शब्द समर

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27.10.14

एक और मक़सूद

चिपों-चिपों| ओ विद्यार्थी! तू भी आ जा हमारी मीटिंग शुरू होने वाली है
आमतौर पर अपने लिए तुम-ताम या तू-तकार वाले शब्द मुझे पसंद नहीं है| जैसे ही ऐसे शब्द मेरे लिए कोई निकालता है मेरा आत्मसम्मान इतना तेज़ ठोकर खाता है कि उसे महीनों भूख नहीं लगती किन्तु यहाँ ऐसा शब्द निकालने वाला कोई मनुष्य नहीं एक गधा था| अब गधे से अपने लिए सम्मान की अपेक्षा करना मुझे स्वयं को उसके बराबर खड़ा होने जैसा लगा अतः सुनी-अनसुनी करके मैं आगे बढ़ने लगा|
"तुम गधे के गधे ही रह जाओगे|" किसी की बुलंद आवाज़ सुनाई दी| अपनी यह प्रशंसा मुझे बहुत कड़वी लगी किन्तु खून का घूँट पीकर रह गया और जैसे ही उधर देखा पता चला वास्तव में वह गधे को ही कहा जा रहा था| यह भालू साहब थे| उन्होंने आगे गधे को समझाते हुए कहा, "मूर्ख! ये मनुष्य हैं| मनुष्य, सृष्टि का सबसे समझदार प्राणी होता है| उन्हें सम्मान से बुलाओ|" आइये विद्यार्थी जी| आज हम वन्य प्राणी एक सभा का आयोजन कर रहे हैं| इसमें सभी प्राणियों को आमंत्रित किया गया है, मनुष्य को छोड़कर किन्तु आप इधर से जा ही रहे हैं तो थोड़ा समय हमारे लिए भी निकाल लीजिये बड़ी कृपा होगी|
"ये भोजन बचा हुआ है, तुम न खाते तो जानवरों को खिला देते| अब तुम आ ही गये हो तो खा लो"| मनुष्य द्वारा कही जाने वाली यह उक्ति मुझे तुरंत स्मरण हो आई| नज़र दौड़ाया तो चारों ओर जानवर ही जानवर| बच के निकल पाना खट्टा अंगूर जान पड़ा, अतः उन पर कृपा कर दी|
यह बात है सुंदर वन के उजाड़ प्रदेश की| जो ठूँठ ही ठूँठ, चट्टानें ही चट्टानें, रेत ही रेत से सौन्दर्यमान हो रहा था| सूर्य का प्रकाश डामर और सीमेंट की सड़कों पर ऐसे फैला था कि नज़र पड़ते ही भौतिकी का परावर्तन का सिद्धांत याद आ रहा था| कुछ ऐसे भी स्थान थे जो टॉम अल्टर के सर की तरह दिख रहे थे| वहाँ कहीं-कहीं एक्का-दुक्का पेड़ रहे होंगे| उन्हें खोजने का मतलब था गंजी खोपड़ी में बाल ढूँढना जिसके लिए मुझे विशेष लेंस की ज़रूरत पड़ती अतः मैंने उसकी जहमत नहीं उठाई
चीता, बाघ, खरगोश, कोबरा, बाज, गृद्ध सभी जानवर और पक्षी बारी-बारी से आ रहे थे| फिर हाथी जी आये और अंत में महाराजा शेर साहब आयेतब बैठक प्रारम्भ हुई| एक-दूसरे का परिचय लिया जाने लगा| सभी प्राणियों में मैं थोड़ा अलग दिख रहा था| सबकी प्रश्नवाचक दृष्टि को समझते हुए बन्दर जी आगे आये| महाराज! यह मेरा पोता है| इसकी पूँछ अब नहीं है| समय परिवर्तित हो गया है| ये लोग अब हमसे अधिक सोच-विचार कर लेते हैं|
ओह तो यह मनुष्य है? शेर ने दहाड़ लगाई|
बंदर को लगा शेर मुझे अपना शिकार समझ रहा है अतः गिड़गिड़ाते हुए बोला जी| जी लेकिन है हमारी ही तरह|
आप डरें नहीं बंदर जी मैं इन्हें नहीं खाऊंगा| अभी ये हमारे अतिथि हैं| मेरी तो जान में जान आई|
कहिये आज की बैठक का विशेष मुद्दा क्या है? शेर महोदय ने हाथी से पूछा?
इस दौरान कुछ कबूतर शेर के पास जा जा कर अपनी तस्वीरें उतारने लगे|
महाराज! सभी जानवर मनुष्यों द्वारा उनके लिए किये जा रहे बर्ताव से बहुत दुखी हैं| मुझे तो काटो तो खून नहीं| भाई मेरी ही शिकायत शुरू| मैं मन ही मन सोच रहा था| महाराज सभी मनुष्य अपनी करनी की तुलना हम जानवरों से कर हमे बदनाम कर रहे हैं| हाथ जी शिकायत भरे लहजे में बोल रहे थे|
अच्छा वो कैसे? मनुष्य तो हमसे अधिक गुणवान, शक्तिशाली कहे जाते हैं फिर जानवरों से तुलना करने की क्या आवश्यकता आन पड़ी? वैसे किस-किस जानवर से अपनी तुलना करते है? शेर ने आश्चर्य से पूछा|
महाराज! हाथी महोदय ने गिनाना प्रारम्भ किया| मैं अपने आराध्यों और इष्ट देवताओं के स्मरण में लग गया| मुझे लगने लगा बेटा विद्यार्थी आज तो तू गया| अम यार भालू से कोई बहाना कर निकल लिए होते तो| गये बेटा तुम तो हे लीला बिहारी मेरी रक्षा करो सवा मन प्रसाद कल के कल तुम्हारे पास होंगे कहो तो स्टाम्प पर लिख दूँ लेकिन अभी मेरी रक्षा करो|  तब तक हाथी की आवाज़ सुनाई देने लगी-
दूसरों के इशारों पर चलने और मुफ़्त में खाने वाले को-कुत्ता,
अपनी ताक़त या दमख़म दिखाने वाले को-शेर या चीता,
धमकी देने वाले को-गीदड़,
ग़रीबी और गंदगी में जीने पर मजबूरों को-सूअर,
डर जाने वाले को-भीगी बिल्ली,
छोटे बच्चे को-मेमना,
चरित्र बदलने वाले को-गिरगिट,
झूट-मूठ रोने और आँसू बहाने वाले को-घड़ियाल,
अपना दीमाग प्रयोग न करने वाले को-गधा,
काम न करने वाले को-बैल,
चुपके से वार करने वाले को-भेड़िया,
डर के छिप जाने वाले को-चूहा,
दूसरों की बात की नकल करने वाले को-पिट्ठू तोता,
मोटे तगड़े को-गैंडा या भैंसा,
आलसियों को-अजगर
कमज़ोर और आम इन्सान को-बकरा
उत्पात मचाने वाले को-बन्दर,
मुग़ल-ए-आज़म फ़िल्म में "जब प्यार किया तो डरना क्या" गाने के समय अनारकली (मधुबाला) को देखकर जो प्रतिक्रिया अकबर (पृथ्वीराज कपूर) की थी मुझे वही प्रतिक्रिया अभी शेर की आँखों में दिख रही थी| इतनी छिछोरी जाति होती है इंसानों की मैंने तो सोचा भी नहीं था? दरोगा-ए-ज़िन्दान पकड़ लो इस अहमक आदमी को| शेर की गर्जना ने पूरे उजड़े जंगल के ठूठों में हलचल पैदा कर दी|
दुहाई हो हुज़ूर दुहाई| मैंने हुज़ूर की ताउम्र सेवा की है| यह मेरा पोता है हुज़ूर इसे माफ़ करें| बंदर की आँखें छलछला आईं|

