्षम नहीं कि तुम्हारा पालन-पोषण कर सकूँ, और किसी के पास ज़िल्लतें सहने के लिए भेज नहीं सकता।
तुम्हारे पास दो रस्ते हैं। या तो मिले हुए इस जीवनदान का फ़ायदा उठाकर तुम सशक्त बनो, या हारकर मर ही जाओ। अगर फ़ायदा उठाओगे, तो हो सकता है तुम भी बड़े मालिकों के कुत्तों की तरह ब्रेड-बटर खाने को पाओगे। ठण्ड से बचने के लिए विशेष इन्तज़ामात होंगे। अपना खाना-पीना छोड़ मालिक तुम्हें हगाने-मुताने भी ले जाएगा। अपने बच्चे और तुममे एक पैसे का फ़र्क नहीं आने देगा। अपने बच्चे के लिए तो आया रख लेते हैं, लेकिन अपना शौक पूरा करने के लिए तुम्हारी टट्टी-पेशाब भी ख़ुद ही साफ़ करगा। यहाँ तक कि ठण्ड से बचाने के लिए तुम्हें दो-चार घूँट ब्रैंडी भी पिलाएगा। यहाँ तक कैसे पहुँचना है, यह मुझे भी नहीं पता क्योंकि मेरी भी स्थिति तुमसे थोड़ी-सी अच्छी है, बाकी मैं भी तुम्हारे ही जैसा हूँ। इसीलिए तो तुम्हें प्रणाम किया था। तो इसका मार्ग तुम्हें ही तलाश करना होगा।
यदि दूसरा वाला रास्ता अपनाना चाहते हो, अर्थात् मरना चाहते हो, तो भाई एक सुझाव दूँगा कि किसी दो पहिया वाहन से मत टकराना। इन कमबख्तों में इतनी जान नहीं होती कि वो किसी और की जान ले सकें। ये दो पहिया वाहन बस ख़ुद की ज़िन्दगी जीती हैं। उनकी इतनी औक़ात ही नहीं कि वो किसी को मार सकें। मुझे ही देखो तुम्हें सामने देखते ही मैंने ब्रेक लगा दिया।
अगर तुम्हें मरना है, तो कार के नीचे कूदो, बस के नीचे कूदो, ट्रक के नीचे कूदो। ये पैसे वाले लोग होते हैं, या पैसे वालों की गाड़ियाँ होती हैं। दूसरों की जान ले लेना, तो इनका बाँयें हाथ का खेल है। मुम्बई के एक बड़े अभिनेता की ख़बर तो पढ़ी ही होगी, अपनी अमीरी और शराब के नशे में चूर, उसने फूटपाथ पर सोये लोगों को ही कुचलकर मार डाला। इनके नीचे दबोगे न, तो एक बार में ही प्राण निकल जायेंगे। तड़पना भी नहीं पड़ेगा। दो पहिया के नीचे कूदोगे, तो तुम तो नहीं मरोगे, हाँ मैं मर सकता हूँ। अगर मैं नहीं मरा तो लोग तुम्हारी भावनाओं को तो समझेंगे नहीं कि तुम ही मरना चाहते थे, इसलिए कूद गये, बल्कि वे हमें इसलिए पीटना शुरू कर देंगे कि हम अंधों की तरह गाड़ी चलाते हैं। दूसरे पुलिस केस होगा। तुम आत्महत्या करना कहते हो यदि यह पुलिस को पता चला तो तुम्हारे ऊपर भी केस होगा। चोट लगेगी डॉक्टर के पास जाना पड़ेगा। इसका मतलब समझते हो। पुलिस और डॉक्टर के पास पहुँचने के बाद जितना तुमने और मैंने ज़िन्दगी भर कमाया नहीं होगा न वो इनके केस के निपटारे और मरहम पट्टी में ख़त्म हो जाएगा। दोनों की ज़िन्दगी मौत से बदतर हो जायेगी। तो भाई मरने की इच्छा तुम्हारी और ज़िन्दगी नर्क बनेगी हमारी। ऐसा ज़ुल्म हम न करो।
तुम्हारा मरना या जीना तुम्हारे ऊपर छोड़ता हूँ, मुझे जाने दो। कितनी भी ठण्ड है, पर नौकरी पर जाना है। और उस कुत्ते को उसी हालत में छोड़ मैं गाड़ी का सेल्फ स्टार्ट दबाया और कोहरे का आनन्द लेते हुए गन्तव्य की ओर रवाना हो गया। कुत्ते ने क्या किया यह तो शायद यह तो पता न चले, क्योंकि अखबार और न्यूज़ चैनल तो आज़म खान के भैंस और प्रधानमंत्री की भतीजी की चीज़ें खोने की ख़बरें प्रकाशित करते हैं, आवारा कुत्तों की नहीं। वरना इस ठण्ड में कितने लोग ठिठुर कर मर रहे हैं...

25.12.13

जीवन के आयाम

ज़िंदगी तो ज़िंदगी है 'विद्यार्थी'
ख़ुशी की हो 
या ग़म की,
सूखे की हो
या नम की,
अधिक की हो 
या कम की,
सबसे एक ही शब्द निकलता है 
!चाह!

मज़ा तो मज़ा होता है 'विद्यार्थी'
दिन का हो 
या शाम का,
पानी का हो
या जाम का,
फ़ुर्सत का हो 
या काम का,
सबसे एक ही शब्द निकलता है 
!वाह!

दर्द तो दर्द होता है 'विद्यार्थी'
अपनों का हो
या परायों का,
आग का हो 
या हवाओं का,
बहारों का हो 
या खिज़ाओं का,
सबसे एक ही शब्द निकलता है
!आह!

