शब्द समर

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30.11.22

नदी के उस पार

संगीत के उस पार कोई नहीं रहता,
सिवा निर्वात के|

नदी के उस पार,
एक गाँव बसता था;
समेटे हुए
बचपन से बुढ़ापे तक की यात्रा,
और
अतीत से वर्तमान की
असंख्य स्मृतियाँ| 

अतीत में जहाँ-
गाँव देहात था,
गाँववाले गँवार थे,
गँवारों में जीवन था,
जीवन की संस्कृति थी,
संस्कृतियों की परम्परा थी,
परम्परा में रातें थीं,
रातों में रस था
रस में संगीत,
संगीत में आनन्द था| 

फिर,
गाँव का मध्यकाल आया
काल में, विचार आया
विचार था- नगर का,
नगर में आकांक्षा थी,
आकांक्षा थी, विकास की,
विकास में- आशा थी,
आशा से जन्मी लालसा,
लालसा, बढ़ी और लिप्सा बनी
लिप्सा व्यावसायी थी
व्यावसाय था, नगर का|
गाँव नगर न बन पाया,
नगर, महानगर हो गया|

अब,
गाँव खो चुका है,
वह,
उजाड़ है, निर्जन है, वीरान है
जहाँ-
नीरवता है, निस्तब्धता है, सन्नाटा है|
इसीलिए,
नदी के उस पार कोई नहीं रहता;
सिवा दिन-रात के-
ठीक ऐसे ही जैसे,
संगीत के उस पार कोई नहीं रहता;
सिवाय निर्वात के|

कृष्णा की हँसी

यह जो मेरी खिलखिलाहट है, मुस्कुराहट है न?
यह नहीं है हँसी मात्र मेरी,
यह-
आषाढ़ का मेघ है,
सावन की हरियाली है,
भादों की कजरी भी है,
तो क्वार की क्यारी है|

कार्तिक की जगमगाती दीवाली
और मार्गशीर्ष की गुलाबी गुनगुनी धूप है ,
तो पौष का मकर, पोंगल लोहड़ी,
और माघ के वसन्त की आहट है|

फागुन की रंग-बिरंगी पिचकारी है यह,
और है चैत्र के ढोल-नगाड़ों सहित खलिहान की खुशहाली,
वैशाख में यह नाचती बिहू और वैशाखी है,
तो जेठ में रिमझिम बरखा की तैयारी है|

मेरे माता-पिता जब भी मुझे ऐसे देखते हैं,
तो जी जाते हैं-छः ऋतुएँ,
बारहों महीने,

एक साथ, एक क्षण में एक युग की भाँति|

19.10.22

कवि की आयु

एक कवि सम्मलेन होने वाला था| दिग्गज-से-दिग्गज कविजन अवतरित हुए थे| कोई इतना श्रृंगारी कि कामदेव और रति वर्षों से उनके घर पर पानी भर रहे थे| किसी की कविताएँ वीर रस से इस प्रकार ओतप्रोत होतीं कि उनके हर सम्मलेन में वातवरण में वायु प्रताप बढ़ जाता, तम्बू स्वयं ही उखड़ने लगते| हास्यरस के कविवर की कविताओं में इतना जादू होता कि लोग अपने किसी प्रिय कि मृत्यु पर भी रोने के स्थान पर हँसते ही रहते| देशप्रेम वाले कवि की कविताओं का यूँ प्रभाव था कि लोग अपने पड़ोसी को ही पाकिस्तानी समझकर कूट दिया करते थे|

इन समस्त श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठतम पुरुषार्थी महाकवियों के मध्य में एक हिमवर्णी, मृगनयनी, गजगामिनी, कोकिलकंठी, पुष्पहृदयी, नवायु कवयित्री भी बैठी हुई थीं, जो कि समस्त श्रृंगारी, उत्साही जनों के नयनों का विश्रामस्थल थीं| कोई कहीं भी ताक कर जब थक जाता, बस उन्हें देखता, निहार लेता फिर निहारता ही रहता|