महाराज ऐसा लगता है भगवान् अब हमें और अधिक धरती पर नहीं रखना चाहता| भालू बोला| ओह तभी शायद इन्सान मंगल ग्रह तक पहुँच गया अब हम सबको शायद वहीं भेजा जायेगा| गीदड़ ने अपनी राय प्रकट की|
कैसे? गीदड़ की बात को अनसुनी करते हुए शेर ने भालू से पूछा|
वह ऐसे महाराज कि भगवान् ने हम सभी जानवरों के गुण तो इंसानों में भर दिए, तो अब हम जानवरों का इस धरती पर क्या काम?
इंसान इन्सान को खाने लगा है, इन्सान कपड़े फेक अब नंगा रहने लगा है, इन्सान अपने किसी भी रिश्ते के साथ जहाँ चाहता है वहीं खुले में मैथुन कर लेता है, और तो और अब इन्सान अपने माँ-बाप को भी बूढ़ा हो जाने पर गलियों में भीख माँगने के लिए छोड़ देता है और घर में आया को नौकरी पर रख लेता है| भगवान् ने हम सब के साथ छल किया है महाराज वह All in one (एक में सभी) की अवधारणा रच कर हम सबसे मुक्ति पा लेना चाहता है|
मुझे तो लगता है इंसान ने भगवान् को कुछ खिला-पिला कर अपनी ओर मिला लिया है| यह आवाज़ थी कुत्ते की| मैं रोज़ देखता हूँ हज़ारों का प्रसाद चढ़ाते हुए| इसीलिए तो इन्सान वनों को काटकर सभी जानवरों का घर उजाड़ रहा है और भगवान् है कि खामोश बैठा है|
फिर क्या किया जाय? मामला तो बहुत ही गम्भीर है| भगवान् का इंसानों के साथ मिल जाने वाली बात से तो मैं सहमत नहीं हूँ लेकिन इन इंसानों से कैसे निपटा जाय? हाथी ने प्रश्न उठाया|
एक ही तरीक़ा है| शेर गर्जा|
क्या? वनराज की ओर सभी की आशामय दृष्टि उठी|
शेर अपनी उन्मत्त रक्तीली आँखों से मुझे देखते हुए बोला,
"एक और
मक़सूद|"
मेरी आँख खुली तो पसीने से तर-ब-तर था|

