तुम देवि नहीं,
स्त्री हो।
‘स्त्री’ शब्द ही अपने-आप में पूर्ण विराम है;
किन्तु हर पूर्णता से पूर्व
तुम भी अर्ध-अल्प, प्रश्न, आश्चर्य-रूपी
विराम-चिह्नों से सजा हुआ
एक वाक्य हो।
वाक्य अपने-आप में पूर्ण विचार-स्थल होता है;
किन्तु हर विचार से पूर्व
तुम नव-स्थायी भावों, विधान-निषेध, आज्ञीच्छिक,
सन्देह और प्रश्न-रूपी वाक्य-वाक्यांशों से सुसज्जित
एक अनुच्छेद हो।
कहने के लिए तो अनुच्छेद स्वयं ही
एक पूर्ण कथा-स्थल है;
किन्तु तुम अपने भीतर
किंवदंतियों, कविताओं, गीतों, रहस्यों
और कथानकों में निहित चरित्रों की
छोटी-बड़ी भूमिकाओं को
जीवन-मृत्यु देने वाली
एक गूढ़ उपन्यास हो।
वास्तव में तुम गूढ़ हो उनके लिए
जो तुम्हारी भाषा से अनभिज्ञ हैं;
अन्यथा कहते हैं—
“एक पुस्तक सहस्र मित्र के समान होती है।”
तुम हर चरित्र को उजागर करती हुई
वही एक खुली किताब हो,
जो हर व्यक्ति के छाती से चिपक
उसके जीवन को
एक सुखद रूप प्रदान करती हो।
तुम असंख्य किताबों को जन्म देने की प्रेरणा हो;
तुम सर्वस्व हो उसके लिए
जो चाहता है
कुछ भी सृजित करना इस संसार में।
तुम हर सर्जक की जननी हो।
एकमात्र तुम्हीं हो कथाकार।
वास्तव में तुम्हीं हो
इस सृष्टि की रचनाकार;
क्योंकि तुम देवि नहीं, स्त्री हो।
और स्त्री अपने-आप में पूर्ण होती है,
अपने भीतर लघु-दीर्घ गुण-दोषों को
समेटे हुए।
तुम नहीं हो देवि
किसी भी अवस्था में—
यह बात उतार लो
अपने मन की भाषा में
पूरी स्पष्टता से।
और यदि कोई करता है चेष्टा
तुम्हें स्त्री से देवि घोषित करने की,
तो उसे अशुद्ध और अमान्य
प्रमाणित कर दो
अपने जीवन के व्याकरण से;
कि कोई तुम्हारी
सहजता, सरलता, कोमलता,
धैर्य, संवेदना और साहस
रूपी विशेषणों को
पौराणिक कथानक का रूप
न दे पाए।
तुम देवि नहीं—
जीवित चेतना हो,
स्वतन्त्र विचार हो,
और अपने सम्पूर्ण मानवीय स्वरूप में
एक पूर्ण स्त्री हो।
तुम स्त्री हो—
यही तुम्हारी विशेषता है,
यही तुम्हारी गूढ़ता है,
यही तुम्हारा रूप है,
यही तुम्हारा चरित्र है;
और यही तो तुम्हारी सुन्दरता है—
कि तुम स्त्री हो:
न किसी से अधिक,
न किसी से कम।