ऐसे ही में उसी हृदचौरी ने एक कविवर से विनोद-ही-विनोद में उनकी आयु पूछ लिया, क्योंकि वे बार-बार बातों-ही-बातों में उसे अपना पौरुष बखान रहे थे, साथ-ही-साथ अप्रत्यक्ष प्रेम निमन्त्रण भी प्रेषित करते जा रहे थे| आयु के बारे में सुनते ही, कविवर झेंप गए| महोदय ने अपने सम्पूर्ण श्वेतवर्णी केशों को पूर्ण श्यामल बना रखा था, यहाँ तक कि दाढ़ी और मूँछें भी सोलह वर्ष की बता रही थीं, क्योंकि वे उगने ही नहीं पाती थीं| अब किसी नवयौवना को अपनी मूल आयु कैसे बताएँ? उन्हें स्वयं से लज्जा और प्रकृति पर क्रोध आ रहा था| हालाँकि उन्होंने हँसी-हँसी में टाल दिया किन्तु अपनी आयु नहीं बताई|

तभी संचालक ने एक स्थानीय युवा कवि को भी कविता पढ़ने के लिए मंच पर आमन्त्रित किया| कवि बेचारा अभी नया-नया ही कवि बना था, अतः उसे कवियों के साथ वाले रहन-सहन और उसकी औपचारिकताओं की जानकारी नहीं थी| उस युवा ने दूर से तो लोगों का अभिवादन किया, किन्तु चरण वन्दन नहीं किया, और आकर कविवर के पड़ोस में बैठ गया| फिर क्या था कविवर के भीतर की बड़ी मछली जग गयी| उन्होंने तमतमाते हुए कहा, “आजकल के युवाओं को कोई शऊर, कोई शिष्टाचार, आचार-विचार, व्यवहार की समझ नहीं है, और चले आए कवि बनने| अपने से बड़ों के सामने कैसे प्रस्तुत हुआ जाता है, इनको पता ही नहीं है| ये क्या कविता पढ़ेंगे? पहले अपने गुरुओं का, अपने से बड़ों का सम्मान तो करना सीख लो, फिर कवि बनना| बड़े आए उभरते कवि बनने|” बेचारा नवयुवक कवि होने से पूर्व महाकवि के शब्दबाणों से ही शहीद हो गया|

तभी सहसा युवती ने धीरे से पुनः उनकी आयु पूछ लिया, अब तो बेचारे को काटो तो खून नहीं| बेचारे असमंजस में पड़ गए, “अब सम्मान बचाऊँ, या प्यार?”

यह कौन है...?

यह कौन है?
जिसने चूम लिया मुझे चुपके से?
वह भी बिना मेरी सहमति या अनुमति के?

लेकिन मुझे क्यों अच्छा लग रहा है,
जब यह करता जा रहा है
प्रवेश वस्त्रों के भीतर,
और भरता जा रहा है गर्माहट
मेरे बदन के पोर-पोर में?
और यह गर्मी;
आहा! जैसे इसकी ही प्रतीक्षा थी मेरी देह को।


क्यों सूख रहे हैं होंठ मेरे
?
और क्यों रोयों में है सरसराहट भरती जा रही?
कटकटाते दन्त-पंक्तियों पर
कौन बिखेर रहा है चमक अपनी?
कौन है,
जो हाथों से कराता जा रहा है
अजब-अजब क्रियाकलाप?
क्यों चुँधिया जा रही हैं आँखें मेरी,
जब ताकती हूँ उसकी ओर?|

ओह! तो यह सूरज है?
जो शरद की गुलाबी शीत में,
गुनगुनी-सी धूप से सेंक रहा है देह मेरी।
तब तो स्वागत है तुम्हारा दिनकर।

आओ,
और बने रहो चारों ओर हमारे,
देते हुए पूर्ण गर्माहट
और
बिखेरते रहो उजाला
समूची सृष्टि में।

8.9.22

माता-पुत्री सम्वाद

कृष्णा- मैं आई कहाँ से?
और हूँ कहाँ?
तुम कौन?
मैं कौन?
और ये लोग कौन?