11.10.14

रेगिस्तानी आँखें

चित्र-साभार-गूगल 

नौरा! नौरा! सुनो नौरा!
तुम चली जाओगी तो मेरी ज़िन्दगी अधूरी रह जाएगी|वह नौरा के पीछे पुकारता हुआ दौड़ रहा है, और नौरा है कि पैर सर पर रखे ऐसे सरपट भागी जा रही है, जैसे कोई शेर उसके पीछे लगा हो|नौरा आगे बहुत दूर तक देख रही हैवह केवल नौरा के क़दमों को| नौरा भाग रही हैवह दौड़ रहा है| नौरा के भागने की अपनी कोई गति नहीं है, वह जितना तेज़ दौड़ता है, नौरा भी उतनी ही तीव्र गति से भागती है| दोनों के पैर निःसंकोच निरन्तर गति से गुरुत्वाकर्षण के साथ ठिठोली कर रहे हैंउस निर्जन में दो लोगों के इस तीव्र पदचाप से रास्ते धूल उड़ा-उड़ा कर आश्चर्य व्यक्त करने लगे|
उसके पुकारने की ध्वनि अब चिल्लाहट में बदल गई| नौराआआ! नौराआआ! सुनोंओओओ नौराआआआ! मैं तुम्हारे बिना अधूरा रह जाऊँगाआआआआ|

अन्ततः बचाव ने आक्रमण पर विजय पाई, और नौरा उसकी आँखों से धुँधली होती हुई बिल्कुल ओझल हो गई| उसकी आँखों से सागर बह निकला, और अपने दोनों हाथों को सर पर रखते हुए वह वहीं ढेर हो गया|

कुछ दिनों बाद रेगिस्तानी ज़िन्दगी लिए, वह अपने कमरे में बैठा हुआ है| उसकी आँखें तपती दोपहरी की भाँति एकदम लाल हो कर ऐसी सूख गई हैं, जैसे जेठ माह की मिट्टी और पलकें हवा भरे गुब्बारे की तरह फूली हुई हैं| अचानक उसकी रेगिस्तान में एक लहर उठी

दरवाज़े पर दस्तक?

