जिन्हें तुम नहीं जानते
और न ही परिचित हैं तुमसे वे ही।
मिलो
गले उनसे,
जो नहीं हैं तुम्हारे
अपने
न ही तुम लगते हो कुछ
भी उनके नाते में।
मिलाओ
उनसे हाथ
और महसूस करो उनकी
हथेलियों की खुरदुराहट को,
जिनकी भाग्य रेखाओं
को घिस दिया है समय ने
फावड़े, कुल्हाड़ी की धार से,
बुहार दिया है झाड़ू
की सींकों और तिनकों से।
मजनी ने पोत दिया है
कालिमा
जिन गदोरियों पर।
देखो उन्हें
और करो अनुभूति उन
सपनों को,
जिनमें सम्पीड़क (रोड
रोलर) की भाँति चला है बेलन,
जिन्होंने माँज कर
चमकाया बर्तनों को,
परन्तु रगड़कर धो
डाला अपने भविष्य को
और परोस दिया दूसरों
की थाली में।
मिलो
गले उनसे,
सुनो उन धड़कनों के
स्वरों को,
जो बोलना तो चाहते हैं
परन्तु शब्दहीनता की
लाचारी से
दम तोड़ देते हैं
तुम्हारे कानों तक
आने से पूर्व ही।
जो अशिक्षा की भेंट
चढ़ गई
और मन से रह गई बौना,
आयु में बड़ी होकर भी,
जो झुक जाती हैं
सामने तुम्हारे।
नापो उस गर्दन की
ऊँचाई को।
अपने
हाथ बढ़ाओ
और थामो उन्हें,
कि उन्हें नहीं आता
हाथ पकड़ना।
अपना दिल दिखाओ
और सम्भालो उन्हें,
कि उन्हें तुम्हारी
बराबरी का नहीं है कोई ज्ञान।
हाथ मिलाना,
गले मिलना—
केवल व्यवहार नहीं,
प्रेम की निशानी है;
वह प्रेम,
जो अमिट होता है,
अद्वितीय
होता है।
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बहुत सुंदर रचना, विद्यार्थी जी। 🙏
जवाब देंहटाएंआपकी लेखनी सीधे दिल को छूती है और इंसानियत का असली अर्थ याद दिला देती है।🙏