 माँ- कृष्णे!
तुम अनन्त से
ब्रह्माण्ड की प्रिय
भू-लोक में हो आई।

मैं तुम्हारी जन्मदात्री;
'माँ' तुम्हारी,
और तुम मेरी 'आत्मजा' हो।

 सुते!
तुम पुत्री ही नहीं हो मात्र,
तुम असह्य वेदना,
तपती-उबली हुई देह,
धौंकनी-सी साँसें हो,
पीड़ा की अन्धकार,
और उसी व्यथा की
न बीतने वाली क्षण हो,
तुम न रीतने वाली
प्रण हो।
तुम माँ की हर पल की करवट,
चेहरे की सिलवट,
दाँतों का चिपकना,
होंठों का कटना,
हाथों की छटपटाहट,
पैरों की कसमसाहट,
असीम चीत्कार,
रक्षा की पुकार हो।

हे पुत्रे!
तुम नहीं हो मात्र कन्या हमारी
तुम तो सुप्त व जागृत नेत्रों का स्वप्न हो,
तुम निराकार से
कन्याकार की यात्रा,
बिसूरती आँखों की प्रतीक्षा का
परिणाम,
प्रसव-वेदना का
स्नेहलेप,
खिंचे अधरों की
मुस्कान हो,
तुम गहन तिमिर में
उज्जवल प्रकाश पुंज,
हताश-निराश
हैरान-हलकान जनों में
प्रसन्नता की द्योतक हो।

हिमाच्छादित पर्वत मण्डल,
सुदूर मरुक्षेत्र हो,
अनन्त गगन,
विहंगम सघन वन
नयनाभिराम,
सुलोचन शिशु-धाम,
जीवन की अभिलाषा
प्रेम की भाषा हो।
तुम कवि की कल्पना,
कृष्ण-नाम का जपना हो।
तुम नहीं हो मात्र आनन्द भद्रे!
तुम पूर्णानन्द हो,
माता-पिता को मिला;
परमानन्द।

 प्राणे!
ये हैं तुम्हारे सम्बन्धी सभी,
आओ सर्वप्रथम लो पहचान
उन्हें,
जो मेरे साथ-साथ
तुम्हें इस धरा-धाम पर लाने में;
रहे हैं सहयोगी बराबर,
और अब तुम्हारे,
लालन-पालन-पोषण सहित;
जीवन के हर क्षण में
रहेंगे छत्र की भाँति विद्यमान भी।
करो इन्हें प्रणाम धिये,
ये मेरे भी जीवनाधार और जीवनसाथी हैं;
ये जनक तुल्य 'पिता' हैं तुम्हारे।

वे जो चार जन हैं दिख रहे
जो प्राप्त हो चुके हैं
अपनी श्वेत जरावस्था को,
उनमें वे जो सबसे वृद्धा स्त्री हैं
और दीख रहे हैं वृद्ध पुरुष जो,
वे हैं तुम्हारे
'पितामही' और 'पितामह'
और जो दो और स्त्री पुरुष
हैं विराजमान वहीं पर,
वे है तुम्हारे 'मातामही' और 'मातामह' हैं।
ये वे हैं,
जो प्रथम प्रणम्य हैं हमारे,
किसी भी ईश्वर से।
उनसे ही सीखा है हमने
जीवन के गुर सभी।
वे हमारे रहे हैं,
और अब तुम्हारे भी होंगे
संस्कारधानी।
नतमस्तक हो करो प्रणाम इन्हें
कि इनका आशीष ही होगा
रक्षाकवच तुम्हारा।

 हे दुहिते!
जब तुमने इतनों को लिया पहचान,
तो अब सबको जाओ चीन्ह
धीरे-धीरे,
जो हैं
तुम्हारे साथ
ज्येष्ठ पिता-माता,
बुआ-फूफा,
मासी-मौसा,
मामा-मामी
भ्राता-भगिनी-भावज।
कुछ मित्र मेरे,
कुछ तुम्हारे पिता के
जो लगेंगे तुम्हारे
काका-काकी
और आस-पड़ोस के कई और सम्बन्धी,
करो इन्हें प्रणाम अंगजे।

हे नन्दे!
इन्हीं के मध्य है रहना तुम्हें
सामंजस्य के साथ,
यही कहलाते हैं समाज-सिन्धु सभी,
जो सुन्दर भी हैं,
और घृणित भी,
किन्तु
रहना ही पड़ता है,
साथ उनके
लाँघना ही पड़ता है
चाहे या अनचाहे भी।

हे पुत्रे!
और जो देख रही हो
तुम मिट्टी,
हरीतिमा,
जल, वायु,
जन-जीवन चारों ओर
यह हमारी भूमि है,
भारत-भूमि
तुम्हारी मातृभूमि,
हमारा राष्ट्र,
तुम्हारा राष्ट्र
करो प्रणाम इस धरती को;
और गौरवान्वित हो
कि इसी मिट्टी में मिला है जन्म तुम्हें;
यही मिला है तुम्हें,
एक राष्ट्र के रूप में।