ओह! ज़िन्दगी के अन्तिम पड़ाव पर कौन हो सकता है? मेरा पानी तो सूख चुका है, फिर यह तरंग कहाँ से आई? यही सोचते हुए उसने दरवाज़ा खोला| आँखें एकाएक मृगमरीचिका की तरह चमक उठीं| काँपते हुए होठों से एक शब्द निकला

नौरा?

नौरा उसके गले से ऐसे चिपक गई, जैसे अमरबेल आम के पेड़ में| उसकी आँखों का समन्दर ज्वार-भाँटे की तरह हिलोरें मारने लगा| दोनों चिपके हुए हैं| समुद्र के सभी जीवों में रसता आ गई है| सभी में हलचल होने लगी है| लहरें ऐसे उछालें मार रही हैं, जैसे आसमान को भिगो देना चाहती हैं| तभी नौरा का रंग भी समुद्री होने लगा, और एकाएक उसकी पकड़ एकदम ढीली हो गई

नौरा के हाथ में एक काग़ज़ है|

मेरे प्रिय,

प्रेम को त्याग, प्रेम की खोज में, प्रेम से दुत्कारी, वापस प्रेम की बाँहों में दम तोड़ने की अभिलाषा में एक असफल और अधूरी प्रेमिका|

अभागिनी

नौरा

उसके समुद्र से तेज़ धार बह निकली, और फिर वापस वह रेगिस्तान हो गया|

29.9.14

लोकगीत-रसीले नैना

चित्र साभार-गूगल 
इस गीत की प्रथम पंक्ति मैंने अपने बाल्यकाल में अपनी दीदी से सुना था| आज अचानक याद आ गया तो बाकी की पंक्तियाँ स्वतः ही लिख डाली| हो सकता है प्रमुख गीत के शब्दों से थोड़ा-बहुत इसका संबंध हो रहा हो तो इसके प्रमुख रचनाकार से क्षमाप्रार्थी हूँ|

सखी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना
गुइयाँ पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना
रसीले दोऊ नैना, नशीले दोऊ नैना
रानियाँ पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना

मोरे नैनों का रस छलके, जब चालूँ मैं हलके-हलके
मैं कमरिया से बलखाऊँ, सम्हाले भी सम्हले ना
प्यारी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना


पनघट पर बइठे छैला, हाथों लेके ढेला
मोरि गगरी कैसे बचाऊँ, उका काम है फोरते रहना 
बीबी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना

कहने को मोरे जेठा, दुअरा में आके बैइठा
ओके लालच से डर जाऊँ, छुपा के मोहे रखना
बिट्टी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना

मोर बालम बड़े छबीले, मोर बाँह कभी न ढीले
उनके बोसे में घुल जाऊँ, पनिया की सुद्ध रहे ना
लाला पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना


दिन चार बची जिंदगानी, मैं रोकूँ कइसे पानी
किस-किस से नजर बचाऊँ, बैरी ही मोरे नैना
रजनी पनिया कैइसे जाऊँ रसीले दोऊ नैना

