कल तक हम निश्चिन्त थे,
है जीवन में आराम;
आज हमारे के हाथ से,
छिन चुका है काम।
प्रसन्नता की बलि चढ़ी,
लगा बड़ा आघात;
विपन्नता के दिन बढ़े,
मन में बढ़ा अवसाद।
पूर्णिमा की रात में,
दिखे अमावस शाम;
आज हमारे के हाथ से,
छिन चुका है काम।
अधिकोष* का ब्याज है,
उधार हाट का बाकी;
मित्रों से भी ऋण लिए,
चुकाऊँ कैसे वा की?
हाथ पसारे दिन ढले,
आँसू ढलती शाम;
आज हमारे हाथ से,
छिन चुका है काम।
रोटी की चिन्ता हुई,
भाड़ा घर का देना है;
शुल्क बच्चों का भरना है,
दवा माँ-बाप की लेना है।
एक-एक पाई के लिए,
तरसूँ आठों याम;
आज हमारे हाथ से,
छिन चुका है काम।
पत्नी की इच्छा मरी,
हुई बहुत उदास;
पति भी बिन मारे मरा,
कोई न फटके पास।
कल तक जो घनिष्ठ थे,
लगे अपरिचित नाम;
आज हमारे हाथ से,
छिन चुका है काम।
आँखों से आँसू झरते,
हृदय चाप बढ़ने लगा;
दर्प-भाव अब चूर हुआ,
चिन्ताग्नि में जलने लगा।
कौन-से पूजूँ इष्ट को?
जाऊँ अब किस धाम?
आज हमारे हाथ से,
छिन चुका है काम।
कार्यालय-से-कार्यालय
दौडूँ,
व्यक्तिवृत्त** लिए हाथ;
जूता टूटा, चप्पल टूटी,
मिला न फिर भी साथ।
चपरासी भी आज तो
लगता बड़ा-सा नाम;
आज हमारे हाथ से,
छिन चुका है काम।
*बैंक
**बॉयोडाटा