अतः हे तनुजे!
इन सबको प्रणाम कर
उतर जाओ प्रेम भरे इस कुरुक्षेत्र में,
अपने भ्राता-सह-सखा योगेश्वर की भाँति,
बनों स्वयं 
कृष्ण,
और अर्जुन भी
उठाओ
पांचजन्य भी
और
गाण्डीव भी तुम ही
कि करना मात्र तुम्हें ही हैं,
कोई और कर्ता न आएगा
अतिरिक्त तुम्हारे।

हे जगत!
अपने माता-पिता के चरणों में
दण्डवत के पश्चात
माता-पिता महों को नतमस्तक होते हुए
आप सभी को प्रणाम करती हूँ।
मैं 'कृष्णा सुमनार्थी',
आज से,
इस सुन्दर जीवन को;
जीवन के लिए
वरण करती हूँ।
आशीष दें
कि मैं अपने कर्तव्य-पथ पर,
रहूँ अडिग सदा,
परिस्थिति चाहे कोई भी आए।
प्रणाम!

19.8.22

जय श्रीकृष्ण हरे!

जय श्रीकृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे
भक्तन के दुःख सदा प्रभु जी
भक्तन के दुःख सदा प्रभु जी
बस एक पल में टरे
जय श्री कृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे

तेरी शरण में जो भी आया गिरिधर
तेरी शरण में जो भी आया गिरिधर
वो भव-सिन्धु तरे
वो भव-सिन्धु तरे
जय श्री कृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे

धर्मन की रक्षा की खातिर
धर्मन की रक्षा की खातिर
रूप विभिन्न धरे
रूप विभिन्न धरे
जय श्री कृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे

दुष्टन से वसुधा को बचाने
दुष्टन से वसुधा को बचाने
युद्ध महा युद्ध करे
युद्ध महा युद्ध करे
जय श्री कृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे

दीन-हीन मित सुख की खातिर
दीन-हीन मित सुख की खातिर
उसके भण्डार भरे
उसके भण्डार भरे
जय श्री कृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे

प्रेम-बीज धरणी में धरकर
प्रेम-बीज धरणी में धरकर
जग मय प्रेम करे
जय मय प्रेम करे
जय श्री कृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे

गोपियन को संग प्रेम को कान्हा
गोपियन को संग प्रेम को कान्हा
महा महा रास करे
महा महा रास करे
जय श्री कृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे

तुम हो जग के कर्ता धर्ता
तुम हो जग के कर्ता धर्ता
तुम ही सब काज करे
तुम ही सब काज करे
जय श्री कृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे

मैं दीनन में दीन हे केशव
मैं दीनन में दीन हे केशव
शरण तुम्हारी परे
शरण तुम्हारी परे
जय श्री कृष्ण हरे
जय जय श्री कृष्ण हरे

16.8.22

बेटी का आना

कोई भी बेटी,
बेटी की चाहत में नहीं आती
न दादी-दादा की,
न बुआ-फूफा की,
न मौसी-मौसा,
न नानी-नाना,
न किसी भी सम्बन्धी की,
न ही वह चाहत होती है,
समाज की,
अधिकतर माँ-बाप की भी 
चाहत नहीं होती है
बेटी|

बेटी का आना अपशगुन है,
अभिशाप है,
कलंक है,
बोझ है|

बेटी का आना
प्रतीक है,
सिकुड़ी हुई नाक,
चढ़ी हुई भौंहों,
लाल-लाल रक्तिम आँखों
माथे पर पड़े बल का|

बेटी का आना
ताना है माँ के लिए
अपमान है उसकी कोख के लिए
मातम है और
पसरा हुआ सन्नाटा है
पूरे घर के लिए| 

बेटी का आना
चिन्ता है
ससुराल की
दहेज़ की
सुरक्षा की
तरह-तरह की बातों की
प्रतिष्ठा की
मान की, सम्मान की|

असल में बेटी का आना
आना नहीं,
रोना होता है| 

बेटियाँ,
पहली हों
या आख़िरी,
वे अवांछित और अनिच्छित ही होती हैं
और 
वे जब भी आती है
बेटे की ही चाहत में जन्मती हैं|