13.9.14

बारह सौ छब्बीस बटा सात-विषय-संक्षेप

कहानी-परमात्मा का कुत्ता                लेखक-मोहन राकेश     नाट्य रूपांतरण-जितेन्द्र मित्तल
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१२२६/७ मोहन राकेश द्वारा लिखित कहानी ‘परमात्मा का कुत्ता’ का नाट्य रूपांतरण है| अगर पैनी नज़र से देखा जाय तो कुत्ता और आम आदमी में गहरी समानता है| इसी समानता को ध्यान में रखते हुए मोहन राकेश ने यह कहानी लिखी| साधु सिंह जो कि अधेड़ उम्र का हो चुका है और पिछले छः वर्षों से अपने ज़मीन के लिए सरकारी दफ़्तर के चक्कर काट रहा है किन्तु न तो आज तक उसे उसकी ज़मीन मिल पाई न ही उसका मुआवज़ा| इतने दिनों में अगर उसे कुछ मिला था तो वह था एक नाम| एक ऐसा नाम जिससे उसे बेहद घृणा हो गई है| वह नाम है १२२६/७ जो कि उसकी फ़ाइल का नाम है और अब वह इसी नाम से जाना जाता है|
१२२६/७ एक बेबाक, बेतुका, बदज़बान और कथित समाज का असम्बद्ध व्यक्ति है| १२२६/७ फैज़ अहमद फैज़ का आवारा कुत्ता है जो एक टुकड़ा रोटी की आशा में कभी इस बाबू के पास तो कभी उस बाबू के पास चक्कर कटता रहता है किन्तु वह टुकड़ा उसे कभी नज़र नहीं आता| अंत में जब उसे एहसास होता है कि वह ‘परमात्मा का कुत्ता है और वह भौंक सकता है तो फिर भौंकता है और इतना भौंकता है कि मालिकों की चूलें हिल जाती हैं|
१२२६/७ एक आम आदमी के जीवन का संघर्ष और आक्रोश का प्रतिबिम्ब है| १२२६/७ छः वर्षों से निरंतर चल रहे संघर्ष, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में समाज की विसंगतियों, सरकारी कार्यालयों की अफ़सरवादी मनोवृत्ति, लालफीताशाही और झूठी बनावट के साथ-साथ अमानवीय कृत्यों और भ्रष्टाचार के प्रति वितृष्णा एवं झुंझलाहट का प्रारूप है जो अफ़सरों के सामने तीखी लय में तेज़ धार के साथ प्रकट होती है| चपरासी और बाबुओं के साथ का बर्ताव एवं उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया रंगमंचीय शक्ति को बढ़ाती है|
१२२६/७ व्यक्ति की जिजीविषा और उसके लिए दिन भर की भटकन, शरीर के रक्तचाप की भाँति इतनी तीव्र है कि उसे आसानी से महसूस किया जा सकता है| परिवेश-बोध और व्यवस्था के प्रति असंतोष, आदमी के आदमी न रह जाने कि व्यथा, मात्र संख्या वह भी लम्बी, निरर्थक रह जाने कि पीड़ा, आम आदमी के आक्रामकता के संकेत को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है| व्यक्ति अपनी पहचान अपने परिजनों द्वारा दिए हुए नाम से करना चाहता है किन्तु यहाँ साधु सिंह अपने नाम का अस्तित्व बचाने कि जद्दोजहद में लगा हुआ है| १२२६/७ अस्तित्व की लड़ाई के लिए अपना वही रूप प्रस्तुत करता है जो रूप ‘निराला’ का ‘कुकुरमुत्ता’ ‘गुलाब’ के सामने| 
१२२६/७ वर्तमान समाज की एक लम्बी लड़ाई है जिसे न तो शब्द बाँध सकते हैं, न अंक, न ही जीवन| यह लड़ाई हर उस समय छिड़ सकती है जब मनुष्य को किसी और के कारण ख़ुद के शून्य होने का बोध होने लगेगा|