15.12.13

HE की जननी SHE

अंग्रेज़ी में दो शब्द हैं. एक SHE उसी के तथा उसी के बारबर HE और हिंदी में एक शब्द है 'वह'.  तीनों का तात्पर्य किसी तीसरे व्यक्ति की ओर इंगित करना होता है. SHE जो कि स्त्री की ओर इंगित करता है और HE पुरुष की ओर किन्तु 'वह' उभयलिंगी है. SHE और HE की भांति 'वह' कोई लैंगिक विभेद उत्पन्न नहीं करता. पश्चात् इसके भी हिंदी भाषी राज्यों में पुरुष प्रधान और स्त्री दलित समाज है. यह समस्या तो देश में है ही और धीरे-धीरे इससे मुक्ति भी मिल रही है. मैं अभी बात करने जा रहा हूँ SHE और HE की. इसने भी प्रत्येक भारतीय बोलचाल की भाषा में अपनी गहरी घुसपैठ कर ली है.

एक दिन की बात है हम एक समीक्षात्मक कार्य में बैठे थे. हमारे कुछ साथियों ने एक बहुत ही सुन्दर प्ररचना (Design) का निर्माण किया था जो कि उनके सहूलियत वाली भाषा अंग्रेज़ी में थी. अंग्रेज़ी इसलिए क्योंकि उनके अनुसार हिंदी उन्हें कठिन लगती है, बचपन से अंग्रेज़ी ही उनकी सहेली रही है. अपना दुःख-दर्द व्यक्ति सहेलियों से ही तो कहता है और भाषा भी एक शेली से कम नीं होती अतः वे भी अपना सारा लेखन अंग्रेज़ी में करते हैं.

बात आगे बढ़ता हूँ. हुआ यह कि उस प्ररचना में SHE शब्द का और इसी के कर्मवाचक शब्द HER का उपयोग प्रत्येक स्थान पर किया गया था जबकि यह जिन लोगों के लिए बनाया गया है उसमें HE या इसका कर्मवाचक HIS भी बराबर का भागीदार है. मैंने SHE और HER के साथ ही HE और HIS को बराबर के अस्तित्व में लाने का सुझाव दिया.

मेरे इस सुझाव से एक साथी ने बहुत ही सार्थक तर्क दिया कि जब यह समाज मात्र HE को ही हर स्थान पर आगे रखता था और SHE का कोई अस्तित्व ही नहीं आने देता था तब तुमने ऊँगली क्यों नहीं उठायी या तब तुम्हें आपत्ति क्यों नहीं हुई?  उस समय तो मैं नहीं बोल पाया था किन्तु अभी यह कह रहा हूँ कि मैं SHE के साथ ही कई HE का भी बराबर नेतृत्व करता हूँ जिसमें कई HE लोगों को अपने होने पर शंका होती है या SHE को प्रधान देख कर उन्हें कष्ट होता है. (यहाँ यह बात भी कही जा सकती है कि यदि मुझे आपत्ति नहीं और मैं ऐसे लोगों का नेतृत्व करता हूँ तो उनसे क्यों नहीं करवा सकता? ऐसी परिस्थिति में मैं मात्र यही कह सकता हूँ कि अपनी मान्यताएं मैं किसी पर थोपने का अधिकारी नहीं हूँ. हाँ उन्हें प्रेरित अवश्य कर सकता हूँ. मानसिक परिवर्तन में समय लगता है तो हो सकता है कि एक दिन वे भी इस मान्यता को स्वीकार कर लें.)

मेरे साथी के इस तर्क से कई लोगों को मुझ पर हंसने का अवसर भी मिला. संभवतः मेरा यह सुझाव उन्हें किसी हास्य की उपज समझ में आई. कई लोगों को तो यह भी लगा कि कोई हास्य कवि काव्यपाठ कर रहा है कुछ लोगों को हास्य अभिनेता तो कईयों को मैं विदूषक लगा. लोगों को हंसी आई और हंसे भी. दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने वाले अपनी औक़ात में आ गये. उनकी औक़ात यही है कि वे किसी का सम्मान नहीं करते, अगर सामने वाले को नीचा दिखाने का अवसर मिल जाय तो.

मैंने जिन्हें यह सुझाव दिया उन्होंने इसे पूरी विनम्रता से स्वीकार किया और इसे अमल में लाने का विश्वास भी दिलाया. कोयल की यह मधुरता कौवों के कांय-कांय में दब के रह गई. फिर एक ओर से आवाज़ आई कि HE भी SHE से ही उत्पन्न होता है. मैं कोई सस्वती पुत्र बीरबल तो हूँ नहीं कि किसी प्रश्न को त्वरित उत्तरित कर सकूं किन्तु इस शब्द ने मुझे बल दिया. क्योंकि जब यह वाक्य आया तब सभी ओर मात्र अट्टहास चल रहे थे. कोई किसी को सुनने के लिए तैयार ही नहीं था. जिसके मुख से यह ध्वनि आई थी वह भी SHE ही थीं और यह ध्वनि एकदम दबी-कुचली लग रही थी. मेरे कानों में पड़ते ही मुझे बल मिला और मैं ज़ोर से चिल्लाते हुए बोला "सृष्टि का यह अद्दभुत संयोजन है कि प्रत्येक HE की उत्पत्ति SHE से ही होता है S+HE.  
फिर क्या था हर जगह बीच में ताली बजाने वाले तालिबाज़ों ने मेरी बात पर भी ताली बजा दी.