11.9.14

*संतुलित भोजन*

आज एक शिक्षक से बात हो रही थी|  उस घटना को मैंने एक कहानी का रूप देने के प्रयास किया है| इसमें नाम  तो काल्पनिक है किन्तु यह पूरे भारत वर्ष की एक अकाट्य सच्चाई है
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कक्षा में विज्ञान के शिक्षक पढ़ा रहे हैं "बच्चों आपको संतुलित भोजन करना चाहिए| संतुलित भोजन? उसी कक्षा में बैठा राजू सोच रहा है| ये संतुलित भोजन क्या होता है? वह उक्त अध्यापक से पूछना चाहता है परन्तु डर के मारे नहीं पूछ पाता किन्तु छुट्टी के पश्चात् भी उसके मन में एक ही प्रश्न बार-बार कौंधता रहता है "ये संतुलित भोजन क्या होता है?"
राजू पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाला दस-ग्यारह वर्ष का बच्चा है जिसके स्वास्थ्य के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि यदि उसका कपड़ा उतार दें तो पसलियों को सरलता से गिना जा सकता है| गणित के अध्यापक गिनती सिखाने के लिए माँस से लिपटी हड्डियों का प्रयोग कर सकते हैं| वज़न इतना कि अगर वह खुले मैदान में सो जाए तो चील कौआ भी उठा ले जा सकते हैं और पंचतंत्र की 'कंटकम कंटकेनैव' कहानी चरितार्थ हो सकती है|

वह घर पहुँचता है| पहुँचते ही माँ से पूछता है, "माँ! यो संतुलित भोजन के होवे है (माँ! ये संतुलित भोजन क्या होता है)? माँ अनपढ़ वह क्या उत्तर देती बोली म्हाने के बेरो? होतो होग्गो कुछ (मुझे क्या पता? होता होगा कुछ|) बच्चे के मन में यह प्रश्न ज्वार-भाँटे की भाँति उछाल मरने लगा| सांझ के समय रोटी को पानी में सानते हुए उसने अपने पिता से पूछा, बापू यो संतुलित भोजन किण बोल्यां हाँ (बापू ये संतुलित भोजन किसे बोलते हैं?) के बेरो बेटा अपां तो रोजिना ही यो लूण-रोटी खावाँ हां| कदं-कदं दाळ-दूल भी मिल ज्यास्सी| जणा तू काल अपने गुरूजी ने जाके बूझ ले (क्या पता बेटा| हम तो रोज यही नमक-रोटी खाते हैं| कभी-कभी दाल- भी मिल जाती है| तू कल अपने शिक्षक से पूछ लेना|)

राजू कुछ नहीं बोलता| चुपचाप खा कर सोने चला जाता है किन्तु उसका मन तो बार-बार एक ही प्रश्न से जूझ रहा होता है, ये संतुलित आहार क्या होता है? कैसा होता होगा? कैसा दीखता होगा? कौन लोग खाते होंगे? क्या मुझे भी कभी मिलेगा? क्या पता जो मैं रोज खाता हूँ वही संतुलित भोजन हो? उहूँ होगा कुछ| पर नींद उसकी बैरी हो गई| रात भर आँखों से बस एक ही बात के लिए उसे परेशान किया वह थी संतुलित भोजन|

दूसरे दिन उसने ठान लिया कुछ भी हो मैं तो गुरूजी से पूछूँगा ही| क्या करेंगे मारेंगे? मुर्गा बनाएंगे? ठीक है जो करना हो कर लेंगे लेकिन मैं पूछूंगा| कक्षा में पहुँचते ही वह पूछ बैठा गुरूजी संतुलित भोजन किसे कहते हैं? गुरूजी ने उसकी ओर देखा| बाकी बच्चे भी उसके अनपेक्षित प्रश्न से हँसने लगे| ये पाठ तो कल ही समाप्त हो गया फिर भी यह वही प्रश्न पूछ रहा है| अध्यापक बताने लगे- नकम-रोटी,  पानी में भीगी हुई बाजरे की रोटी, चकौड़े का साग और सवां-कोदो की रोटी यही सब संतुलित भोजन होते हैं| फिर गुरूजी ने उससे  पूछा-तुम तो रोज़ यही खाते हो न राजू? उसने सीना तान कर जवाब दिया- हाँ गुरूजी| तब उन सभी हँसने वालों की आवाज़ बंद हो गई| राजू कक्षा में उपस्थित सभी बच्चों की ओर वह सगर्व देख रहा था तभी उसके कानों में ध्वनि जाने लगी, बेटा! सुबह नाश्ते में पोहा, ब्रेड, मक्खन, टोस्ट, पराठे, फल, फलों का रस| दोपहर के समय भात-दाल, रोटी, सब्ज़ी, घी, दही| रात में रोटी, हरी सब्जियाँ और सोते समय दूध जब ये सब मिलाकर भोजन में लिया जाता है तो उस भोजन को संतुलित भोजन कहते हैं| जो लोग पसंद करते हैं उनके लिए अंडा, मांस या मछली इत्यादि भी संतुलित भोजन का ही प्रकार है|
राजू के कानों में ये सारे शब्द पड़ रहे थे और अचानक उसके मुँह से एक और प्रश्न निकल पड़ता है "गुरूजी क्या इतना सब कुछ एक बार में ही किसी को खाने के लिए मिल सकता है?|

11.8.14

एक आरज़ू...

एक मुद्दत से
मेरे दिल की एक चाहत है
कि तुम और मैं,
समझ सकें एक-दूसरे को,
बाँट सकें दर्द,
कर सकें अठखेलियाँ
मेरी और तुम्हारी नज़रें
एक-दूसरे में खो कर|
मैं जानता हूँ तुम हो चुकी हो
मशरूफ़, अपनी ज़िंदगी में
जिसमें केवल तुम हो
तुम्हारी अपनी तन्हाईयाँ हैं,
अनचाही बातें हैं,
और है अकेले का दर्द
जिसे नहीं चाहती तुम करना बयाँ
किसी के सामने|
मुझे पता है
तुम वही बर्फ़ हो
जिसमें हमने बिताए हैं
कुछ यादगार पल
जिसे थोड़ा भी ताप मिलने पर
पिघल जाएगी
और बह निकलेगी
गंगा-सिन्धु की तरह|

उस ताप की आहट
मैंने कब का दे दिया
लेकिन तुम जानबूझ कर
कर रही हो बचाव,
यह जानते हुए भी
कि
तुम्हारे पानी बनने से लेकर
समुद्र में मिलने तक
तुम्हारा दूसरा किनारा बनकर
चलने को हूँ मैं तैयार|
मैं भी कूद चुका हूँ
उसी नदी में
जिसमें चल रही है
तुम्हारी नाव|
फ़र्क बस इतना है
कि
तुम धारा से अलग हो
मैं तरंगों में सराबोर
तुम्हारा दूसरा पतवार बन
साथ में खेना चाहता हूँ
तुम्हारी नाव को|
मेरी आँखे कब से
टिकी हुई हैं
घड़ी की सुइयों पर
और पूछ रही हैं
एक सवाल उससे
“क्या ऐसा कोई वक़्त नहीं है
किया तुमने मुकर्रर
जिसमें मैं
हिमालय की बर्फ़ को पिघलाकर
अपने खेतों में बहा सकूँ”?

प्रणय निवेदन


एक प्रणय निवेदन तुमसे प्रिय,
अपने आँचल में ग्रहण करो|
निर्निमेष इन भावों को,
अपने हृद में विस्तरण करो|

कोकिल स्वर से मुखरित तुम,
कर्ण वनों में कूक रही|
लिए चषक मृगनयनों की
मनः पटल पर हुक रही|
प्रेम-पिपासु इस अन्तः को,
निज अधरों से संवरण करो|
निर्निमेष इन भावों को,
अपने हृद में विस्तरण करो|

अभिसार पथों का मैं मार्गी,
गन्तव्य तुम्हारा प्रेमांगन|
निर्बाध अग्रसर हूँ मग पर,
दृढ़ प्रतिज्ञ कर अंतः मन|
मेरी अविचल यात्रा का,
तुम एक भाग अनुसरण करो|
निर्निमेष इन भावों को,
अपने हृद में विस्तरण करो|

मैं नव अंकुर एक प्रेमी हूँ,
नहीं भान मुझे प्रेमालाप|
हूँ परे तुम्हारे नाजों से,
नहीं ज्ञान मुझे प्रेम-प्रताप|
मैं सर्वस्व समर्पित तुम पर,
तुम एक तो भाव संचरण करो|
निर्निमेष इन भावों को,
अपने हृद में विस्तरण करो|